झुद्क तथा अकाशक घनदयाम्रदास जाढान+,
गीताप्रेस, गोरखपुर
सं० १०९४ प्रथम संस्करण ३२९५० मूल्य ॥>) दश आना
पत्ता-
गीताग्रेस, गोरखपुर
आहरिः विषय-सूची ज्क्न्त+- व्यय २-भथम पघरसंग-राम-रहस्य २-छद्धितीय घर्ं॑ग-ज्ञानदीपक ३-तलातीय प्संग-शीभमक्ति-चिन्तामणि ४-चहत्ु॒र्थ प्रंग-सस प्रश्न
७६-पञ्थम पघरतंंग-परिशिए्ट बन
चित्र-सू्ची १---लछोमछा ऋषि और काकश्ुशुण्डि २४---चिहुवनमोहन राम
व्पतोेत-+च्कु-नक-च्े 5
वक्तन्य
श्रीरामचरितमानस भक्तिशासत्रका एक बड़ा ग्रन्थ है; मनोहर पद्यमयी रचना होनेसे वह अतीव श्रतिमधुर और चित्ताकर्षक हों गया है | साबरमन्त्रजालके स्वयिता भगवान् भूतभावनकी अनुकम्पासे उसकी एक-एक चोपाईमें मन्त्रकी शक्ति भर गयी है | इसका छोकोत्तर प्रचार ही उसके लोकोत्तर गुणोंका परिचायक है | के
श्रोताके हृदयज्ञम करानेके लिये निरुपणीय विषयकों विस्तार और संक्षेप, दोनों भौतिसे निरूपण करनेकी परिषा्ी है, यथा--
कहे नाथ हरि चरित अनूपा | व्यास समास खमति अनुरूपा॥
जिस चरित्रकों बिस्तारके साथ सात काण्डोंमें वर्णन किया, वही: चरित्र संक्षेपमे भुशुण्डिजीके मुखते पांच दोहीमें कहला दिया गया, जिस भत्तिशास्रके साज्ञोपाजड़ निरूपणमें ४५०२ चोपाइयाँ लिखनी पढ़ी, उसी मक्तिशाक्ञक्रा भुशुण्डिजीके मुखसे १०५ चौपाइयोंमें निरूपण कराया गया, यथा--
सतपंच चौपाई मनोहर जानि जो नर उर धरें।
दारुन अबिदा पंच जनित बिकार श्रीरधुबर हरें ॥
इस शतपश्च चौपाई ग्रन्थ स्पष्ट करनेके लिये भ्रीपृज्यपाद गोखामीजीने भक्तिका शानके साथ तुलनात्मक विचार किया है, वा
(६)
याँ कहिये कि रामचरितमानसमें वर्णित समस्त विषयोका सारतम- मंशा अन्तक़ी १०५ चौपाइयोंसें कह दिया है । श्रीरामचरितमानसमें चौपाइयो
ही पुरइन हैं, और छन्द, सोरठा और दोहा तो उन पुरईनोके कमल हैं; यथा-- |
पुरइन सघन चारु चोपाई | जुगुत्ति मं मनि सीप सोहाई ॥ .छंद -सोरठा सुंदर दोहा। सो बहु भाँति कमछ कुछ सोहा ॥
अतः कहना नहीं होगा कि पुरइनके साथ कमलॉंका भी ग्रहण हो जायगा, चौपाइयोॉंके साथ तत्सम्बन्धी छन्द, सोरठा और दोहोंकों अहण*" करना न्यायसंगत है।
सनातन प्रथा है कि अध्यायके अन्तका आधा छोक भी . पूरा ही मानकर परिगणित होता है; इसी भाँति चौपाइयोॉकी गणनामें भी जहाँ आधी ही चौपाई पड़ गयी है, वहाँ उसे पूरी ही गिननी चाहिये। जिस दोहेमें सात अर्धालियाँ हैं, उन्हें चार चौपाइयाँ शिनना समुचित है। इस प्रकार: गणना करनेसे पता चछता है कि श्रीरामचरितमानस उत्तर- ” काण्डके ११४ दोहासे 'शतपश्च चौपाई? अन्थका प्रारम्भ हुआ है, और सोलह दोहोंमें पूर्ण हुआ है। यही रामचरितमानसयज्ञकी पूर्णाहुति है। . . इसकी फलशुति पूर्ण अन्थकी फलभ्रुतिके साथ ही कही गयी है | यथा-- 5 रघुबंस भरूघन चरित जे नर नारि सुनहिं जे गावहाँं। कलिमल मनोमक घोद्द विज्ु क्नम रामधाम सिधावहीं ॥ सतपंच चौपाई मनोहर जामनि जो नर उर धहें । मर दारुन अविद्या पंच जनित बिकार भ्रीरघुबर हैं ॥
कुछ महात्माओंका मत है कि 'शतपग्च चौपाई? का अर भच्छे पद्च? हैं | सो सभी चौपाइयाँ पश्च हैं, उनमें शाज्ाथंका निर्णय निःसन्देह चौपाइयाँ पश्च कही जा सकती हैं, पर सभी चौपाइयों पंघेल से परिण्हीत नहीं दो सकतीं | कोई-कोई '“अह्लानां वामतों जद इस न्यायसे शतपश्चका ५१०० अर्थ करते हैं, और किसी-न-किसी कक
| (७) से गिनती भी मिला देते हैं । कोई ७)८५८०३५ अथे करते हैं और प्रत्येक अर्धालीकों चौपाई मानकर उत्तरकाण्डके ६३वें दोहेसे ६८वें दोहेतक शतपश्थ , चौपाई ग्रन्थ मानते हैं | किसीनें ध्याननिरूपक्. चौपाइयोंकों खींच- ' खॉचकर १०५की संख्या पूरी की | किसीका यह मत है कि ध्यानया तो पॉच चोपाईमें कहा गया है या सातमें या बारहमें, अतः पाँच सात चीपाई * अर्थ करना ठीक है । पर शतपश्न चोपाइयाँ दूसरे स्थानमें और फलश्र॒ति दूसरे स्थानमें होना अनुचित है । ; ॒ सम्पूर्ण अन्थमें शत शब्द सदा सौके अर्थम प्रयुक्त हुआ है, यथा-- नहिं निस्तार कल्प सत कोरी । साग खाद सत्त वर्ष गँवाए।
और दों संख्याएँ सदा योगके अर्थमें ही प्रयुक्त हुई हैं, बथा-- बीते कप सात अरूु वाीँसा | चरप चारि दस वास, बन। भ्रुवन चारि दस मूघर भारीं। बोते मनहु कल्प सत एका ॥
सो यहाँ १०५का अर्थ करना ही युक्तिसंगत है, उन्हें हढ़नेके लिये दूर जानेकी आवश्यकता नहीं है, फलझुतिने उन्हें अपने, साथ बाँध रक्खा है |
शतपथ्व चौंपाई ग्न्थमें पाँच प्रकरण हैं--( १) रामरहस्प, (२) शानदीपक, (३ ) भक्तिचिन्तामणि; (४) सप्त प्रश्ष और (५) परिशिष्ट | इनमेंसे शानदीपककी टीका लिखे कई वर्ष हुए, वह “कल्याण'के रामायणाडूसे लेकर दो-तीन अक्लेमिं प्रकाशित हुई । वह दीका लोगौको पसंद आयी; और पीयूषकारने भी उसे स्थान देकर सम्मानित किया | इससे उत्साहित होकर मेरा विचार “मक्तिमणि? प्रसंगपर सी ऊसी ठंगकी टीका लिखनेका हुआ; पर उसका समय नहीं आया था; इसलिये चाहनेपर मी न लिख सका; और इस सालके माधमें रुप्ण होनेपर भी अन्तर्यामीकी प्रेरणासे लिख पाया ) ेल्
पीछेसे यह विचार मनमें आया कि शेष तीन असज्ञ छिखकर शतपश्च चौपाई अन्थ ही क्यों न पूरा कर दिया जाय, और मेरे मित्र
(८)
शरीमान् हनुमानप्रसाद पोद्दास्जीने अपनी सहज ऊदारतासे प्रेरित होकर उसके प्रकाशनका भार अपने ऊपर लिया; सो इस नवरात्रमें शेष तीन प्रकरण भी पूरे हुए. । 55
श्रीअन्थकारले लिखा है कि अर्थ पराग है, माव मकरन्द है, और भाषा उनके काव्यकमलका गन्ध है, यथा--
अरथ जनूप सुभाव सुसापा | सोद्ट पराग मकरंद सत्रास्ा ॥
सो तीनोंकें ग्राहक्त अलग-अछग मिलते हैं, अतः सर्वोपरि गोस्वामीजीकी भाषा ही रक्खी गयी है, उसके नीचे शब्दा्थ और उसके बाद भाव कथित है। भावोकों देखकर एक मित्रने कद्दा कि क्या अन्थ- निर्माणके समय अन्थकारने इन भावोंकों सोचा होगा! सैंने निवेदन किया कि शब्दविन्यासके दंगसे तो ऐसा ही मालूम होता है, और यदि न भी सोचा हो, तो जब उससे भाव निकल रहे हैं, तो हम क्यों न छाम उठावे १ भालीके आश्ञात्ीत मकरन्द यदि पुष्पसे प्रकट हों तो मधुकर उससे छाम उठानेमें आगा-पीछा क्यों करें ?
कुछ लोग अद्देतमतके मार्योकी देखकर घबराते हैं, परन्तु इसमें घबरानेकी कोई बात नहीं है। सभी पण्डितोंपर विदित है कि चेदमें अद्देतवादिनी श्रुतियाँ भी हैं; द्वेतवादिनी श्रुतियाँ मी हैं, निर्मुण- निरूपक श्रुतियाँ भी हैं, सशुणनिरूपक श्रुतियाँ भी हैं। अद्वेतवादी ह्वेतवादिनी भ्रुतियोंकों अद्वैतर्मे लगाते हैं, और द्वैतववादी अद्वैतवादिनी श्रतियाँकों भ्द्देतमें लगाते हैं, और जहाँ वे लगानेमें असमर्थ होते हैं उनका पक्ष गिर जाता है; पर यह बात सभी जानते हैं कि अमुक-अमुक श्रतियाँ अद्वैतवादिनी हैं, और अमुक-अमुक हतवादिनी हैं। पण्डितके हार जानेसे न तो अद्धैतवाद अप्रमाण होगा; न द्वैतवाद अप्रमाण होगा | माठ्वत् हितैधिणी भ्रुतिमगवतीने अधिकारमेदसे दोनोंकों कहा है, जिसे जो पसंद हो उसका बेद अधिकारी है। भ्रीरामायण , ब्ह्मयश बेदका
(९ ) अवतार है; इसमें भी दोनों मर्तोंका प्रतिपादन करनेवाली चौपाइयाँ हैं और जिस अधिकारीके लिये जो चाहिये उसे स्पष्ट करके दिखलाया है । एक ही बातकों सब किसीका एक दृष्टिसे देखना असम्भव ही नहीं, अनुचित भी है | भंगवान् याज्षवल्क्यने कहा-कि-- सिदसम को रघुपत्ति ऋ्रतघारी | बिनु अधघ तजी सत्ती अध नाराए और पाव॑तीजीने कह्य कि-- 2 पटक मैं जो कीन्द रघुपति ऊअपमाना । पुनि पति चचन झूपा करि जाना है सो फल मोद्टि विधाता दीन्हा। जो कछु उचित रहा सो कीनहा ॥ याज्षवलक्यजी सतीकों निष्पाप मानते हैं, और* सतीजी खबं अपनेकों अपराधिनी मानती हैं । यही न्याय है, यही उचित है कि सती अपनेकों अपराधिनी मानें, और याज्ञवल्क्यजी उन्हें निष्पाप मानें | अतः साम्प्रदायिक झगड़ेकों ब्ीचमें खड़ा करके किसी अंशको- पूर्व और क्रिसीको उत्तरपक्ष माननेसे जो रसभज्ग होता है, उससे ग्न्थकी रक्षा करनी उचित है। ऐसा अर्थ होना चाहिये जिसमें अ्न्थका.सवारस्य बना रहे । के
पं० रघुवीर ज्रिपाठिखलः विज्ञयानन्द॒जिपठी भदैनी-काशी
प्रसड़-परिचय
मेरुशिख़रपर वट्की छायामें महर्षि छोमश बैठे हुए हैँ | एक विरक्त ब्राह्मण-कहींसे आकर उनके शरण हुआ । महधिने देखा कि यह ब्राह्मण परम अधिकारी है, अतः इसे परम शिक्षा देनी चाहिये। अतः वह उसे ब्रह्मशानका उपदेश देने छगे । ब्रह्मशानमें महावाक्यक्रा उपदेश देना पड़ता है | उसका अनुवाद गोंखामीजीने “सो तें तोहि तादि नहिं भेदा? कहकर किया है। “सो! का अर्थ ईश्वर और 'हतें? का अर्थ जीव है और धतोहि ताहि नहिं भेदा? का अर्थ अमेद है | इस प्रकारका अमेद उपदेश करनेमें ईश्वर और जीवके विरुद्धांशका परित्याग करना पड़ता है | ईश्वर- मेंसे सर्वृशत्वादि गुण, और जीवसेंसे अल्पशत्वादि गुण प्रथक कर दिया जाता है । इसीको सो ( तत्पद ) और तेँ ( त्वंपद ) का शोघन# कहा जाता है ।.ऐसे शोधनमें गु्णोका बाघ हो जानेसे 'निर्मुण बह्म और कूटख
# तत्पदका वाच्याथ है वह? अर्थात् ईश्वर और त्वंपदका वाच्यार्थ है “तुम! अ्थोत्त् जीव । ईश्वर सर्वज्ञादि ग्रुणोंस्ते युक्त है, और जीव अल्पशादि शुण- वाला है । दोनोंको एक करनेके लिये दोनोंमेंसे सवंज्ञ, अव्पशादि गुणोंको निकाल देते हैं, इसी निकाल देनेको तत्यद और त्वंपदका शोपन कहते हैं। ऐसा करनेसे ईश्वस्से निय्युण जह्म दो जाता है, और जीव क्ूटस्थ हो जाता है सो तत्पदका
. लष्ष्याथे हुआ निर्युण जह्य और त्वंपदका लक्ष्या्ें हुआ कूटस्थ |
+ इस दारीरके साक्षी चेतनकों कूट्स्थ कहते हैं । प्रकरण समझनेके लिये
इनंमें दोका जानना अनिवायं है ।
(११)
अथात् दोनों ओर झुद्ध चेतन शेष रह जाता है, जो कि एक हुई है। यही - ब्रह्मज्ञानके उपदेशका क्रम है । सहर्षिजी भी यही उपदेश दे रहे थे ।
ब्राह्मणफो निशुणका उपदेश न रुचा। उसने वार-वार सग्ुणो- पासनाके उपदेशके लिये प्रार्थना की । पर अन्तर्यामीकी प्रेरणा कुछ और थी । महर्षिजी निर्शुणनिरूपणमें ही जोर लगाते गये; और ब्राह्मण सशुण- पर ही डटा रह गया । धीरे-धीरे बात वढ़ गयीं। महर्षिजीने शाप दे दिया । ब्राह्मण सद्यश काग हो गया | पर बाह्मणकों न भव हुआ, न दीनता आयी । सादर मुनिजीकों प्रणाम करके उड़ चला | यद्दी काग- जी हमारे रामचरितसरके उत्तरघाटके वक्ता भुझुण्डि हैं | पीछेसे महर्षिने इन्हें घुछाकर सगुणोपासना बतलायी और अनेक बर दिये |
गदयड़जीकों मेघनादके हाथसे श्रीरामचन्द्रको बंधा छेखकर शक्का हुईं कि त्रह्म रामको खल्प राक्षसने केसे बॉघा ? इसीके समाधानके लिये गरुड़जी झुझण्डिजीके पास आये और भुशुण्डिजीने इन्हें. रामकथा
' खुनायी । पूछनेपर उन्होंने अपनी रामकहानी भी कही । उसीका उपसंहार
करते हुए. कहते हैं---
दो०-भगतिपच्छ हठ करि रहेउँ,दीन्ह महारिषि साप। मुनि दुररूम बर पायेडँ, देखहु मजन गताप॥
आर्थ-सें भक्तिपक्षपर हट किये रहा ( और ) महर्पिने शाप
दे दिया (सो ) सुनिदुरुभ चर पाया, भजनका पधताप देखो ।
सगतिपच्छ-भाव यह कि ज्ञानमें निर्शुण मतका प्राधान्य है, और भक्तिपक्षमें समुणका ग्राघान्य है | तत्पदका शोधन और मनिर्मुणनिरूपण दो बात नहीं है, और सणुणनिरूपण तथा भक्तिपक्ष एक ही बात है, क्योंकि सगुणके साथ जीवकी एकता# हो नहीं सकती, यथा---“सायावस परिच्छिन्न जड जीव कि ईस समान ।*
कक 3 बट किक कलह 8 कक >लटट िकई परलयन जय रलकल "की कक कक कि मन म कह # अल्पज्ष और स्ंज्ञर्मे एकता नहीं दो सकती |
सीजन
( १२ )
हु करि रहेडें-भाव यह कि ज्ञानोपदेश परम शिक्षा है; इससे बढ़कर कुछ है नहीं, सो उसीका उपदेश मुझसे महर्थिजी करते थे; और मैं उनकी उक्तिके विरुद्ध वैठा-बैठा सोचा करता था; मैंने मन छगाकर उनका उपदेश न सुना, प्रत्युत उनसे वाद-विवाद बढ़ाया) उचित उत्तर पानेपर भी हठ किया, यथा---
तब में निर्युन मत करि दूरो | सगुन निरूषों करि हड भूरी ४
नह मद्दारिषि साप-भाव यह कि हठ करनेका जो फल होता है सो हुआ; आये थे कल्याणके लिये मिल गया श्ञाप | सो भी महर्षिका शाप | सद्यः कार्यर्म परिणत हों गया; यथा-- हे किये जन्यथा होहद नहि बिप्र साप जति घोर॥
मुनि दुर्ठभ घर पायेडें-परन्त उस शापसे मेरा बड़ा काम हुआ | मुनिजीने यदि शाप न दिया होता तो उन्हें अनुताप न होता; और न वे ऐसा बर देते जो मुनिकोगॉकों भी दुर्लम है ।
भाव यह कि ( १ ) अविरछ भक्ति ( २) कामरूप ( ३ ) इच्छामरण (४) जहाँ बसें वहाँ एक योजनपय॑न्त अविद्याका न व्यापना; ये सब वरदान मुनिदन्दोंकों भी सुलभ नहीं हैं ।
देखडु भजन प्रताप-भाव यह कि इसमें न तो ऋषिजीकी करनी
है, न मेरी महिमा है; न शापका गुण है । यह भजनका प्रताप है कि
महर्षिजी शाप देने चले और बर दे डाल्य । अत्यक्ष प्रमाण सब प्रमाणोंसे
ज्येष्ठ है । यहाँ भुझुण्डिजी प्रत्यक्ष प्रमाण दे रहे हैं कि देख छो, मजन-
का प्रताप है कि नहीं ! मुनिकी मतिकों भगवानले फेर दिया, और उनसे
वर दिल्वाया | स्वयं आकाशवाणीद्वारा उसका अनुमोदन किया। यथा--- एचमस्तु तव बच मुनि ज्ञानी । यह सस भगत करम सन बानी ॥
का्क्ष्---2्फ्फियण
# 'नहिं कछु दुलेम श्ञान समाना 7 “न हि शानेन सद्॒श पविच्रमिद्द वियते? गीतासु | ऋते श्ानाज्न सुक्ति: ।
अभसुवनमोंहन राम
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2०)
थीगणेशाय नमः | श्रीजानकीवल्लभो विजयते
शत्लाघ्छाला चतिचा एड
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प्रथम असंग रामरहस्य
>--#>+ई:८६-५
जे असि भगति जानि परिहरहीं ।
केवल ज्ञान हेतु श्रम करहीं ॥ अर्थ-जों छोग ऐसी (प्रभावशाल्िनी ) भक्तिकों जान- चूझकर छोड़ देते हैं, केवछ ज्ञानके लिये श्रम करते हैं । असि भगति-शापकों भी मुनिदुम वरमें परिणत करनेवाली, सब सुखोंकी खानि, शञान-वेराग्यकी जननी भक्ति है । जबतक भगवद्धक्ति श्
शतपश्च चौपाई न
न हो, रामके चरणॉंमें प्रेम न हों; तवतक कोई कल्याण नहीं हो सकता; और प्रेम हो जानेपर कोई कल्याण रुक भी नहीं सकता, बिना परार्थनाके सब कल्याण अपने-आप उपस्थित होंते हैं और अकल्याण भी कल्याणरूपमें परिणत होते हैं ।
जानि परिदरदीं-सव कल्याणका त्याग और भक्तिका त्याग एक वस्तु है। कोई भी प्रशावान् जान-वूझ्कर कल्याणका परित्याग नहीं कर सकता । जान-बूझकर जिसने कल्याणका परित्याग किया; उसका दोष बिना जाने परित्याग करनेवालेसे कहीं बढ़कर है| बिना जाने कल्याणका त्याग करनेवाला, जानते ही उसका ग्रहण कर लेगा; ओऔर जान-बूझकर त्याग करनेवालेके पुनः अहणकी सम्भावना भी नहीं
है, अतः जान-बूझकर भक्तिके परित्याग करनेवालेका कभी भी कल्याण नहीं हो सकता ।
केवल ज्ञान-शुष्क ज्ञान, निरुपास्तिज्ञान | भाव यह कि बिना उपासना (भक्ति ) के ऋतम्भरा ग्ज्ञा ही नहीं होती । सत्य अर्थका प्रकाश करती है इसीलिये इस बुद्धिका नाम ऋतम्भरा है, पहिले उपासनासे ईश्वरमें चित्त एकाग्र होता है, तब उस समय केवल ईइवर- शब्द, ईश्वर-अर्थ और ईश्वरश्ञानमात्र चित्तमें रह जाता है । फिर घीरे- घीरे ध्यान करनेवाला और ध्यान मी बेपता हो जाता है, केवल ईश्वर- अ्ंमात्र शेष रहता है तब सच्चा ज्ञान इश्वरका होता है | इस अवस्था- चाली बुद्धिको अहतम्मरा कहते हँ सो बिना प्रेमके इश्वर्मे चित्त एकापग्र॥ ही नहीं हो सकेगा, और बिना एकाग्न हुए ऋतम्भरा प्रज्ञा न होगी और _. # चित्तका पकाम होना हो समाषि है। उसके दो भेद है (१३) सवितक और (२ ) निवितके । यदि गौमें समाधि की जाय, त्तो पहिले गौमें चित्त स्थिर होकर केवल यौ-शब्द, गौ-अर्थ और गौ-क्षानमात्रका भान रह जायगा । यद्द सवितकों समाधि दै । फिर धीरे-धीरे च्याता और ध्यानका भी भान जाता रहेया, केवल गौ-अर्थमात्र रद्द जायगा । यही नि्वित्के समाधि है।
चले रामरहस्य
बिना ऋतम्मरा प्रशाके ईश्वरका सच्चा ज्ञान हो नहीं सकता, इसीलिये कहते हैँ कि केवल शान श्रम है )
संगुण ब्रह्ममें चारों प्रकारकी समाधि होती है--सवितर्क, निर्वित॒र्क, सविचार और निर्विचार । भगवानका स्थूछ रूप विराद है, अतः उसमें सवितर्क और निर्वितर्क समाधि होती है, और हिरण्ययर्म तथा ईश्वर सूक्ष्मरूप है, क्योंक्रि सक्ष्मताका पर्यवसान अलिह्न (प्रकृति ) तक है; अतः द्रिण्यगर्म और ईश्वर्में सविचार और निर्विचार समाधि होती है। निर्विचारमें निर्वितर्ककी भाँति अर्थमात्रका निर्भास रद जाता है। सवितर्कका स्थूछ विषय है, और सविचारका सूक्ष्म | यही दोनेमि भेद है| निर्विचार समाधिके निर्मल पवाइसे दी अध्यात्मप्रसाद होता है; व्दों ऋतम्भरा प्रशा होती है; उसीसे ईश्वरका साक्षात्कार हों सकता है | भक्तिसे ये सब बातें अपने-आप होती हैं । प्रेममें दी यह सामथथ्य है कि बह प्रेमीकों प्रेमास्पदके सन्निकट बिना जाने भी लिये चला जाता है।
देतु श्रम करहीं-बिना भक्तिके शान चाहनेवालें परिश्रममात्र करते हैं, सिद्धि उनके भाग्यमें नहीं। वे कितना बड़ा परिश्रम करते हैं, सो शानदीपप्रकरणमें देखियेगा, और तिसपर भी यिम्नत्राहुलयसे उनका परिश्रम व्यर्थ जाता है) इसीलिये फल-प्राप्ति न कहकर “अ्रम करहीं? लिखा है |
ते जड कामधेनु गृह त्यागी |
खोजत आकु फिरहिं पय छागी ॥१॥ अर्थ-वें जड़ (मूझ्खे > घरमें कामघेल्लकों छोड़कर दूधके लिये मदार सोजते फिसते हैं । से ज़ड-वे कलिमल्ग्मसित विमृूढ़ हैं; उन्हें समझ नहीं है, यथा--'किमि समुझों मैं जीव जड कलिमल्ग्रसित विमूढ़ ।* संसारसे न तो ममता हटी और न भगवानमें प्रेम हुआ, तब केवछ
शतपश्च चौंपाई छ शतपन्च चापार
ब्रढ्मविचारसे ज्ञान कैसे होगा ! यथा--'बादि बविरति विन बद्य विचारू।? उन्हें तो ब्रक्षविचारका अधिकार ही नहीं | उनका ब्रह्मविचार अनधिकार चेष्टा है, कभी फलसिद्धि नहीं हो सकती | अतः ऐसी चेष्टा करने- वालेको जड़ कहां ।
कामघेज्ठु झुह त्यागी-पहिले भक्तिके लिये “जानि परिहरदी' कह आये हैं।अतण््व जो भक्तिकों जानता है। उसके भक्ति घरमें है। उसे चाहिये कि उसीकी सेवा करे; और छाम उठावे। उसे कहीं कुछ हँढ़ना नहीं है। इतनेपर भी जिसने भक्तिकी उपेक्षा की; उसने मानों घरमें स्थित कामथैनुका त्याग किया । कामघेनु यथेप्सित अम्ृतमय दूध जभी चाहे तभी देती है; और उसके अतिरिक्त भी जितनी कामनाएँ हों उन्हें पूर्ण करती है; इसी भाँति मक्ति भी कामचेनु है। मनचाहा परम कल्याणकर शान तो देती ही है, और जो कुछ मनोंवाज्छित है, उसे पूर्ण करती है। उस भक्तिद्वारा वास्तव ज्ञान न चाहकर निरुपास्ति ज्ञानककी ओर जो दौड़ता है, उसीके लिये कहा जाता है कि इसने घरमें बसी हुई कामचघेनुका परित्याग किया |
पैये छागी-यहाँ पयकी उपमा वास्तव श्ञानसे है। जिस भाँति अमृतमय दूध कासघेनुसे सिलता है; उसी भाँति बासततव ज्ञान भक्तिसे ही मिलता है। यहाँ वास्तव श्ञानसे अभिप्राय श्रीराम ( ज्रह्म ) के शानसे है। बैसे तो घिघयका ज्ञान; देवताओंका ज्ञान, सब ज्ञान ही है, पर ऐसे ज्ञानकी वास्तव नहीं कह सकते ।
,.. खोजत आक् फिरहिं-भाव यह कि कामचेनु घरमें है, उसे तो छोड़ दिया; और दूघके लिये मदार (अक) दूँढ़ता फिरता है। मदारके पोंके तोड़नेसे दो-चार बूँद इबेत रसं टपकता है, जिसे मदारका दूध कहते हैं । उसका रंग दूध-सा दी होता है, पर खाद और गुणमें दूधसे एकदस विपरीत होता है। उससे नेत्रकों बड़ी हानि पहुँचती है। इसी भाँति निरुपास्तिशान भी रूपरंगर्म सोपास्तिज्ञान-सा ही होता है,
प् शामरहस्य
परन्छु किसी पक्रारकी समापत्ति# न होनेसे ऋतम्भरा प्रज्ञा ही नहीं होती । अतः उसमें सोपास्तिज्ञानका कोई ग्रुण नहीं होता, भत्युत उसमें बड़ा भारी दोष आ जाता है | तत्पदवाच्य परमेश्वरकी ओर मन न जनिसे; बह तत्पदके शोधनमें भी सर्वथा असमर्थ है और संसारमें ममता रहनेसे त्वंपदवाच्य जीवका मी शोघन नहीं कर पाता । अतः रुक्ष्यार्थकी उसे प्राप्ति ही नहीं हुईं, ऐक्च वह किसका करेगा £ वाच्याथ। का ऐक्य हों नहीं सकता, अतः मुखसे “बत्मास्मि) उच्चारण करते रहनेपर भी, और सारी शोघनप्रक्रिया कण्ठस्थ की हुई होनेपर मी उसे कल्पशतमें भी शान न होगा | उसकी दृष्टि ही नष्ट हो गयों। अतः निरुपास्तिशान मदारकी दूधकी भोति हानिकर है। निरुपास्ति ज्ञानवालेके लिये अन्त- मुख होना बड़ा कठिन है, अतः उसके प्रयक्षकों 'घरसे बाहर खोजते फिरना? कहा ।
सुनु खगेस हरि भगति बिहाई ।
जे सुख चाहहिं आन उपाई॥ अर्थ-हे खगेश ! खुनो, जो छोग हरिभक्ति छोड़कर दुखरे उपायसे खुख चाहते हैं ।
खुद खगेस-भाव यह कि आपकी अपने आश्रित पक्षियोंपर इतनी प्रीति है कि टिट्विभ[ के अण्डेके लिये समुद्रपर घावा कर दिया। आप
# समाधि |
"| तल पदका वाच्याथ सगुण कष्म और रूध्ष्यार्थ नि्युण जद्या है । इसी भाँति 'त्वं? पदका वाच्यार्थ जीव और लक्ष्याथं कूटस्थ है । जिस माँति महाकाश और घयकाझमम मेद नहीं है, उसी भाँति निययुण अह्म और कूट्खमें भी भेद नहीं दे
4 महामारतमें कथा है कि समुद्रने टिट्टिमका अण्डा बद्य दिया । उसपर ऋद्ध दोकर समुद्र चुखानेके लिये वद्द समुद्रका जल उलीचने लगा । देखा-देखी
0
शतपश्च चौपाई दि
समझ सकते हैं कि खामी अपने आश्ितोंकी कौन-सी सहायता नहीं करता १
हरिभिगति विहाई-शान चाहनेवालके लिये भी ( पहिले कह आये हैं कि ) भक्ति ही उपाय है, यथा--
रघुपति भगति बारि छालित चित, बिलु प्रयास ही सूझे ।
सुकसिदास यह चिद बिछास जग बुझत-बुझत बुझे ॥
अब कहते हैं कि सुखप्राप्तिका भी यही एकमात्र उपाय है; इसके परित्यागसे फिर सुख नहीं; यथा---
सुझ्ु मन सूद सिखावन मेरो ।
हरिपद्विसुख लक्को नकाहु सुख सठ यह समुझ सबेरो ॥॥
बिछुरे ससि रबि सन नयननितें पाचत दुख बहुतेरो |
अमत अमित निसिद्विस गगन महँ तहें रिएु राहु बढ़ेरो॥
छुटे न बिपति भजे बिन रघुपति श्रुति संदेह निबेरो।
तुलसिदास सब जास छाँड़ि करि होहु रामकर चेरो ॥
( विनयपत्निका )
जे खुख चाहहि-सुख तो सभी चाहते हैं, पर सबको सुख चाहनेवाला नहीं कह सकते । जो जान-बूझकर भी दुखदायक वस्तुकों गछेमें बांधे फिरता है, उससे छूटनेका प्रथज्ञ नहीं करता; उसे सुख चाहनेवाला केसे कहें ? यथा---
जद॒पि विपय सेंग सहे दुसह दुख बिपतिजार अरुक्षान्यों।
तद॒षि न तजत सूढ़ समताबस जानतहू नहिं जान्यौ ॥
( विनयपत्रिका )
जो सचमुच विपत्तिजालसे छूटकर सुख चाहता है वही वस्ठुत
सुख चाहनेवाला है |
बहुत-ते पक्षी इस काममें रूग गये | समाचार पाकर गरुड़ आये, भौर सभीत होकर समुद्रने अण्डा लौटा दिया।
० रशामरहस्य
आन उपाई-छुखके उपायमें ही दिनरात जीवमाच छगे हैं, पर सुख मिलता तो नहीं । हाथ आकर भी उँगलियेंके बीचसे निकल जाता है। क्योंकि भजन छोड़कर किसी साधनमें सुख नहीं, बथा--
नाहिंन आवत्त आन भरोसो ।
यहि कल्िकाऊ सकऊ साधन ततरु है श्रम-फलनि फरो सो ॥
त्प तीरथ उपवास दान भखत जेहि जो रुचे करो सो ।
पायेहि पे जासिवों करम-फल भरि-भरि बेद परोसो ॥
आगम-बविधि जप जाग करत नर सरत न काज खरो सो ।
खुख सपनेहु न जोग-सिधि-साधन रोग वियोग भरो स्रो॥
कास क्रोध मद लोभ मोह मिलि ज्ञान बिराग हरो सो ।
द्िगरत सन संन्यास छेतत जरू नावत्त आम यथरो स्रो ॥
बहु मत मुनि बहु पंथ घुराननि जहाँ-तहाँ झगरों सो ।
गुरु कह्यो रास भज्नन नोको सोद्टि ऊगत राज डगरो सो ॥
तुझसी त्रिचु परतीति प्रोति फिरि-फिरि पचि मरे सरो सो ।
राम नाम-न्योध्दित भवसागर, चाहे तरन तरो सो ॥
( विनयपत्निका )
ते सठ महासिंधु बिनु तरनी । पैरि पार चाहहि जड करनी ॥ २॥
अर्थ-वे दाठ हैं, बिना नावके अपनी जड करणीसे तैरकर बड़े भारी समुद्गको पार किया चाहते हैं । ेल् ते खठ-भक्तिका परित्याग करके सुखके लिये अन्य साघनोंका भरोसा करना अपनी आत्माकों धोखा देना है । अतः ऐसा करनेवार्छको छठ कहा; यथा--- कपट सार सूची सहस, वॉधि वचन परवास | करि हुराव चह चासुरी सो सठ तुझसीदास ता
दतपशञ्च चौपाई ८
महालिशु-सब प्रकारके शोकोंका देनेवाल। देहाभिमानका , महासमुद्र है; न इसका थाह है न वारापार है | रागादि जल-जन्तुओसे भरा हुआ है, संकल्पक्ती वड़ी-बड़ी लहरें दिनरात इसमें उठा करती हैं, यथा--
कुनप७-असिसान सारयर स्यंकर घोर विपुरू अवगाह दुस्तर अपारस । नक्र रागादिसंकुल सनोरथ सकरछ संग संकष्प वीची विकारम ॥ ( विनयपत्रिका )
बिना इस समुद्रके पार किये सुख मिल नहीं सकता, अतः सुखा र्थी- को इसे पार करना ही होगा ।
विज्ठु तरनी-नदीके पार जानेके लिये नौकाकी आवश्यकता पड़ती है, फिर समुद्रके पार जाना तो विना नौकाके हो ही नहीं सकता, इसी भाँति बिना भक्तिके देहामिमानसागरके पार कोई जा नहीं सकता । अतः भक्ति दुःखसागरके पार जानेका एकमात्र साधन है ।
जड करनी-माव यह कि विचारविहीन करणीकों जडकरणी ० धो कहते हैं, यथा--
गगन समीर अनल जल घरनी । इनके नाथ सहज जड करनी ॥ अतणएब जडकरणीसे पार जानेकी प्रक्रिया ही नहीं हो सकती | समुद्रमें अति जुद्धिमान् भी दिल््मूढ हो जाते हैं; यह पता ही नहीं चलता कि हम कहॉपर हैं, और किस ओर जा रहे हैं। खगोंछ और भूगोलछके परिशाता ही अनेक साधनसम्पन्न होकर महासागर्में अपना पथ निश्चित करते हुए. जहाज़ चछाते रहते हैं, जडकरणी होनेसे किसी माँति बेड़ा पार नहीं होता | अथवा यदि जडकरणी शब्द महासिन्धुका विशेषण मान लिया जावे तो यह अर्थ करना पड़ेगा कि यदि समुद्र चेतनकरणी होता तो अनुनय-विनयसे मी किसी प्रकार प्राण-रक्षाकी आशा की # देहामिभाव
९ रामरदस्य
जा सकती थी; पर समुद्र तों जडकरणी है, उससे किसी प्रकारकी सद्दयताकी आशा नहीं की जा सकतो ।
दैरि पार चाहत-सुजवलूसे तिरा चाइता है | पहिले तो इतनी सामरथ्य मनुष्य-शरीरकों हो ही नहीं सकती कि भ्रुजबलसे महा समुद्र तिर सके; दुसरे पर्वतोषम तरंगोंके थपेड़ोंसे विकल होकर उसका आगे बढ़ना असम्भव हो जायगा । यदि कुछ साइसविशेष किया तो जल्जन्तुओंका शिकार हो जायगा । अतः तैरकर मद्दासमुद्र पार करना नितान्त असम्भव है | इसी माँति देहाहंकार ( दुःख ) सागरके पार जानेमें केवछ बाहुबछ अकिश्वित्तर है। भगवानके आश्रय होना ही नौकारोहण है, अपने बरूपर भरोसा करके प्रयक्ष करना तैरकर पार जाना है | कैसा भी तैराक हो, पुरुषार्थी हो, संकब्पतरंगोंके थपेड़ोंसे विकलछ हो जावेगा; इनसे भी यदि बचा तो रागद्वेषघादिका शिकार बन जायगा | तैरकर पार जानेंकी इच्छा ही उसकी मूर्खताकी थ्योतक है। अतः भक्तिका आश्रय करना ही एकमात्र उपाय है । हट
सुनि भुसुंडिके बचन भवानी।
बोले गरुड हरखि म्दुबानी ॥
शर्थ-हे भवानी ! भ्ुशुण्डिके चचन खुनकर गरुड़ दर्षित द्वीकर खदुवानी बोले ।
भवानी--शझ्ूर भगवान् सविधि गरुड़ और भ्ुझण्डिजीका संवाद कद रहे हैं, क्योंकि भवानीका प्रश्न ही यही था कि “ऋददहु कवन विधि भा संबादा ।? सो यदाँपर दोनों भक्तोंमें शान-मक्ति- चिघयक्त प्रश्न उठ रहा है; तथा रामरहस्थका भी वर्णन आरम्भ होनेचाछला है, मवानीके दों प्रश्नोंक्रा उत्तर इसी प्रसंगर्मे होगा, यथा-- (१) भगति ज्ञान विज्ञान बिरागा | छुनि सब बरनठ सद्दित बिभागमा ॥ (२) औरौ रास रदृस्थ जनेका | कहृहु नाथ अति 'बिमछ विबेका ॥
इातपश्च चोपाई १०
अतः भोत्ताकी सावधान करनेके लिये सम्बोधन करते है | सुनि झुझुंडिके बचन-यद कहकर गददजीके चतुर्थ प्रभके जत्तरकी समाप्ति दिखलायी-प्रक्ष यह था कि-+- नाथ तवाश्रम आये, मोर सौह अ्रम भाग। कारन कचन सो नाथ सब, कट्टहु सहित अनुराग ॥ उत्तर हुआ कि भजनक्रे प्रतापसे छोमदा महपिके दापका चरदान- रूपमें परिवर्तन द्वी इस बातका कारण हुआ कि सुघुण्डिके आशभ्वरमके सन्निकट आनेपर गरुड़जीका शोक-मोह जाता रहा । बोले गरुड़-यदि पुनः शक्ल न करते तो संचाद यहीं समाप्त हो जाता। पर अक्त प्रभ्का उत्तर पूरा होते न द्वोंते ही दूसरी शझछ्छा उठ खड़ी हुई, अतः गरड़जी बोछे। उत्तरके अन्त भजन- प्रतापपर भुशुण्डिजीने बहुत जोर दिया | सो वह शद्ठा और भी पुष्ट हो गयी | हरखि स्तदुबानी-भाव यद्द कि भुशुण्डिजी और गरुड़जी दोनों वक्ता और श्रोता भगवद्धक्त ई । भक्तिके उत्कर्षफी कथा कदने और सुननेमें दोनोंकों हर्ष है। बक्ताकों हर्ष, यथा- ग़रुढ बचन सुनि हरपेड कागा | घोलकेठ त्चन सहित अनुरागा ॥ श्रोताकों हपे, यथा-
सुनि भुसुंडिके वचन भवानी | बोले गरुढ हरखि झूदुबानी ॥
गरुड़जी न हैं, अतः मदु बोलनेका उनका खमाव है | संतका लक्षण है कि 'कह सत्य प्रिय बचन बिचारी? । पहले भी कद आये हैं कि कह मदु वचन खगेसः |
तब भसाद प्रश्चु मम उर साहीं । संसय सोक मसोह भ्रम नाहीं॥ ३॥
श्श् रामरहस्य
अर्थ-हे प्रभो ! तुम्हारी रपासे मेरे हद्यमें संशय, शोक, मोह और भ्रम नहीं है । प्रभु-गरुढ़जीने भुश्युण्डिजीको गुरु माना है, यथा- गुरु विचु भवनिधि तरै कि कोई । जो बिरंचि-शंकर सम होई ॥ इसीलिये प्रभ्ु करके सम्ब्रोधन करते हैं, अथवा शोक-मोह-विना- शनमें समर्थ देखकर प्रभु सम्ब्रोधन करते हैं ।
तच प्रसाद-भाव यह कि आपका प्रसाद ( प्रसन्नता )अमोघ है । संशय; शोक, मोह, भ्रमका नाश बड़े-बड़े साधनोंसे भी होना कठिन है, सो वह आपके प्रसादमात्रसे हो गया ।
मम उर माहीं-मेरे हृदयमें शोक-मोहादिने ऐसा डेरा जमा लिया था कि नारद, ब्रह्मा और शब्डरके साक्षात्कारसे नहीं गया, और आपके आश्रमके निकट जआनेसे ही चलछा गया | इसीलिये कहा है कि--
विधि हरिददर कबि कोविद बानी । कहत साधु सहिसा सकुचानी ॥ संसय शोक सोह स्रम-उभ्यकोटि-अवरूम्बी ज्ञानकों संशय कहते हैं, यथा-- सी जवतार सुनेडें जग माही । देखेडें सो प्रताप कछु नाहीं ॥ इ्टके नाशसे जो दुःख होता है, उसे शोंक कहते हैं, थथा--- बंधन काटि गयडउ उरगादा। उपजा हृदय प्रचंड बिपादा ॥ अज्ञानकों मोह कहते हैं, यथा--- भयड मोहबस तुम्दरह नाई ॥ विपरीत ज्ञानकों भ्रम कहते हैं, यथा--- प्रगट न ज्ञान हृदय अम छावा ॥ नाहीं-भाव यह कि अविद्या मेरे हृदयसे हट ही नहीं गयी;
इतपशथ्च चौपाई श्र
बढिकि मेरे लिये नष्ठ हों गयी। अब आपके आशभमसे योजनभर दूर निकल जानेपर भी पुनः उसके पत्यागमनका भय नहीं दे ।
सुनेठ पुनीत रामगुनग्रामा ।
तुम्हरी कृपा लह्ेड बिश्रामा ॥
अर्थ-रामके पुनीत गुण-आरमॉको तुम्दारी कृपासे खुना और चिशआरम पाया ।
छुनेड-भाव यह कि त॒म्दारी कृपासे सुना | जिस भोंति गरुडजीने उत्कण्ठावश रामकथा झुनानेके लिये बारंबार प्राथना की थी, यथा---
अब प्रश्न कधा सुनावहु मोदी | वार-चार विनवों प्रभु तोहीं ॥ उसी भाँति बार-बार कृतशता प्रकाशित करते हे, यथा--
झुनेठ3ः सकल रघुपति चरित। झुनेठ पुनीत रामगुन झआसा। श्रीरामचरित देखनेसे मोह ओर सुननेसे शान्ति होती है। उमा और गरुड़को चरित्र देखकर ही मोह हुआ था; और कथा सुनकर ही उस मोहकी निद्ृत्ति हुई | भरीरधुनाथ-चरित्र कहकर भोताका संकोच मिटानेके लिये भुश्ण्डिजीने अपने मोहका भी वर्णन किया। तत्पश्चात् जलमाकी भाँति गरुडजीने मी भुशुण्डिजीके विषयमें प्रश्न किये | भुशुण्डि- जीने स्वयं अपना चरित वर्णन किया । भक्तोंके चरित्रम भगवानके शुण- आमका ही वर्णन रहता है; सो 'सुनेउ” कहकर उन शक्काओका समाघान होना दिखलाया | अथवा उत्तर आरम्म करते समय भ्ुशुण्डिजीने कहा था कि “तात सुनहु सादर सन छाई” अतः उऊत्तरसमाप्तिपर भुझुण्डिजी कहते हैं कि 'सुनेउऊ” अथौत् मन छगाकर सुना | पुनीत रामगुनआञमा-यहाँ 'शुणप्राम! कहकर बहुवचनका प्रयोग किया । गुणम्ाम शुर्णोके समूहको कहते हैं । स्ठ॒तिमें गुणसमूह-
श्३् रामरहस्य
का कीर्तन होता है। रामचरितमें उल्लेखयोग्य गुणप्रामोका संकीर्तन छब्बीस स्थानोमें है, और उब्बीस विशेषण# छब्बीसों श॒ुणग्रार्मोर्म क्रमशः भलीभौंति छाग॒ होते हैं, यथा अक्षस्त॒तिके साथ 'जगमझ्जलछ गुनग्राम रामके' ऋददना मलीमौँति बैठ जाता है | जगमंगलके लिये ही बह्नस्त॒ति हुई थी और उसका परिणाम भी जगन्मज्ञलमय द्वी हुआ, इसी भाँति भगवान: के श्रीमुखसे उपदेश पाकर पुरवासो कऋृताथे हुए। तब उन लोगोने स्तुति की | यह पचीसवीं लति है । इसका सम्बन्ध पचीसर्वे विशेषण पावन गंगतरंय सालसे? है | पावन होना ही छततार्थ होना है| विस्तार- भवसे सब नहीं लिखा। पावनमें ही सब विशद्येषणोंका अन्तभोव हो जाता है । ठुम्हरी कृपा-वहाँ देहछीदीपकन्यायसे प्रयुक्त हुआ है| सुनेर्टे पुनीत रामगुनपासा | तुन्दरी कृपा छहेडें बिश्रामा॥
भाव यह कि तीनों बात तुम्दारी कृपासे ही हुई--( १) संशय- शॉकादिका जाना (२) रामगुणग्रामम्वण और ( ३ ) बिश्रामप्राप्ति । छट्देडे विश्रामा-भाव यद्द कि संशयवालेको चिश्राम नहीं मिलता, डसकी दद्ा सर्प-दंशित मनुप्यकी माति हो जाती है । जिस भाँति सौंप काठे हुएको लहर आती है, उसी भाँति संशयीको डुःखद क्ुतर्ककी लहरें उठती ई, संशवीको न इस लोकमें सुख हे न परलोकमे | यथा---
संसय सर्प उ्रसेंड मोद्धि ताता | दुखद लहर कुतक चहु आबाता ॥
तच सरूप गारुडि रछुनायक । मोद्दि जियाएुड जनसुखदायक ॥ पहले तो “उपजा द्वदय प्रचंड बिषादा! और अब हृ्षित होंकर
मृदु वाणी बोलते हैं । अतः कहते हैं कि 'लहैठ विश्ञामा !?
# वालकाण्डके ३७ वें दोदेमें रामगुणघामके छब्बीसों विशेषण वर्णित हैं जागमंगल गुनग्राम रामके? इत्यादि ।
इआतपश्च चौपाई १४
एक बात प्रभु पूछों तोही। कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही॥ ४ ॥
जर्थ-हे प्रभो! एक वात तुमसे पूछता हैँ, सो दे रृपानिधे ! मुझे समझाकर कहो ।
एक वात-भाव यह कि पहले चार बातें पूछी थी--( १ ) कारन कवन देह यह पाई (२) रामचरित सर सुन्दर स्वामी पायेहु कह्दों (३) महाप्रल्यहु नास तब नाहीं तुमद्वि न व्वापत काल अति करार कारन कवन और (४) तब आश्रम आये डे मोर मोह भ्रम भाग; सो कारन कबन । इन चार्रोका उत्तर हो गया। अन्तमें फिर एक शक्का उठो) वही पूछते हैं । परभ्च पूछों तोही-माव यह कि आप गुर है । आपसे बात छिपामिसे निर्मेल विवेक नहीं हो सक्रेगा, यथा-- संत कहहिं अस नीति प्रभु, शुत्ति पुरान सुनि गाव । होह न बिसछ विराग उर, गुरुसन किये दुराव॥ कृपानिधि-सम्बोधनका भाव यह क्रि गुरु कृपानिधि दोते है। समुद्रमें नयी-नयी तरज्लें उठा करती हैं, अतः बार-बार समाधान करनेपर
भी शिष्यके हृदयमें सन्देह उठनेसे शुरु कृपा करके समाधान करनेमें उद्दिम्र नहीं होते, यथथा--
बिगरी सुधार कृपानिधिक्ली कृपा नई। मोहि चुझाड कहौ-सुझे जो शझ्ला उठनेवाली थी, उसका भी समाधान आपने संक्षेपरूपमें जे दरिभगति जानि परिहरहीं”
इत्यादि दो चौपाइयोंमें किया, परन्तु मेरी अश्नान्तिकरे लिये समझाकर कहिये | अन्य पक्षी छोग बहुत दिनसे कथा सुनते हैं, अतः उन्हें सब
श्ष ; रामरहस्य
विषय अश्नान्त हैं, वे संक्षेप समझ सकते हैं । मैं ही नया सुननेवाला हूँ, अतः मुझे समझाकर कहनेकी आवश्यकता है |
कहहिं संत मुनि बेद पुराना । नहिं कछु दुरलुभ ज्ञान समाना ॥। अर्थ-खंत, मुनि, चेद और पुराण कहते हैं कि शानके समान कोई वस्तु छुलऊेम नहीं है| खंत मुनि कहहद्धि-वेद-पुराणमेंसे उपयुक्त सार अद्ण करके सर्व- हितके लिये प्रचार करनेवाले ही साधु-संत हैं| यथा-- बेद पुरान उदधि घन साथू । और रागद्वेषरहित, तपस्वी, मनुष्यसमाजसे प्रथक् वनमें रहने- वाले मुनि हैं, यथा-- सुनहु भरत हम झूठ न कह्दहटीं । उदासीन तापस त्रन रहहीं ॥ अतः संत और मुनिके आत्त होनेमें सन्देह नहीं है, और आर्तेका वाक्य प्रमाणरूपसे शहीत होता है; सो वे छोग कहते हैं । वेद् घुरान-भाव यह है कि वेद खतः प्रमाण हैं, और पुराण भी वेदाथके उपबूहण ( पुष्ट ) करनेसे पद्चमम वेद कहलाते हैं, ये मी परतः- अमाण हैं । इन दोनोंके वाक्य आतवाक्य हैं | पुराण और वेदोंमें ही
अज्ञातार्थ ज्ञापकत्वक है। सो ये भी ऐसा ही कहते हैं, अर्थात्त् इस वातमें सबकी एकवाक्यता है कि 'नहिं कछु दुरूमस शान समाना !? यहाँ
# नहीं जानी हुई वातका जनाना शाखका काम है। जिन बाततोंको मनुष्य अपनी बुद्धिसे जानता है या जान सकता द उन बातोंके कइनेमें शास्षकी उपयोगिता नहीं है | शासतत्रका कार्यकारित्व तो इसीमें है कि मानव- बुद्धिके अगोचर जिषयका वर्णन करे ।
शतपश्च चौपाई रद
चेदकी चार संख्या और पुराणकी अठारह संख्या होनेसे, 'पुराणा” बहुवचनका प्रयोग किया । * शान समान नहिं-प्रुरुषार्थचतुष्टयमेंस अक्षय मोक्षके साघन होनेके कारण ज्ञान ही सर्वोत्कृष्ट है, शान-सा पवित्र कुछ भी नहीं है। ज्ञान नित्य है। ज्ञान उत्पन्न नहीं होता, अतः अज्ञानके अपसरणकों ही ज्ञान होना कहते हैं। ज्ञान बिना मुक्ति नहीं होती, यथा- पान मोच्छप्रद बेंद् बखाना। इसलिये कहद्दा कि शानके समान कुछ भी नहीं | कछु दुरछभ-भाव यह कि इस जगत्में दुलूम वस्त॒का ही मूल्य है। जो वस्तु जितनी अधिक दुर्लभ है उतना ही अधिक उसका मूल्य है, और मूल्यवान् पदार्थका ही जगत्में आदर है, उपयोगितापरदी आदर निर्मर नहीं है। अल्पोपयोगी मणि-माणिकका अत्यन्तोपयोगी अन्न-जलसे कहीं अधिक आदर है। यथा-- मनिमानिक भहँगे किये सहँगे तन जर नाज्ष । तुलसी एुतो जानिये राम गरीबनेवाज ॥ ( दोष्ठावली ) अतः सबसे अधिक मूल्य मोक्षका है, क्योंकि वह अति दुलंभ है, थथा--- जति छुरूभ कैचल्य परमपद्। ज्ञानसे कैवल्यपद द्वोता है, हुलूमका साधन सुरूम नहीं हो सकता अतः कहा कि ज्ञान-सा कुछ दुलम नहीं ।
सोइ मुनि तुमसन कहेउ गोसाई । नहिं आदरेड मगतिकी नाई ॥ ५॥
अर्थ-हे गोखाई ! चही सुनिने तुमसे कहा, स्रो ( तुमने उसका ) भक्ति-खा आदर नहों किया ।
श्छ रामरहस्थ
गोंखाई-हब्द प्रभुके अर्थमें व्यवद्वत दिखायी पड़ता है; यथा--- सो गोसाहँ जेद्धि विधिगति छेकी । सके को टारि टेक जो टेकी ह# स्वासि,गोसाइद्दि सरिस गोसाईँ ॥ राखा मोर दुलार ग्रोसाएईँ ॥ -त्यादि सोद मुनि तुमसन कहेंउ*भाव यह कि शानप्रदानर्म तीन बातें आवश्यक हैं-(१) ज्ञान (२) गुर ओर (३) अधिकारी । जहाँ तीनों उत्तम एकत्रित हो जायें वहाँ अनादरके लिये कोई कारण नहीं है। 'सोइ से यहाँ वही अनुपम दुलेभ ज्ञान अमिप्रेत है; मुनिसे यहाँ उपदेश गुरु महषि छोमझसे तात्पय है; 'तुमसन' से परम अधिकारी स्वयं भरुश्ण्डिजी कहे गये हैं | यहाँ तीनों बातें उत्तम-से-उत्तम वन गयीं, ब्रद्मज्ञानसे बढ़कर कोई शिक्षा नहीं, यथा--“मूहु परम सिख देखे न मानसि ।? रामचरितमानसर्म महर्पिषद छोमशकों ही दिया गया है, यथा--दीन्ह महाक्रपि श्ञाप” सो इनसे बढ़कर गुर कौन होगा ! मनुष्योंमें मोक्षका अधिकारी ब्राक्षण है, इसीलिये उसके दारीरकों चरम ( अन्तिम ) कहा गया है, यथा--चरम देह ह्विजकर मैं पाई !! तिसपर भी अुझ्ुण्डिजीका छृदय सब वासनाओसे रहित था, यथा--“मनते सकछ बासना भागी ।? इसीलिये मुनिजीने इन्हें परम अधिकारी माना, यथथा--- “मोहिं परम अधिकारी जानी |? यहॉपर अनादरके छिये स्थान नहीं था, तीनेंमेंसे यदि किसीमें त्रटि होती तो अनादरका ग्रवेश हो सकता था | नहिं आद्रेड-भाव यह कि उपदेशके समय दूसरी बात मनमें सोचना ही उपदेशका अनादर है; और हृठ करके उपदेष्टाकी वात काटकर दूसरा पक्ष खड़ा करनेसे बढ़कर और क्या अनादर होगा सो ये सब बातें भुशण्डिजीसे हुईं, यथा-- यद्दि विधि विविधि जुझुति सन गुनेऊँ। सुनि उपदेस न सादर सुनेऊँ ॥
सब में निरयुन मत करि दूरी। सशुन निरूपों करि हठ भूरी व
इसीलिये गरुड़जी कहते हैं कि आपने आदर नहीं किया | ः्
इातपञ् चौपाई श्८ डतपञ्च चापाई
भगतिकी नाई-भाव यह कि जब राममन्त्र दिया; और वालकरूप शासका ध्यान बतछाया तब खूब मन छंगाकर सुना, यथा--झुंदर सुखद मोहि अति भावा ।* इससे सक्तिका आदर करना सूचित हुआ |
ज्ञानहि सगतिहि अंतरु केता । सकल कहहु भ्रञ्च॒छ्ुपानिकेता ॥
सर्थ-हे प्रभु कृपानिकेत! शान और भक्तिमें कितना अन्तर दे सो खब कहिये।
शानहि' भगतिहि-माव यह कि जाननेको शान और परम प्रेमको मक्ति कहते हैं | यहाँ जो शेय है चही परम प्रेमास्पद है। उसी आननद- सिन्धु सुखराशि रामको जाननेकों ही ज्ञान कहते हैं; आनन्दानुभूति और प्रेम कोई दो प्रथक् वस्तु नहीं माल्म पड़ती | जहों आनन्द है वहीं प्रेम है, जहाँ प्रेम है वहीं आनन्द है | यदि कोई प्रेम करता है तो उसे आनन्द अवदय मिलता है, न मिला होता तो वह प्रेम न करता, और जिसे आनन्दानुमव हुआ वह प्रेम न करे ऐसा हो नहीं सकता; यदि कोई प्रेम नहीं करता तो यही समझमें आता है कि उसे आनन्दानुभव छुआ ही नहीं; सो देखनेमें तो शान और भक्तिमें पूरा-पूरा सामानाधिकरण्य मालूम होता है |
अंतर केता-अन्तरके तारतम्यसे ही आदरका तारतम्य होता है। मेरी तों यह समझमें नहीं आता कि किसका अधिक आदर करें और किसका कम); क्योंकि अन्तर कुछ मालूम नहीं पड़ता ।
सकछ कहहु-आपके वर्तावसे साधन और सिद्धि दोनोंमें अन्तर मालूम पड़ता है। साधनमें अन्तर है इसलिये आपने मुनिके उपदेशको आदरपूरवक अ्रवण नहीं किया। सिद्धिमें भी अन्तर है, तभी आपने नि्ुण मतको दूर करके सशुणका निरूपण किया। अतः साधन था सिद्धि जहाँ-जहाँ अन्तर हो सो सब कहिये !
५९ शामरहस्य
प्रशु कूपानिकेता-भ्ुश्वण्डिजीकों समर्थ समझते हैं कि वह सब शह्ठाओँका समाधान कर सकते हैं। क्योंकि भ्रुशण्डिजीकी स्तुति स्वयं शबड्भरजीने गरुडजीसे की थी, यथा--“जाकी अस्तुति सादर निज मुख कीन्ह महेंस ।? इसलिये प्रभु सम्बोधन दिया | विनिमयमें कुछ न चाह- कर अभूल्य उपदेश देनेका कष्ट सिवा कृपानिकेतके और कोई स्वीकार नहीं कर सकता, इसीलिये कृपाका घर ( कृपानिकेत ) कहा ।
सुनि उरगारि बचन सुख माना । सादर बोलेड काग सुजाना ॥ ६ ॥
अथे-उरगारि ( गरुड़ ) का वचन खुनकर झुख माना ( तव ) आदरके सद्दित खुजान कागजी बोले ।
उरमारि वचन-गरुड़जी सॉपोके शत्रु हैं, खूब खोज-खोजकर प्रइन पूछते हैं, अथवा अब मोह-अ्रमादि सपाके पीछे पढ़े हैं, निःशेष करके ही छोड़ेंगे ।
खुनि खुख माना-भाव यह कि ममके समझनेवाले श्रोताकों पाकर वक्ता उुखी होता है | गरुडजीके वचन सुननेसे यह मालूम हुआ कि वह उनके उपदेशको यथायत्त् घारण कर रहे हैं । जहाँ कहीं तनिक-सी मी बात बेंठनेमें रुकती है, ठुरन्त मइन कर ब्रैठते हैं | हमारे अविनयपर अदन हो रहा है; यह समझकर रुष्ट न हुए प्रत्युत परहितैकजत मुझुण्डिजीने संशयोच्छेदनका थुनः अवसर पाकर सुख माना । इससे भुझ्चण्डिजीकी कृपानिकेतता कही ।
सादर वोलेड-भाव यह कि उत्तम वक्ता पाकर भोतागण ही नहीं कृतार्थ होते; गुणी भीता पाकर वक्ता भी कृताथ होते हैं, उपयुक्त प्रश्न सुनकर आदर करते हैँ | यहाँ गरुड़जीकी तीज जिज्नासा देखकर, तथा अपने प्रति पूर्ण आस्था देखकर आदरसहित बोले | अथवा गरुड़जीके मनको. रामग्रेमसे सरस देखा, कि ये भक्तिका सविस्तर वर्णन सझुननेके
पसौपाई हा चतपञ्ञ चौपाई प्र
लिये ज्ञान-भक्तिको आमने-सामने रखकर बदन कर रदे दूँ; अतः सादर बोले, यथा---
शाम सुप्रेम सरस भन जासू। साधु सभा बद जआादर तासू ॥
यहाँ गरड़जीका आदर पश्षिराद होनेके नाते नहीं हो रहा है; बल्कि रघुनाथकका प्रियदास होनेके नाते हो रहा है, यथा-“रघुनायकके मम प्रिय दासा! ।
काग खुजाना-भाव यद्द कि काग महामन्दमति दोते हैँ, कठोर- वबादी होते हैं, यथा--'मद्दामन्दमति कारन कागा? सो भुशुण्डिजी सुजान काग हैं, मधुर भाषी हैं, यथा--“मधुर बचन बोलेठ त्तव काया! | सुजान साधु होते हैं, सुशील होते हैं, कृपा द्ोते हैं, सबकी सुनते ई। सबका सम्मान करते हूँ, क्योंकि सुवाणी; भक्तिमति और गतिकी उन्हें पहचान रहती है, यथा--
साधु सुजान सुसील नृपाला ]॥ 8००७०७००००० ७+०००७०७ ६०००७ ०क१७७०७०७ ७ || सुनि सनसानद्धि सबह्धि खुबानी। भनिति भगति मति गति पहिचानी ॥
अतः गरुड़जीकी वाणी भणित्ति; भक्ति, मति और गति पहिचान- कर उनका आदर किया । इससे कागजीकी प्रभ्ुता कही ।
भगतिहिं ज्ञानहिं नहिं कछु भेदा । उसय हरहि भव संभव खेदा ॥
अर्थ-भक्ति और ज्ञानमें कुछ भी भेद नहीं है, दोनों संखारसे पेंदा हुए दुश्खॉकोी हरण करते हैं ।
भगतिहिं ज्ञानहि-भाव यह कि यथार्थ ज्ञान और संवादी अ्रमकों ही क्रमशः जशञान और भक्ति कहा जाता है। मणिमें सणि-बुद्धि होना यथार्थ ज्ञान है और मणिकी प्रभामें मणि-ज्ञानसे प्रइत्त होना संवादी भ्रम
है; इसी भाँति ब्रह्मका अपरांक्ष ज्ञान होना तत्वज्ञान है; और उसकी उपासना संबादी भ्रम है |
श्र रामरहस्प
नहिं कछु भेदा-भाव यह है कि तत्वश्ञान और संवादी अम्में कोई भेद नहीं है । मणि-अ्रमामें मणि-चुद्धि होना यद्यपि श्रम है तथापि डसकी प्राप्तिके लिये दौड़ते हुए पुरुषको मणि-प्रासि होती है। अतः मणि-आसिरूपी फलके समान होंनेसे अभेद कहा | प्रशन यह था कि 'ज्ञानहिं भगतिहिं अन्तर केता! । अब प्रदनकर्तानें जिस बावकों मनमें रखकर प्रइन॒ किया था उसीकी युष्टि करते हुए कहते हैं कि “भगतिहिं शानहिं नहिं कछु भेदा! । भव संभव खेदा-संसाररूपी वनमें दुःख-ही-दहुःख भरा है । इसीसे 'सखेदा? कहकर बहुवचनका प्रयोग किया । अन्थकारने विनय-पत्रिकार्मे संसारकों वन मानकर उसके दुःखोंका बड़ा सुन्दर चित्र खींचा है; यथा-- संसारकांतार, अतिधोर, गंभीर, धन, गद्दन तरु कर्म-संकुछ, झ्ुरारी । घासना चछि खर-कंटकाकुछ विजुुल, निविड़ विटपाटवी कठिन भारी ॥ विविध चितधृत्ति-खगनिकर इयेनो रूक, काक बक घध्न आसिप जहारी । अखिल खल,निपुन छल छिद्र निरखत सदा जीवजन पथिक मनखेदकारी ॥ क्रोध करि मत्त, ख़यराज कंदप, सद-दर्प श्रक-भालु अति उम्रकर्मा । सहिय भत्सर ऋूर, छोमभ सूकररूप, फेर छछ, दंभ भार्जारधर्मो ॥ कपट मकंट घिकट, ज्याप्न पाखण्ड मुख, दुखद मगमात, उत्पातकर्ता । हृदय अवलोकि यह सोक सरनागतं, पाहि मां पाहि, भो विश्वभर्ता ॥ प्रबल अह कार दुर्घेट महीधर, महामोह गिरियुह्दा निविडान्धकारमस, । चित्त वेताल भन्॒जाद मन, प्रेतगन रोग, भोगौध घृश्चिक-विकारमस ॥ विपय-सुख-छालसा दंस-मसकादि,खल झिछिरूपादि सब सर्प,स्वासी। ततन्न आक्षिप्त तव विपम साया नाथ अंध मैं मंद व्यालादगासी ॥ घोर, अवगाह भव जापगा पापजलपूर दुष्पेंद्ष्य दुस्तर अपारा | सकर पडवर्गं गोनक्र चक्राकुला छूछ सुभ असुभ दुख तोन धारा ॥ सकक संघट पोच सोचवस सवंदा दास तुझसी बिपम गहनअस्तम् । न्राहि रघुवंशभूपण कृपाकर कठिन काछ बिकराल-कलिन्नास-ब्रस्तम् ॥
उभय हरहिं-भाव यह कि भक्ति और शान दोनोंहीसे उपयुक्त
]
इशतपश्च चौपाई श्र
दुशखौकी निद्गत्ति होती है।दोनोंका एक फल है कि जीव संसारके दुः्खोंसे छूट जाता है। अब दहला यह होती है कि फिर आपने विशेष आदर क्यों किया ! अतः कहते हैं---
नाथ मुनीस कहहिं कछ अंतर । सावधान सोउ सुलु बिहंगबर ॥ण।
अर्थ-हे नाथ ! मुनीश छोग कुछ भेद (अन्तर ) बतछाते हैं, उसे सी दे विहंगवर | खुलो ( नाथ-मभाव यह कि पक्षिराद होनेसे गरडजीको “नाथ कहकर सम्बोधन किया; अथवा आदस्से नाथ कहा । मुनोस कद्दहिं-भाव यह कि भ्ुश्ण्डिजी बढ़े सुशील हैं, यथा-- ८तहूँ रह कागभुशण्डि सुशीलछा? ऐसे गहन विघयर्म अपने मतकों प्रमाण नहीं मानते; अतः मुनीशोका मत कहते हूँ । ममन करनेवालॉको मुनि कहते हैं, अति विचारशीलकों मुनीश कहते हैं । मनीश आतत हैँ, इनका वचन प्रमाण है। कछु अंतर-भाव यह कि मननशीलॉको कुछ अन्तर दिखलायी पड़ा है। वह अन्तर सूक्ष्म है; अतः सबको नहीं माढूम पड़ता । उसी अन्तरकों मुझशुण्डिजीने भी प्रमाण मानकर, भक्तिके प्रति अधिक आदर दिखलाया । बिहंगवर-भाव यह कि आप विहंगमार्गी शानियोंमें श्रेष्ठ हैं, इसके समझनेके अधिकारी हैं अथवा श्रोताओंमें प्रमुख हैं, यथा--“आदें उनें अनेक विहंगा” यहाँ पक्षीमावमें कथा होती रही, इसलिये श्रोताओंमें सिवा पक्षियाँके और कोई नहीं था, यथा-- कहछु एड्विते पुनि मैं नद्टि राखा। ससुझे खग खगहीकर भाखा ॥
सावधान सोड झुछु-माव यह कि उस अन्तरकों मी सावधान होकर सुननेके लिये आदेश देते हैं | साम्य तो सुन चुके अब अन्तर भी
३ | “. ” शामरहस्य
सुनो | तनिक भी अनवघानता होनेसे समझमें नहीं आवेगा | भक्ति और ज्ञानका विषय ही ऐसा गूढ है कि श्रेताको सावघान करना ही पड़ता है। मगवान् भ्रीरामचन्द्रने खयं इसी माँति लक्ष्मणजीको सावधान किया । यथा--सुनहु तात मतिमन चितकछाई |?
ज्ञान बिराग जोग बिज्ञाना | ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना ॥
ज्ञान-भाव यह कि ज्ञान दो प्रकारका होता है--( १ ) परोक्षश्ञान और (२) अपरोक्षज्ञान | ब्रक्षकों सबर्मे समान देखना ही परोक्षज्ञान है, यथा--- ज्ञान समान जहाँ एकौ नाहीं । देखदटिं मह्म समान सब साहीं ॥ विराग-नैराग्य भी दो प्रकारका होता है---(१) वशीकार और(२) परवैराग्य । देखे हुए. विधय और खर्गादिक्रे सुने हुए मोगोंसे तृष्णारहित डोनेकों व््चीकारवैराग्य कहते हैं, यथा--- एट्टि लनकर फछ विपय न साईं। खगहु सर्प अंत दुखदाईं॥ पुरुषके साक्षात्कारसे गुणोंमें तृष्णारहित होना परवैराग्य है, यथा--- कट्टिज तात सो परम विरागी। तून सम सिद्धि तीन गशुन त्यागी ॥ जोग-चित्तवृत्तिके निरोधको योग कहते हैं, यथा-- सन थिर करि तब शंभ्ु सुजाना । ऊुगे करन रघुनायक ध्याना ॥ यह बिना अभ्यास-चैराग्यके नहीं होता और न बिना योंगकी सहायतासे ज्ञान हों सकता है। यथा--धर्म ते विरति योग ते ज्ञाना ।? विज्ञाना-जहाँ ज्ञानके साथ विज्ञानका पाठ है, वहाँ ज्ञानसे परोक्ष- ज्ञान और विज्ञानसे अपरोक्षजश्ञान लिया जायगा, यथा--दुर्लम ब्रह्मलीन
विज्ञानी! और जहाँ केवल ज्ञान ही पठित है वहाँ प्रसज्ञानुकूल दोनों अर्थ डिया जायगा |
दतपश्च चौपाई य
झुनहु हरिजाना-भाव यह कि हरिके यान होनेसे आप बड़े पुरुषार्थी हैं । जिसमें कोई पुरुषार्थ ही नहीं वह पुरुष कैसा £ पुरुषार्थ चार माने गये हैं--घर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । इनमेंसे घम और अर्थ साधनरूप हैं, अतः फलरूप काम और मोक्ष दो ही पुरुषार्थ हैं। इन दोनोंमें मी नित्य होनेसे मोक्ष परम पुरुषार्थ है | पुरुषार्थके लिये स्वात्मावरूम्बन परम आवश्यक है; यह आप अच्छी तरहसे जानते हैं ।
प्. सब पुरुष-भाव यह कि चेतन पुरुष और जड़ प्रकृतिके योगसे ही यह सृष्टि ( जगत् ) है, अथौत् चेतन और जड़की भक्न्थि अथवा अभिमान ही जगत्का मूल है । इस ग्रन्थिके बिना छूटे जगत्से निस्तार नहीं, अतः शान विराग योग विश्ञान ये सब इस ग्रन्थिकों तोड़कर मोक्ष देनेवाले हैं | अतः बड़े स्वात्मावरूम्बी पुरुषार्थी हैं, पुरुषपदवाच्यके योग्य हैं। यथा--
अर्म ते बिरति ज्ञोग ते ज्ञाना | क्वान सोच्छप्रदु जेद बखाना ॥
थे मायाके प्रतिदन्द्दी हैं। अतः इनकी चेतनमें ही गिनती है ) पुरुष प्रताप प्रबकू सब साँती। अबला* अबल सहज जड जाती ॥ < ॥
अर्थ-पुरुषका प्रताप सब भाँति प्रबछ होता है, और जड जाति अबला ( री ) है; खभावसे दी निरबंऊ है।
पुरुष ध्रताप-भाव यह कि प्रताप पुरुषके हिस्सेकी वस्त है! खाबरूम्बी पुरुषार्थीका ही प्रताप होता है, और प्रतापसे दुष्कर कार्य सुकर हो जाता है; यथा--“श्रीरघुवीरप्रतापते सिनन््धु तरे पाषान! सो
# शानविश्ञानमें इमशभ्रु ( दाढ़ी-मूछ ) आदि कोई पुरुषके चिह्न नहीं है, और न माया-भत्तिमे कुच-केशादि कोई स्रीके चिह हैं, अतः चेतन जाति और जडजातिके विभागसे पुरुष-सख्रीका विभाग माना ।
रु शामरहस्य
ज्ञान विराग योग विज्ञानका भी प्रताप है | उन्हें कुछ करना नहीं पड़ता । उनके रहनेसे ही मोह भाग जाता है। यथा-- झुनु सुनि मोह होहमन ताके । क्वान विराम हृदय नहिं जाके ॥ प्रवछ सब भाँती-भाव यह कि चित् जडकी ग्रन्थितक छोड़नेमें समर्थ है, बथा-- गॉठि विन्नु ग्रुलकों कठिन जड चैतनकी, छोरयो अनायास साधु सोधक अपानको॥ ( गीतावली ) जडजाति अवला-जिस भाँति चेतनकों पुरुष कह्दते हैँ उसी भौति जड जातिकों अब्रछा (स्त्री ) कहते है | जड़ प्रकृति या माया है | जिस भाँति ज्ञान वैराग्य आदि प्रन्थिकि छोडनेवाले हैं, उसी भाँति मोहादि श्रन्थिकों दृढ़ करनेवाले हैं| अतः इनकी भी गिनती जड जातिमें है, यथा--- काम क्रोध सदर छोम सब प्रवक्त मोहदकी धारि। लिन भहँ अति दारुन हुखद मायारूपी नारि॥ सहज निर्बंलता द्योतन करनेके लिये ही बहुत-से पर्यायेक्रे रहते हुए भी “अबला” पद दिया। सहज अवरछ-भाव यहद्द कि प्रकृति या मायाकों बल नहीं है, यथा--- सुन्ठ रावन ब्रह्मांड निकाया । पाष्ठ जासु चकछ विरचति साया ॥ एक रचह जग ग़ुन बस जाके । प्रश्मु पेरित नहिं निजबल ताके ॥ जासु सत्यता ते जड़ माया। भास सत्य हृव मोह सहाया ॥
अतः इसमें स्वावलम्बन नहीं | यह इंचिरूपी ज्ञानसे नष्ट हो जाती है। इसीलिये इसे सहज निर्वल कहा )
झातपश्च चौपाई श्र
दो ०-पुरुष त्याग सक नारिहि जो बिरक्त मतिधीर । नतु कामी बिषयाबस बिम्ठुख जो पद रघुबीर ॥
अर्थ-जो विरक्त मतिधीर पुरुष हैं, वे स््रीको त्याग खकते हैं। कामी, विषयोंके चशीभूत और रघुवीरके चरणोंके विस्खुख ऐसा नहीं कर सकते ।
जो पुरुष बिरक्त मतिधीर-यहदाँ 'मतिधीर! शब्दका स्थितप्रशसे अमभिप्राय है । अथोत् ज्ञान-योग-विज्ञानसे युक्त विरक्त पुरष | भाव यह कि पुरुष और नारीमें भोक्तु-भोग्य-सम्बन्ध है । अतः परस्परमें आकर्षण है, एक दूसरेकों छोड़ नहीं सकते; पर ज्ञान-विराग-योग-विज्ञानमें चित्- जडभ्रन्थि छोड़नेकी सामथ्य है। अतः एतद्गुणविशिष्ट पुरुष चित्- जडकों प्थक्-प्रथक् देखता है, अहंकारकी अन्थि उसके लिये खुली हुई- सी है; अस्मिता तनु-अवस्थाकों आ्रास हो गयी है अतः उसे भोक्तु-मोग्य- इृष्टि ही नहीं रहती ।
त्याग सक नारिहिं-भाव यह कि जिसमें मोक्तुभोग्यमावना नहीं है, जिसकी अस्मिता तनु भावको प्राप्त हुई है, जो स्थितप्रश है; वही स्त्रीका परित्याग कर सकता है, मोग्यक्रे आकर्षणसे बचनेकी सामर्थ्य॑ रखता है। ज्लीके समान कोई भी विषय बन्धनकारक नहीं है, ज्ीके त्यागसे और सब विधय त्यक्तके ही समान हैं, उनके त्यागर्में कोई आयास नहीं है, इसील्यि कहते हैं कि वह नारीको त्याग कर सकता है; दूसरे विषयोकी गणना ही क्या है ?
तु कामी विषयावस-जो कामी विघयोंके वशमें है, उसमें जडता
है, दुर्वछता है, चह ज्लीमय है, वह मोग्यके आकर्षणसे नहीं बच सकता;
उससे ज्री नहीं छूट सकती | यहाँ यह कह देना आवश्यक है कि नपननज--_+-_-_++-_---- हे देना आवश्यक छ
#% दग्ध हुए वीजका न उगना तनुत्व कहलाता है। विरोधी भावोंसे उपमदित छुए बलेश तनुत्वको प्राप्त होते हैं ।
म््छ रामरहस्थ वस्तुतः ली और पुरुष, जड और चेतन हैं | ज्ञान विराग योग विशान ( चेतन ) के घर्म हैं; इसीसे इन्हें पुरुष कहा; और काम-क्रोध-मोहादि जडके घर्म हैं, इसीसे इन्हें र्ली कहा । पुरुषधर्म खावलूम्बी है; वलवान् है, वह भोक्तुमोग्यमावका नाशक है, और स््रीधम निबंल है, परमुखा- पेक्षी है, वद भोक्तुमोग्यमावका सदा शिकार बना रहेगा |
विछुख जो पद रघुदीर-माव यह कि शान विराग योग विज्ञानसे युक्त होनेपर भी जो उपासना ( भक्ति ) का विरोधी है वह भी स्त्रीका त्थाय नहीं कर सकता । क्योंकि बिना भक्तिके अभ्यन्तरका मरू जा नहीं सकता, और अभ्यन्तरके मलके रह जानेसे समयपर भोक्त॒भोग्यभावके उदय होनेकी पूरी सम्मावना रहती है। भक्ति बनी रहनेसे बराबर आसश्यन्तरिक मल घुलता ही रहता है; और दृकशक्ति निर्मल बनी रहती है, यथा--
रघुपति भगति वारिछाछित चित बिल्लु प्रयास ही रूझ ।
अतः चेतन-जडके पएथक दर्शन होते रहनेसे भोकतृमभावका उदय
नहीं होता ।
सो०-सोउ मुनि ज्ञाननिधान मगनयनी बिधुमुख निरखि ।
बिबस होहि,।. हरिजान लारि बिस्वमाया प्रगट ॥
अर्थ-चें ज्ञान-निधान मुनि भी झुगनयनी चन्द्रवदनीकों देखकर हे गरुड़जी ! विवश हो जाते हैं। क्री प्रगट विश्वमाया है ।
सोड मुनि ज्ञाननिधान-भाव यह कि विरक्त मतिधीर ही स्थित- प्रश्न है, मुनि है; उसे ज्ञाननिधान इसलिये कहा कि उसमें ज्ञान विरास
झछातपश्च चौपाई न
योग विशान सब कुछ है, उसके छेशोंका तनूकरण हो खुका है, अब उसे
भोक्तृमोग्यभाव नहीं है; संक्षेपतः बह अपने मनकी मार चुका हे सगनयनी विछुस्ुख निरखि-भाव यद्द कि सुन्दस्तामें ऐसी
अपूर्च अमृत-सज्लीवनीशाक्ति है कि वह मरे हुए, मनकों भी जगा देंती है;
अर्थात् तनक़ृत छेश भी उदारावसाकों प्राप्त दो जाता है; यथा--
जागेड मनोभव झुयेठ मन वन सुभगता न परे कही) सीतल सुगंध सुमंद मारुत भदन जनल सखा सट्दी ॥ विकसे सरनि चहु कंज संजुर पुंञण ग्रुजत मधछुकरा । कलइईंस सुक पिक सरस रच करि गान नाचह्टिं अपसरा ॥
३
विवल होटहििं-भाव यह कि विशेष करके वश्य हो जाते दे, जो ही नाच बह नचाती है; वही नाच नाचते हैं । यथा-- चारि विवस नर सकल शोसाएँ ) नाले नट मरकटकी नाहं ॥
इरिजान-भाव यह कि दरिजान सम्धोंधन करके जिस बातको उठाया था; उसीको हरिजान सम्बोधन करके ही समाप्त करते हैं, यथा--
एु सब पुरुष सुनहु हरिजाना। और 'विवस होहिं हरिजान ।? विखमाया-भाव यह कि संसारमें जितनी माया है उनका यांदि विभाग किया जावे तो उत्पक्ति, मछय और नाशमें सबका अन्तभांव हो
जाता है | भाया उसीको कहते हैं, जो झुठ होकर सत्य-सी भासे ।
नारि प्रगट-सों सब साया ह्नीमें प्रकट है, और जगत्में गुप्तख्पसे है । जगत्की सष्टि किसीने देखी नहीं, नाश कोई देख नहीं सकता; जो शक्ति पालन कर रही है, उसका दर्शन दुर्लूम है; बहुत बड़े-बड़े विचारशीलेको उसका कुछ आभासमात्र मिलता है | स््रीमें ये सब बातें प्रकट हैं, यहींसे सब मायाका दर्शन होता है । जिस भाँति स्रीसे जीवोंकी उत्पत्ति, पालन और नाश होता है, उसी भाँति मायासे संसारकी उत्पत्ति, पाछलन और नाझ होता है | भेद इतना ही है कि स्रीका
38 रामरहस्य सम्बन्ध व्यष्टिसे है और मायाक्रा समष्टिसे । अधिचारतसे ही स्त्री रमणीया है; विचारसे घणित वस्तु, रक्त, मांस, मजा, स्नायु, अस्थि; चर्मादिका पिण्ड है और दिखायी इतनी सुन्दर पड़ती है, इसी मौति माया भी दुश्खरूपा
खनेमें बी]
है, और देखनेमें ऐसी आकर्षक है कि संसार इसीमें फंसकर मर रहा है। इहॉ न पच्छपात कछु राखों ।
बेद पुरान संत मत भाखों॥
जरय॑-यहाँपर में कुछ पक्षपात नहीं करता, चेंद्+ पुराण और खसन्तका मत कह रहा हूँ ।
हृदहाँ न राखों-भाव यह कि वहाँ रक््खा था। सन्निकष्ट अथमे “इहाँ? का थयोग है, अर्थात् इस प्रसंगमें । महर्षि छोमशके प्रसंगमें मैंने पूरा पक्षपात किया था,यथा-पुनि-पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा।? “भक्तिपच्छ हठि कर रहेडें।? इससे यह न समझ लेना कि ये मक्तिके पक्षपाती हैं, जेंसे वहाँ पक्षपात किया था वैसे ही यहाँ भी पक्षपात करते होंगे | वहाँ तो ऋषिजीसे उत्तर-प्रत्युत्तर छिड़ गया था; उत्तर-प्रत्युत्तरमं पक्षपात न करनेसे पक्ष गिर जाता है, अतः पक्षपात करना पड़ता है, यहाँ तो वह्द बात नहीं है; प्रसन्नतापूवंक सच्ची जिज्ञासासे प्रश्न हो रहा है, और आदरपूर्वक उत्तर दिया जा रहद्दा है, अतः पक्षपात अनुचित है ।
पच्छपात कछु-भाव यह कि महर्षि छोमशके सामने बहुत कुछ पक्षपात किया था; यहाँ कुछ भी नहीं | पक्षपातके समय दूसरेकी बातकों सादर नहीं सुना जाता; सुननेंके समय दी उस कथनके विरुद्ध युक्ति सोची जाती है। वथा---
एृट्टि विधि अमित जुगुति मन गुनेऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनेऊँ ॥
बैद पुरान संत मत-माव यद्द कि वेद ख़तः प्रमाण हैं, पुराण ओऔर संतमत परतश्प्रमाण हँ अतः पुराण तथा संतके वचन यदि वेदा- विरुद्ध हों तभी भ्राह्म हैं; और वेद-पुराणके वचन भी यदि शिष्टयह्दीत
दातपशञ्ल चौपाई 5234
नहीं हैं तो वे भी अग्राह्म हैं; जिस माँति मेघसे न अहण किया हुआ समुद्रजल अग्राह्य हो जाता है | अतः वे ही वचन अश्नान्तरूपसे आह्य हो सकते हैं, जो वेद, पुराण और संतसम्मत हों ।
भसाखाँ-भाव यद्द कि मैं अपने मनकी कोई बात ही यहाँ नहीं कद्द रहा हूँ । जो बातें वेदपुराणसंतसम्मत निश्चित हैं, उन्हें ही कहता हूँ, अतः उनके प्रमाण होनेमें सन्देह नहीं ।
मोह न नारि नारिके रूपा। पन्नगारि यह नीति अनूपा ॥ ६॥ बर्थ-ख्रीके रूपपर स्री मोहित नहीं होती, हे पत्नगारि ! यह अल्ञपम नीति है ।
नारि भारिके रूपा-भाव यह कि स्ली-पुरुषम ही परस्पर मोक्त- भोग्य-माव है; अतः पुंशक्ति और ज्लीशक्तिमें आकर्षण है, सन्दरतासे चह आकर्षणशक्ति बहुत बढ़ जाती है, अतः स््रीके रूपपर पुरुष मोद्दित होते हैं, यथा-- देखि रूप भ्रुनि विरति बिसारी । बढ़ीं बार ऊंगि रहे निह्ारी ॥ और पुरुषके रूपपर ज्री मोहित होती है, यथा--
आता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखहिं नारी |
स्रीकों स्लीके रूपपर मोहित होनेका कोई कारण नहीं है, न उनमें भोक्तुभोग्यमाव है और न आकर्षण है ।
कस मोह न-भाव यह कि कारण बिना काये नहीं होता । मोहित होनेके लिये रूपवानके प्रति मोग्यबुद्धि मी होनी चाहिये । अतः उस बुद्धिके न होनेसे नहीं मोहती )
पन्चगारि-से भाव यह कि आप अुक्तमोग हैं, आपकी माता
रे रामरहस्य
विनता#कों कद्गने कितना दुःख दिया | विनताका रूप कद्ग॒के द्ेषका कारण हुआ, रागका नहीं | यथा--- प्कदू बिनतद्दि दीन्द्र धुख, चुमद्धि कौसिका देव ।!
और तभीसे आपकी सर्पंसे शच्रुता हुई |
यद्द नोति अनूपा-भाव यह कि हमारे यहाँ नीतिका बड़ा आदर है | नीति जाननेके लिये ही धर्मशात्र, अर्थथात्र और कामझासत्रका अध्ययन होता है | अवस्थाविशेषमें जहाँ धर्मार्थ, काममें विरोध पड़ता है, वहाँ उनका तारतम्य समझकर नीति निर्धारण करना ही विद्याका फल है; अतः अवध्यापरिवर्तनसे नीति-नीतिसे परिवर्तन हुआ करता है | ऐसी कोई नीति नहीं है जो सब अवस्थाओंमें छागू हो। केवल 'मोह न नारि नारिके रूपा? यही नीति ऐसी है कि माया-भक्तिसे लेकर लछोकिक नारि नारितक समानरूपेण उपयोगी है। इतना ही नहीं, आकर्षण और विप्रकर्पणका सिद्धान्व इस नीतिपर कायम है | इस नीतिमें बाघ नहीं है | इसीलिये अनूप कहा । अब यह शंका उठती है कि--
रंगमूमसि जब सिय पशु धारी | देखि रूप मोहे नर नारी ॥
“यह कैसे हुआ, सीता भी नारी हैं उन्हें देखनेसे नारियाँ केसे मोहित हुईं ।? उत्तरके लिये दूर नहीं जाना है । राम और सीता यदि नर-नारी रहें तो रामायण ही व्यर्थ है । रामायण तो राम-सीताके यथार्थ खरूपका बोध करानेके लिये है| कहना नहीं होगा कि भोक्तभोग्य- भाव अविद्याकी सीमाके भीतरकी बात है; सो अविद्यासे ही सब नर-
# कह्ूू सर्पोकी माता, विनता गरुड़की माता दोनों भगवान् कश्यपकी ख््ियाँ थीं, सापल्यभावसे प्रेरित होकर कटने सर्पोको चर्यके धोड़ोंकी पूँछमें लिपटनेकी आक्षा देकर विनताकों काछी पूँछ दिखला दी, और प्रतिशानुसार विनता उनकी दासी वनी, समाचार पाकर गरुड़ने उन्हें दासित्वसे विनिमुक्त किया, और स्पोके शात्रु हुए ।
इतपज्च चौपाई डर
नारी भोहित हैं; सत्र विधवरुखके पीछे पड़े हुए हैं, अविया जड़ होनेसे भोग्या है, और जीवमान ( नर और नारी ) भोक्तवर्ग है; चेतन होनेसे उनमें मोक्तत्व है; जब जीवमात्रके अवियासे मोहित होंनेगें शंका नहीं तथ सर्वश्रेयस्क्री मोक्षदात्री महांविया सीताके रूपपर जिसके द्वारा अहम रामको क्षोम होता है; मोहित होना कौन जाश्रय है ! यथा-- जासु बिलोकि अलौकिक सोभा । परम पुनीत सौर मन छोमा ॥ नीतिकी यति धर्मार्थ, कामतक है; श्रीराम-जानकीकी बात नीतिसे परे है; नीतिके पराधीन नहीं है
माया भगति सुनो तुम दोऊ | नारि बर्ग जाने सब कोऊ॥
अर्थ-तुम खुनो, माया और भक्ति नारिवर्ग हैं यद वात खथ कोई जानता है।
खुनो तुम-यहाँपर कोई नाम न लेकर तुम कहते हैं--भाव यह कि जीवमान्र त्वम् ( तुम ) पदवाच्य है, गरुद़जी बहुत बढ़े हैं, पर हूँ जीव, अविद्याके भोक्ता हैं | जीचके लिये यह प्रसंग बढ़ा उपयोगी है; अतः वार-बार छुननेके लिये सावधान करते हूँ ।
माया भगति दोऊ-भाव यह कि माया और भक्ति दोनों ही अ्रमरूप हैं | अतस्मिन् तद्वुद्धि दोनोंमे है। भेद इतना ही है कि एक विसंबादी भ्रम है और दूसरी संवादी श्रम है। उदाहरणसे दोनोंका चर्णन इस अकार हो सकता है कि रात्रिके समय घरके मीतर जलते हुए. दीपका प्रकाश दारके किसी छोटे छिद्रद्धारा बाहर आ पड़ा उसे देखकर किसीको मणिका श्रम हुआ; अतः उसके लिये प्रयत्न करनेवाछेकों सणिकी प्राप्ति नहीं हो सकती । ऐसे श्रमकों विसंवादी श्रम कहते हैं । सम्पूर्ण जगत् इसी भ्रममें पड़ा हुआ है। दिनरात सुखके लिये मर रहा है, सुख कहीं मिलता नहीं, यही माया है, विसंबादी श्रम है। और
हे३ “ शामरहस्य समिकी प्रमा देखकर उसे मणि मान प्रथल्ञ करनेवालेकी मणिकी प्रासि होती है | प्रभाकों मणि माननेवाला भी भ्रममें ही है, पर उसका भ्रम
संवादी है। तत्पदका त्रिना शोधन किये मिश्र ब्रह्मकी उपासना करनेवाले- को परभानन्दकी गसि होगी |
नारि बर्ग-भाव यद्द कि अ्रमरूपा होनेसे दोनों जड हैं; दोनों अ्बला हैं, पराक्षित हैं | पुरुष ( चेतन ) प्रकाशमय है, यथा--- पुरुष प्रसिद्ध प्रकासमय, प्रगट परावर नाथ ॥ और जड अन्घकाररूप है, इसलिये अविद्याकों रात्रि कहा, यथा--- प्रथम अविद्या निसा (नसानी )॥ --इसमें भी स््री अँधियारी रात्रि है; यथा-- 'नारि निबिड रजनी अधियारी
इसी भाँति भक्तिकों भी रात्रि ही कहा है, पर यह परम प्रकाशरूपा शारदीय पौर्णमासीकी राजि है। इसमें रानभिके दुःख-दोध कुछ भी नहीं होते, प्रत्युत शीतल होनेसे दिनकी अपेक्षा भी कहीं अधिक सुखदायिनी है ।इस रानिमें मगवज्ञामका परम प्रकाश है; यथा--
राका रजनी भरात्ति तन, राम नाम सोह सोम । अपर नाम उड्ुगन सरिस, चसउ भगत उर व्योम॥
जाने सब कोऊ-भाव यह कि सब छोग माया और भक्तिके लिये ख्लीलिद्धका दी प्रयोग करते हैं । संस्कृतमें यद्यपि वाच्य और वाचकके छिज्लमें भेद होता है; पर वहाँ पुंशक्ति और ख्रोशक्ति अथवा प्रसवशक्ति और संस्त्यानशक्तिकों क्रमशः पुलिड्ध और स्रीलिद्वका कारण माना है । और ये शक्तियाँ सब वस्तुओं में पायी जाती हैं, अतः जिस लिड्गकी विवक्षासे व्यवहार प्रचलित है वही लिद्धा उस वस्तुका माना गया है| अतएव संस्कृतमें भी माया और मक्तिका जीलिज्ञमें ही प्रयोग है, इसलिये कहा कि सत्र कोई जानता है |
झ्
शतपश्च चौपाई च्छः
पुनि रधुबीरहिं भगति पियारी | साया खल्लु नतेंकी बिचारी ॥१०॥
अर्थ-तिखपर रघुबीरकों भक्ति पियारी है और माया चेचारी तो नाचनेयाली है । पुनि-भाव यह कि ज्ञान विराग योग विज्ञान पुरुष हैं; यदि ये सुन्दर हुए तो साया इनपर मोहित हो जाती है, इनमें विकार उत्तन्न करनेकी चेश् करती है, और यदि सुन्दर न हुए. तो परलोकसाधनमें समर्थ न होंगे । भक्तिके ज्री होनेके कारण उसकी सुन्दरतापर माया मुग्घ नहीं होती, भक्तिमें विकार उत्पन्न करनेकी चेष्टा ही नहीं करती, अतः भक्तिमें मायाके पीछे पड़नेका कोई कारण नहीं है । अब दूसरा कारण देते हैं। रघुवीरहिं-रघुवीर# शब्दसे समुण बरह्मका अहण किया; क्योंकि निर्शेण ब्रह्ममें प्यार, कृपा, कोपादि बन नहीं सकते | वह न किसीपर अनुभ्रह कर सकता है और न कोप ही कर सकता है। सग्ुण ब्रह्ममं ही निखिल कत्याणगुणोंकी पराकाष्ठा है । भगति पियारी-भाव यह्द कि राम ब्रह्मपर भक्ति सती ख्रीकी भाँति अनुरक्ता है; अतः उन्हें प्यारी है। यथा-- ऐसी हरि करत दासपर औरीति। चिज प्रभुता विसारि जनके घस होत सदा यह रीति ॥ जिन बाँधे सुर झसुर नाग चर प्रवक्त करमकी डोरी। सोइ अविछिज्न अह्म जसुसति हि बॉँध्यों सकत न छोरो ॥ # ओरघुवीरकी यह वानि। भीचहू सो करत नेद सुप्रीति मन अनुमानि ॥ परम अधम निषाद पामर कौन ताकी कानि। लियो स्रो उर लाइ झुत ज्यों, प्रेमको पदिचानि ॥
ह्र्५ रशामरहस्य
जाकी साया वस विरंचि सिर, नाचत पार न पायो। करतल तार बजाइ ग्वाल-जुबतिन्द्र सोइ नाच नचायो ॥ विश्वंभर श्रीपत्ति त्रिभुवनपति बेदु ब्रिदित यह लीख। बलि सो कछु न चलो प्रझ्ुता वरु द्वे दिज सौंगी भीख ॥ जाको नाम लिये छूटत भव जनम मरन दुख भार | अंबरीप द्वित छागि कृपानिणि स्लो जनमे दुस बार॥ जोग विराग ध्यान जप तप करि जेट्टि खोजत झ्ुनि ग्यानी चानर भारछु चपल पसु पामर नाथ तहाँ रति सानी॥ लोकपाल जम कार पचन रवि ससि सब आरस्याकारी । चुकूेसिदास प्रद्भु उससेनके द्वार चेंत्र कर धारी ॥ .( बिनयपत्रिका )
माया विचारी-भाव यह कि रघुवीरकी प्वारी होनेसे भक्तिकी बड़ी भारी प्रभुता हो गयी, स्वयं प्रभु उसके वद्यमें हो गये हैँ, सब साधनोंकों छोड़ उसीपर रीक्षे हुए हैं, यथा--रीक्षत राम सनेट्ट निसोते ।! मायाका कोई चारा नहीं चलता; इसीलिये विचारी कहा ।
खलु नर्तकी-भाव यह कि मायाकी कोई प्रतिष्ठा नहीं। जहाँ-जहाँ बन््धनके कारणरूपसे माया कद्दी गयी है वहाँ मायाका अर्थ अविद्या है । यहाँ भी वही बात है इसीलिये कद्दते हें कि भाया तो नतंकीमाच है, वह अनेक भाव बतलाकर परपुरुर्षोको ठगा करती है । उसकी स्थिति ही पर- युरुषेक्रि ठगमेपर अवरूम्बित है ।
भगतिहिं. साहुकूल. रघुराया । ताते तेहि. डरपति अति माया ॥
अर्थ-रघुराज भक्तिके सालुकूछ हैं, इससे उनसे माया वहुत डरती दे। रघुराया-भाव यह कि प्रीत्तिकी रीति जाननेवाले हैं, थथा---
शतपसथ्च चौपाई च्नद जानत भीतिरीति रघुराई ।
प्रेम कनौद़ों रामसो प्रस्ु त्रिथ्ुवन तिहुँ कार न भाई ॥ तेरो रिनी हों क्यो कपिसों ऐसी मानिहे को सेवकाई | ( विनयपत्रिका )
इतना बड़ा अभु होकर भी प्रेमका इतना कृतश्ञ होनेवालछा रघुराईकों छोड़कर और कौन है !
भगतिदिं सान्लुकूछ-मक्ति भ्रीरुनाथजीकी प्यारी है, अतणएव वे भक्तिपर सानुकूल हैं । रानियॉमेंसे जिसपर सम्रादकी सानुकूलता होती है, उसीकी दोहाईं होती है; उसीसे सब डरते हैं। राजाकी प्रियाका अनहित कौन कर सकता है! उसकी सुदृष्टि-कुदएसि रंक राव और राव रंक बनते हैं | यथा---
अनहित तोर प्रिया केद्दि की नद्दा। केहि छुष्ट सिर केद्टि जम चह छीन्हा ॥ कहु केद्धि रंकहधिं करें नरेस् | कहु केद्धि नृपद्धिं निकारों देसू ॥ फिर खयं रघुराया जिसके सानुकूल हैं | उसकी महिमा और प्रभुता- का वर्णन तो कौन कर सकता है !
ताते सध्या-भाव यह कि माया बेचारी नर्तकी ठहरी, उनके इश्ारेपर नाचनेवाली ! उसकी क्या सामथ्यं जो उनकी प्रियाका अनिष्ठा- चरण कर सके ।
रघुबंसिन्हकर सहज सुभाऊ | मन कुपंथ पग घरहिं न काऊ ॥
अतः नर्तेकीकों कमी मी उनकी प्रिया होनेकी आशा भी नहीं, सदा चेरी बनकर रहना ठहरा, यथा--चेरि छाड़ि अब होब कि रानी । डरपति अति-भाव यह कि वह रघुराईसे अति समीत रहती है; हाथ जोड़े दूर खड़ी रहती है, अतः उनकी पद्ाभिषिक्ता प्रिया राज- महिधषीसे भी बहुत ह्वी डरती है। उसे जितना डर रामसे नहीं उतना भय
३७ रामरहस्य
भक्तिसे है; क्योंकि राम तो समीके अधिष्ठान हैं, अतएवं अविरोधी हैं। पर भक्तिका खभाव मायासे विरुद्ध है। माया जीवमाचकी भोग्या तथा बन्धनकारिणी है, और भक्ति सबकी माता तथा बन्धन काटनेवाली है | यथा-- देखी साया खब विधि गाढ़ी । खजति सभीत्त जोरे कर ठाढ़ो ॥ देखा जीव नचाने जाही । देखी भगति जो छोरे ताही ॥
इसलिये भक्तिसे माया डरती हुईं दूर खड़ी रहती है | जिसका चित्त परमेश्वरमें छगा हुआ है, उसे मायाकी ओर निरीक्षण करनेका अवकाश ही नहीं है | यथा--
मन तहँ जहँ रघुबर-वेदेही । बिछु मन तन हुख सुखसुधि केददी ॥ रामभगति निरुपम निरुपाधी ।
बसे जामु उर सदा अबाघी॥ शश ॥
अर्थ-निरुपाधि, निरुपम रामभक्ति जिसके हृदयमें खदा अवाधितरूपसे वसती हे ।
रामसगति-मनुष्योके शेयके लिये चार योग कहे गये हैं--(१) कर्मयोग, ( २) अशज्ञयोग, ( ३ ) ज्ञानयोंग ओर ( ४ » भक्तियोंग । इनमेंसे कर्मयोंग और ज्ञानका निर्वाह भक्तिकी सहायतासे ही हो सकता है। नहीं तो मायाह्वारा विज्नाचरणसे फलसिद्धि असम्मव हो जाती है ।
निरुपम-भाव यह कि भक्तिकी उपमा इन तीनोंमेंसे किसीसे नहीं दी जा सकतो, क्योंकि कर्ममोंग और अष्टाह्ृयोंगसे तो इसकी उपमा हों ही नहीं सकती, यथा--जोग न जप तप मख उपवासा | रह गया ज्ञान; सो उससे भी “संसारसे उत्पन्न छुःखहरण? रूप फलमें ही समानता है, वस्ठसाम्य नहीं है ! क्योंकि इसके ( १ ) खरूप (२) साधन ( ३ ) फछ (४ ) अधिकारीमें विलक्षणता है। ( १ ) चित्तके
शठपशञ्च चौंपाई रेट
द्रवीभूत होनेपर मनका रामाकार होना; यही सविकब्पक च्त्ति भक्ति है, और कठोर चित्त जब अद्वितीय आत्मामान्रकों विषय करता है, तब उस निर्विकब्पक इत्तिको शान कहते हैं; ( २) रामगुणग्रामसे भरी रामकथाका अवण मक्तिका साधन है, और 'सो तें तोहि ताहि नहिं भेदा ( तत््वमसि ) आदि महावाक्य श्ञानका साधन है; ( ३ ) राम- प्रेमका प्रकर्ष भक्तिका फल है और भज्ञानकी निद्वत्ति शञानका फल हैं; तथा ( ४ ) भक्तिमें प्राणीमात्र॒का अधिकार है ओर शानमें साघनचत॒ष्टय- सम्पन्न संन््यासीका ही अधिकार है | अतः भक्तिकी उपमा किसीसे नहीं दे सकते |
निरुपाधी-फलरूपा भक्तिमें कामना ही उपाधि है। किसी कामनाकी सिद्धिके लिये प्रेम करना वस्छुतः प्रेम नहीं । प्रेमका झुद्ध रूप वही है जिसमें कामना नहीं है | जिसे कोई कामना है, उसे भक्तिका रस नहीं मिला, उसके लिये भक्ति भावमात्र है। भरद्वाजजीका मत
है कि भक्ति-भावकों रसरूपमें परिणत करके मरतजीद्वारा पहले-पहल दिखछाया गया । यथा---
चुमकई भरत करूंक यह हम सब कह उपदेस ॥ रामभगतिरस सिद्धिेहित भा यह समय गनेस ॥ गोखामीजीका भी यही मत है, यथा--
मेस असिज मन्द्र बिरद भरत पयोधि गँमौर | सथि प्रकटेड सुर साधु हित कृपासिंघु रघुबीर ॥
डे पे जिसके जे आफ जाछु उर सदा व्से-भक्ति जिसके मनमें सदाके लिये बस जाय;
निकालनेसे न निकले | भक्तिसे क्षणसात्रका वियोग सहन न कर सके; यथा---
रामभगति जछ सम सन मीना | किसि बिलूगाह मुनोस प्रबोना ॥
वैसे तो बहुत-से जीव हैं, जो जलचर कहलाते हैं; पर वे सदा
ड्ेण, *. शामराहस्थ जल्में नहीं रहते, कभी बाहर आकर धूप भी खाने लगते हैं। सदा बसने- चाली मछली दी है; जल्से अलग द्वोते.ही वह आण देने लगती है। यथा- सकर उरग दादुर कमझ जर जीवन जल गेद्द। तुलसी एके सीनकह है. साँचिलो. सनेह ॥ अवाधी-भाव यह कि उसका बाध न हो । ब्रह्मसाक्षात्कारानन्तर जगतका वाघ हो जाता है, पर भक्तिका बाघ न हो । यथा--- अस बिचारि पंडित सोहि भजदीं । पायेउ ग्यान भगति नहिं तजदहीं ॥
तेहि बिलोकि माया सकुचाई । करि न सके कछु निज अझुताई ॥
अर्थ-उस्े देखकर मायाको संकोच होता है, अपनी प्रुता कुछ कर नहीं सकती ।
तेदि विछो कि-भाव यह कवि जिस पुरुषके मनमें उपयुक्त अन- चायिनी भक्ति बसी हुई है, उसका खरूप देखकर मायाका साइस छूट जाता है, भक्तिके आते ही स्ररूपमें अन्तर पड़ जाता है, विघयरससे रूखापन और रामसे सरसता उसके चेहरेसे ठपकने लगती है |
माया सकुचाई-भाव यह कि सायामें संकोचन और विकासन दोनों जशक्तियाँ हैं| विकासवाद और संकोचवादकी इसीसे उत्पत्ति हुईं है । सत्रीके देखनेसे मायासें विकास होता है, क्योंकि वही तो इसका परम वल है। यथा--- तेद्िकर एक परम बल नारी । तेद्दि ते उबर सुभट सोद् भारी ॥ दुर्बासना कुम॒ुद समुदाई। लन्ड नल हडह || न । पछद्टे भचारि सिसिर रिति पाई ॥
और जिसके हृदयमें भक्ति हो उसके दर्शनमात्नसे मायाकों सझ्लोच छोता है, क्योंकि उसके वलका हास हो जाता है, भक्तिके आगमनमानच्रसे
शतपञ्च चौपाई छ०
मायाका तेजोबघ होंता है, क्योंकि उस घरमें उसकी पेंठ अब नहीं हो सकती ।
निज प्रभुताई-भाव यह कि जीवमात्रपर मायाकी प्रभुता है; उसी- के इशारेपर जीवमाच नाचा करते हैं | जीवोंकों नचाना ही मायाकी प्रसुता है, वथा--
नाचत ही निसिदिवस मरथो तव ही ते न सयो हरि थिर जबतें जिव नाम धरयों 8 वहु वासना विविध कंचुकि भूपन लोभादि सरधों। चर अरू अचर गगन जरू थल्में कौन न स्वॉग करधो ॥ देव-दनुज, सुनि, नाय, सजुज्ञ नहिं जाँचत कोउठ उचरपो । सेरो दुसह दरिद्व, दोप, छुख काहू तो न हरयो॥ थके नयन, पद, पानि, सुसमत्ति बल, संग सकल विछुरधो । अब रघुनाथ सरन सायों तकि भव-मय विकरू डरयो ॥ (विनय० ) करि न सके कछु-भाव यह कि सामथ्य रहते अपने हाथसे शिकार निकल गया, पर भक्तिके कारण वह कुछ कर नहीं सकती, यथा--- मैं त्ोहिं सब जानयो संसार । वॉधि न सकदिं सोहि हरिके वर, प्रणट कपट-आगार ॥ देखत ही कमनीय, कछ नाहिंन पुनि किये चिचार ॥ ज्यों कंदुलीतरु-सध्य निहारत, कवहुँ च निकसत सार ॥ तेरे छिये जनम जनेक मैं फ़िरत न पायों पार! महामोह-झुगजल-सरितास् बोरधो हों वारहिं चार ॥ खुद जल! छलछ-बल कोटि किये वस होहिंन भगत उदार । सद्दित सहाय तहाँ वसि लव, जेहि हृदय न नंदकुमार / तालों करहु चातुरी जो नहिं जाने मरस तुम्हार। सो परि हउहरें मरे रझु-जहितें, बूझे नहिं व्यवहार
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यथा--- नान््या स्ष्व॒ह्ा रछुपते हृद्येडससदीये सत्य वदामि च भवानखिलान्तरात्मा । भक्ति भ्रयच्छ रघुपुंगवर्निर्भरां में कामादिदोपरद्धितं कुर मानसे च ॥ विज्ञानी भी पतनके भयसे इसी भक्तिकी याचना करते हैं ।
दो०-यह रहस्य रघुनाथकर बेगि न जाने कोइ । जो जाने रघुपतिकृपा सपनेहु मोह न होइ ॥
अर्थ-रघुनाथके इस रहस्यक्ों जल्दी कोई नहीं जान सकता; यदि रघुपतिकृपासें जान छे तो उसे सपनेमें भी मोह नहीं दोता )
यह रहस्थ-भाव यह कि गिरिजाका प्रश्न हुआ था कि-- ओऔरोौ राम रद्दस्य अनेका। कद हु नाथ अति बिमर बिवेका॥ इसपर छाड्कुर भगवानले काकभुशझुण्डिकी कथा कहकर दो रहस्पोंका चर्णन किया । रहस्य कहते हैं शुत्त बातकों | सो पहले चरितविषयक परम रहस्प कहा-- यह सब गुप्त चरित मैं गावा । दरि माया जिसि सोहि नचावा ॥
रघुनाथकर-भाव यह कि यह रहस्य चरितका नहीं है, सं रघुनाथविषयक है| केवछ रघुनाथका प्यार भक्तिपर होनेसे ही भक्ति सर्वश्रेयस्करी है ।
पु बेगि न ज्ञाने कोइ-भाव यह कि 'ज्ञान मोच्छप्रद बेद बखाना! यह बात ठीक है, और सब कोई जानता है; पर जो इस रहस्यकों जानता
है, वह ज्ञानसे भी अधिक आदर भक्तिका करेगा, पर यह रहस्य जल्दी कोई जान नहीं सकता |
छ३े रामरहस्य
जाने जो स्घुपतिकृपा-भाव यह कि जल्दी समझमें न आनेंका कारण यही है कि जिनपर रघुपतिकृपा होती है, उस्तीकी समझमें यह रहस्म आता है; नहीं तो वार-बार इसे पढ़ा कीजिये कमी समझमें न आवेया। जितनी उनकी कृपा मुझपर थी उतना ही मैंने भी समझा है, और जो समझा है उसे छिख दिया है; कोई यह न समझ बैठे कि इसका तात्पर्य यही याइतना ही है ।
सपनेहु मोद्द न दोइ-भाव यह कि रघुपतिकृपासे इसे जान छेने- पर फिर सपनेमें मी मोह नहीं होता। मोह न होना दी रहस्थके जान छेनेका लक्षण है। यदि इसके समझनेपर मोह जाता रहे तो समझिये कि जान पाया और यदि मोह बना है तो यही समझना चाहिये कि रहस्प मैंने नहीं जान पाया ।
दो०-ओऔरो ज्ञान सगतिकर भेद सुनहु सुप्रवीन | जो सुनि होइ रामपद॒ प्रीति सदा अविछीन! १ १६।
अर्थ-हे सुभवीन, भक्ति और जानका और भी भेद खुनो, जिसके सुननेसे रामजीके चरणोंमें सदा अधिचिछिन्न श्रोति दोती है ।
ओऔरी ज्ञान भगतिकर भेद्-भाव यद्द कि अथम मेद कथनमें बीज- रूपसे राम मगति अनुपम निरुषाधी! कहकर जिस बातकों इद्धित किया था; आगे उसीका विस्तृतरूपसे वर्णन करेंगे। प्रथम भेदकथनर्मे भक्तिके आदरातिशयका रहस्य बतलाया गया, अब द्वितीय भेदकथनमें खरूप) साधन; फछ और अधिकारीका भेद वतलाया जावेगा ।
सुप्रचीन खुनहु-यहयपर सुप्रवीण सम्बोधनसे तात्पर्य यह कि इस भेदके सुननेका वही अधिकारी है; जो सुप्रवीण हो; आप सुप्रवीण हैं, इस- लिये सुनिये । प्रवीण कहते हँ--जानकारकों, यथा--कत्रि न होहूँ नहि
शतपश् चौपाई छछ
बचनप्रवीनू ।? दूसरा प्रसंग आरम्भड करते हैं, इसलिये श्रोताकों सुनहु कहके फिर सावधान करते हैं!
र्मपद् सदा अविछीन प्रीति-माव यह कि शमपदसें प्रीति शास््रोंके तथा शुरुके उपदेशसे होती तो है, पर अविच्छिन्न तैलधारावत् नहीं होती, बीच-बीचर्मे बराबर अन्तर पड़ता जाता है और अन्तर पड़ना हो मारी अन्तराय है अतः सब महात्मा भगवानसे अविच्छिन्न ग्रीतिके लिये ही आर्थना करते हैं |
जो खुनि होइ-भाव यह कि पहले भेदकथनकी यह फलुश्रुति है कि 'सपनेमें भी मोह न होय! अव दूसरे भेदकथनकी फलभ्रुति कहते हैं कि अविच्छिन्न अर्थात् अनपायिनी भक्ति हो ! तात्पये यह कि इनके छदयमें धारण करनेसे हरिकृपा अवश्य होती है और अनपाधिनी भक्ति हरिक्रपासाध्य है।
द्वितीय प्रसक्ध ज्ञानदीपक
>> <>8:<22%०७5 सुनहु तात यह अकथ कहानी । समुझत बने न जात बखानी ॥
अर्थ-हे तात, यह अकथ कहानी; जो कहते और समझते नहीं बनती, उसे छुनो । खुनहु-इससे शिष्य ( गरुड़जी ) का प्रश्न सूचित किया । ज्ञानदिं भगतिहिं अंतर केता । सकर कहहु प्रभु कृपानिकेता ॥ तात-से भ्ुश्ुण्डिजीने शिष्यपर प्रेम दिखलाया ) यह अकथ-से भक्तिके साधनका सुकथ होना दरसाया ) यथा-- भगतिके साधन कहां बखानी | सुगम पंथ मोहि पायें प्रनी ॥ कद्दानी-से '(अजातवाद' दिखलाया कि हम जो कुछ कहते हैं सो
शतपश्च चौपाई ४६
कहानी है। कहानी सत्य नहीं होती। अतः यद्द भी पारमार्थिक% सत्य नहीं है । सत्य तो एकमात्र निर्विशेष ब्रक्मकी स्थिति है। जिस प्रकार शबदके कमी क्ष नहीं हुआ; आकाश कुसुम नहीं हुआ; वन्ध्याकों पुत्र नहीं हुआ, उसी ग्रकार यह सब कुछ भी कभी हुआ ही नहीं, फिर किसका बन्ध और किसका मोक्ष ? जो दिखायी पड़ता है सो श्रम हे । उस तहामें अंश-अंशी-मेद न है और न हो सकता है। माया भर उसके प्रपश्चका उसमें स्पश भी नहीं है | यथा-- (१) अनध अद्देत अनवद्य जव्यक्त अज अमित्त अविकार जआानंदसिंधो ॥ ( विनयप० ) ( २ ) राम सचिदानंद दिनेसा | नहि तहईँ भोहनिसा छवलेसा ॥| सहज प्रकासरूप भगवाना । नहिं तहूँ पुनि विज्ञान बिहाना ॥ हरप विपाद ज्ञान अक्षाना । जीव धर्म जहमिति अमिसाना ॥ (३ )यन्र हरि तत्र नहिं भेद माया॥ ( विनयप० ) (४ ) जग नभ वाटिका रही है फल फूलि रे, घूजों कैसों धोरदर देखि तू न भूकिरे॥। ( विनयप० ) शिष्यकों संसार और बन्धकी प्रतीति होती है । उसे इस प्रपदञ्चके समझने और इससे मुक्ति-छाभ करनेके लिये जिज्ञासा है, अतएव गुरुडसकी इृष्टिके अनुसार, उसको समझानेके लिये निष्प्पश्चमें पहले प्रपद्चका अध्यारोप करते हैं और फिर अपश्वका अपवाद करके यथार्थ खरूपका उपदेश करते हैं, अतएव यह अध्यारोप-अपवादका उपदेश भी शिष्यके लिये ही है । जिज्ञासाके पूर्वके साधनचत्तुष्य सब इसी ग्रकास्के ही हैं । अतए्व
# सत्य दो प्रकारका होता दै--( १) पारमार्थिक और (२) व्यावहारिक । पारमार्थिक मिथ्या ही व्यावद्यारिक सत्य है ।
छ७ ज्ानदीपक
इस मसिथ्या कथाकों कहानी कहा | परन्तु इस कहानी सुननेचालेको सिद्धान्त-ज्ञान होता है; क्योंकि कहानीकी समासिपर कहेंगे कि कहे ज्ञान-सिद्धांत छुझाई |? अतः साधनचत॒ष्टयसे ममता-मलके नष्ट होनेपर ही इस कहानीके कहनेका भी विधान है; यह कहानी यदि “ममता-रत” से कही जायगी, तो ऊसरमें बीज बोनेकी भांति व्यर्थ होगी, यथा-- पस्मतारत सन क्लान कहानी ॥? 'ऊसर बीज बए फरू जथा ॥7 समुझत बने न-समझते नहों बनता । भाव यह कि निगुंण ब्रह्म और शुणमयी मायाके संयोग-वियोगका इसमें वर्णन है। निर्शुण ब्रह्म ज्ञेय नहीं है, जाना वही जा सकता है जो शेय हो, स्वयं द्रश केसे जाना जाय ? और द्रष्टा ही त्रह्म है; अतएवं वह नहीं जाना जा सकता, यथा-- जगपेखन तुम देखनहारे । विधि-हरि-संभु नचावनहारे ॥ त्तेड न जानहिं मरभ तुम्हारा । और तुमद्दटि को जाननिद्दारा॥ माया भी नहीं जानी जा सकती, वह तो अघटनघटनापटीयसी है, जो हों न सके उसीकों कर दिखाना मायाका काम है) यथा-- जो भाया सब जगदि नचावा । जासु चरित्त ऊखि काहु न पावा ॥ और संयोग-वियोग ब्रह्ममें बनता नहीं, यथा--“सपनेहु जोंग वियोग न जाके? अतएवय यदि समझते बने तभी आश्रय है । न जात वखानी-बखानते भी नहीं बनता । भाव यह कि उसको कहनेके लिये उपयुक्त शब्द ही नहीं मिलते; यथा-- केसव ! कहि न जाट्ट का कहिये । देखत तव रचना विचित्र हरि ससुझि मनहिं सन रहिये ॥ सूनन््य भीतिपर चित्र, रंग नहिं, तनु विनु लिखा चितेरे। धघोये मिरह् न भरइ भमींति, हुख पाहय यहि तलु हेरे प
शतपश्च चौपाई छ्८
को कद सत्य झूठ कद्ट कोऊ जुगल प्रबल कोड माने । चुलसिदास परिहरे तीनि असम सो आपन पहिचाने ॥# ' ( विनयप० ) परन्तु वेदान्तके वाक्योंकों गुरू-मुखद्वारा सनते-सनते अनुभव हो सकता है| यथा--- “बिज्ु शुरू होह कि छान ।? ्अनुभवगम्य भजहिं जेद्धि संता ।? इस चौपाईसे “नित्यानित्यवस्तुविवेक!' रूपी अथम साधन बतलाया गया |
इंखर अंस जीव अबिनासी ।
चेतन अमरू सहज सखुखरासी ॥१५ शा
अथ-चेतन, अमछ, सहज खुखराशि जीव इश्वरका अंश है।
इश्चर-ईश्वर और बक्षर्म अवस्थामेदमात्र है; वस्त॒भेद नहीं है । ब्रह्मकी कोई अवस्था न होनेके कारण, जाग्रत्, स्वर्त और सुघुसिकी अपेक्षा उसे त॒रीय ( चौथा ) कहते हैं, और उस अपेक्षाकों भी छोड़कर उसे तुरीयातीत था केवल तुरीय कहते हैं । यथा--त॒ुरीयमेव केवलम? वह्दी श्रकह्न जब जगतके प्रकाशकरूप अर्थात् भायापतिके रूपसे देखे जाते हैं , तब ईश्वर कहलाते हैं | यथा--
जगत शअकास्य प्रकासक श्र । सायाधीस ज्ञानगुनधामू ॥
अंख-उस मायापति ईश्वस्का अंश । कहनेका भाव यह कि ब्रह्म और मायाकों लेकर ही सब प्रपद्च है। पूर्ण बह्मका खण्ड नहीं होता | यथा--- 'जद्यपि एक अखंड अनंता |! फिर भी मलिनिसत्त्वा माया ( अज्ञान ) द्वारा उसके अंशकी कब्पना दोती है, जिसे कूट्स्थ या साक्षी कहते हैं ।
४०, शानदीपक
साक्षी कूटस्थ मी ब्रह्म ही है, यथा--“प्रकृतिपार प्रभु सब उरबासी परन्तु जेंसे महाकाश और घटाकाशमे कल्पित भेद है, वैसे ही यहाँ भी कल्पित भेद है | यथा-“म्रुघा भेद जच्पि कृतमाया ? अभिप्राय यह कि तूलछा- विद्याका आश्रय साक्षी कूट्स है और मूलछाविद्याका आश्रय साक्षी ब्रह्म है। प्रत्येक व्यक्तिमें तूलाविद्या मिन्न-मिन्न है और समश्टिभूता मूलाविद्या एक ही है। वूलाधियाके भेदसे उसके साक्षी-कूटस्थमें भेद माना जाता है। इसीलिये गोस्वामीजीने “राम! से ब्रह्म, ईश्वर और कूठस्थ तीनोंका प्रहण किया है, क्योंकि एक ही तीन भॉतिसे प्रकाशित होता है । जीच-मलिनसत्त्वा मायामें जब ब्रह्मका प्रतिविम्ब पड़ता है; तो
सच्त्वके माल्न्यसे अनन्त प्रतिविम्ब हो जाते हैं और उन प्रतिविम्बोंकी वह मलिनसत्त्वा माया ही देह हों जाती है। वही देह कारणशरीर कहलाती है और उसका अमिमानी जीव प्राश्ष कहलाता है। मलिन- सच्वा-माया; वूछाविया, अशान;, अहंकार, कारणशरीर और नाम- रूपात्मिका ये सव पर्यायवाची शब्द हैं | गोस्वामीजीने जीवकी मेले पानीसे उपमसा दी है । यथा--
भसूसि परत भा डाबर पानी । जिमि जीवहिं माया छपटानी ॥
परबस जीव खबस भगवंता | जीव अनेक एक ओकंता ॥
अबिनासी-अर्थात् जिस भाँति ईश्वर सद्रप, अविनाशी है, उसी भाँति जीव भी अविनाशी है; सद्रुप है । यथा-- 'जोच नित्य (तैं केद्टि ऊगि रोवा )! चेतन-अर्थात् जड़से सम्बन्ध होनेपर भी प्रश्ानधन है; यथा--- निज सहज अनुभवरूप ( तव खलू भूलि धों आयो कहाँ )। अमरछ-यानी निर्संछ, इससे यह दिखतल्यया कि अभीतक ( सुषुप्ति- तक ) जीव ममतारूपी मलसे रहित है । गोस्वामीजीने ममताकों मल
माना है; यथा--ममतासल जरि जाय छ
शतपश चौपाई छू
सहज खुखरासी-अर्थात् कारणशरीराभिमानी होनेपर भी आनन्द- भोक्ता है । इसीसे कारणशरीरकों आनन्दमय कोष कहते हैं । उसकी अवस्था सुषुप्ति है, यथा--“अब सुख सोवत सोच नहिं |
सो मायाबस भयेउ गोसाईं । बँध्यो कीर मरकटकी नाईं॥
अर्थे-वह प्रभु मायाके वश हो गया और शुक ( झुग्गे ) तथा बन्द्रकी भाँति बेच गया ।! स्लो गोखाई-वह प्रश्लु । प्रभुके अर्थमें 'मोस्वामी? शब्द रामचरित- मानसमें व्यवद्धत है; यथा-- स्वामि गोसाएँहिं सरिस गोसाईँ। मोहि समान में स्वामि दोहाई ॥ सो गोसाएँ जेहि विधिगति छेकी | इत्यादि---
प्रभु ( कत्तुमकर्चूसन््यथाक्त, समर्थ: ) है, पर इस दशशाकों प्राप्त हो गया | यथा--- निष्काज राज विहाय चुप हृव सपन-कारागसुष्द परयों । ( विनय० ) ईंश्वरने तो केवछ जगत्कों उत्पन्न किया, वह उसका भोक्ता नहीं है | भोक्ता तो जीव है, इसलिये जीवको प्रभु कहा । भोगकी कल्पना जीवकी है । उसीने जाग्रत्से छेकर मोक्षतक संसारकी कल्पना की है | माया-सत््व, रज और तमकी साम्यावस्थाकों प्रकृति कहते हैं; ईश्वरकी यही शक्ति माया कहछाती है, यथा--“सो हरि माया सब शुन- खानी ।!! अहसे प्रथक् मायाकी सत्ता नहीं है, इसलिये उसे सत् नहीं कह सकते, परन्तु उससे प्रथक मायाका कार्य दृष्टिगोचर होता है, इसलिये उसे असत् मी नहीं कह सकते, अतएवं माया अनिर्वचनीया है । ऋरह्मसे
प्र ' झनदीपक
यह सर्वथा विलक्षण है। ब्रह्म सच्चिदानन्द है और माया मिथ्या, जड़ एवं डुशखरूपा है। मिथ्या, यथा--/समुझे मिथ्या सोपि जड़ यथा-- “जास सत्वताते जड़ माया ।? दुःखरूपा, यथा--एक दुष्ट अतिसय चुखरूपा ।! जिस प्रकार व्यवहारमें सत्यसे मिथ्या विलक्षण होते हुए भी; सत्यके आधारपर स्थिर रहता है, सत्यके वछसे प्रकाशित रहता है और सत्यक्रे ज्ञानसे बाधित होंता है, वेसे ही पारमार्थिक मिथ्या (माया) भी पारमार्थिक सत्व (ब्रह्म ) के आश्रित, अहसे प्रकाशित तथा त्रह्मसे विलक्षण है और ब्रह्मशानसे ही उसका बाघ होता है। यथा-- झूठ्हु सत्य जाहि विन्ु जाने | जिसि भ्रुजंग विन्न रझ पहद्धिचाने ॥ जेहि जाने जग जाह हेराई। जागे जथा सपन भ्रम जाई ॥ तीनों गुणोंका यह खमाव है कि वे एक दूसरेकों छोड़कर भी नहीं रह सकते, और एक दूसरेकों दवाया भी करते हैं) अतः शुणोके तारतम्बसे मायाके भी अनेक भेद हैं, जिनमें दो अघान हैं | ( १) झुद्ध- सत्त्वा माया।--जिसमें रज और तमका लेशमान्र है, जो विद्या कदृलाती है। और जो जयत्की रचना करनेमें समर्थ है, और ( २) मलिन- सत्ता माया; जो अविद्या कहछाती है और जीवके वन्धनका कारण है । यथा-- पेहिकर भेद सुनौ तुम दोऊ। बिद्य। अपर अविद्या दोऊ॥ एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा | जेंद्वि बस जांच परा भवदृूपा ॥ एक रचइ जग गुन वस जाके। अभु प्रेरित नहिं निज वछ ताके ॥ चस भयेउड-मायाके वद्में हो गया। अघटन-घटना-पटीयसी मायाकी यह करामात है कि वह छायाद्वारा विम्बकी वश्ीभूत कर लेती है। यथा-- “भकरि माया नभके खश गहडईे ।? “है छाँह सक सो न उड़ाई॥? अतः कूटस्थ, वूला-मावा और प्रतिविम्ब तीनों मिलकर जीव हुए;
शतपश्न चौपाई ण्र्
अब माया जो-जों और जैसा-जैसा नाच नचाती है, जीव वह और चैसा ही नाच नाचता है। यथा--
पेखा जीव नचावे जादी !! पाचत ही निसि दिवस मरधौं । तबद्दीते न भयो हरि थिर जबतें जिद नाम धरपों” चैंध्यो--अर्थौत् कूटसथ प्रतिविम्बद्यारा मायासे बेंघ-सा गया, जेसे घटाकाश जल्ञकाशद्वारा जलसे बंघ जाता हँ। जिस प्रकार प्रतिविम्ब जलके दोषेसि दूषित होता है, चश्चल होनेसे चख्लछ होता हैं। उछलनेसे छछलता है, गिरनेसे गिरता है, दौड़नेसे दौड़ता है, निदान जलसे बँंघ जाता है, उसी प्रकार जीव भी मायासे बेंध-सा गया। परन्ठ जड़का उदाहरण देनेसे किसीको जीवके प्रति जड़का सन्देद्द न हों तथा यह शंका न हो कि अज्ञान कोई रस्सी तो नहीं है जिससे कोई बाधा जा सके; इसलिये कहा है कि--- बँध्यो कीर मरकटकी नाई ॥
कौरकी नाई--उम्गेकी भाँति बंघ गया । भाव यह कि बद्देलिया दो तिल्ियों गाड़कर उनके सिरपर एक तौसरी तिल्ली बाँघ देता है और उस तीसरी तिलीमें वॉसकी नली पहिना देता है, नीचे दाने रख देता है। सुग्गोका स्माव ऊंचेपर बैठनेका होता है। अतएव जब वह नलीपर बैठकर दाना लेनेके लिये झकता है तब नली घूम जाती है; और सुग्गा उलटा छठकने लगता है। अज्ञानसे भयवश उसे छोड़ता नहीं; अन्तमें बहेलिया आकर उसे पकड़ छेता है। विचार करनेपर मालूम होगा कि यहाँ सुग्गोंको अज्ञानके सिवा कोई दूसरा बन्धन नहीं है ।
किसी महात्माने सुग्गोकी यह दुदंशा देखकर एक सुग्गा पाला और वह उसे पढ़ाने रंगे-'देखों ! सुग्गा ! दारनोका छोम करके नलीपर न बैठना और यदि बैठना तो उसके घूमनेपर निडर होकर उसे छोड़ देना ।? जब सुग्गा पढ़कर पण्डित हों गया तो उसे छोड़ दिया। उस
ण्र् ज्ञानदी पक
सुग्गेका वाक्य सुनकर दूसरे छुग्गे भी बैसे ही बोंछने रंगे। महात्मा बड़े प्रसन्न हुए कि सभी सुग्गोंका भय निवृत्त हो गया | परन्ठ उनके आश्रर्यका कोई ठिकाना नहीं रहा, जब कि उन्होंने एक संग्गेकों उसी प्रकार उछया लठके हुए यह पढ़ते पाया कि 'देखों झुंग्गा ! दानोंका लोभ न करना? इत्यादि । व्यवहारकालमें ( वाचक शानी ) पण्डितोंकी भी खिति मूर्खा-सी देखी जाती है | अतएव पण्डितोंका अशान-बन्धन दिखलानेके लिये 'कीरकी नाई? कहा ।
मरकटकी नाई--वानर भी ऐसे ही बंघता है? उसका हाथ जाने लायक छेदवाली कुल्हिया दानोंसे भरकर जमीनमें गाड़ दी जाती है। वानर उसमें हाथ डालकर मुद्ठीमें दाने पक्रड़ लेता है। जब मुद्दी उसमैंसे नहीं निकलती तब वह वंघ जाता हैं। लोभसे, अज्ञानसे यह मुद्दी नहीं छोड़ता | अतः वह भी अश्नसे ही बंधा है। यह मूख होनेसे 'सुग्गा पण्डित! की भाँति मोक्ष-शासत्रका पाठ करते हुए; बद्ध नहीं है | मूर्लका बन्धन दिखलानेके लिये 'मरकटकी नाई? कहा !
इसी तरह जीव अज्ञान-वन्धनसे बँधा हुआ है, हज़ार प्रयत्न करने- पर भी नहीं छूठता ।
जड़ चेतनहिं ग्रंथि परि गई। जद॒पि सपा छूटत कठिनई ॥१७॥ अर्थ-जड़-चेतनमें गाँठ पड़ गयी, चह यद्यपि झूडी है, पर ( उसका ) छूटना कठिन है । जड़ चेतनहिं--जड़-चेतन दोनों विद खमाववाले पदार्थ हैं | एक अन्धकार है; तो दूसरा प्रकाश है। एक विषय है; तो दूसरा विषयी है । एक मिथ्या है तो दूसरा सत्य है। इन दोनोंमेंसे एकका
दूसरेमें अध्यास (भ्रम) होना अथवा एकके घ्मका दूसरे अध्यास होना मिथ्या है । यथा--
शतपशञ्च चौपाई 5ड
छिति अर पावक शगन समीरा | पंचरचित यह अधम सरीरा 0 प्रगट सो तलु तब जागे सोझा। जीव नित्य तें केष्टि छगि रोआ ॥ अंथि परि गई--गौंठ पड़ गयी अर्थात् तादात्म्य हो गया । जड़में चैतनका अध्यास होने छगा और चेंतनमें जड़का । इस गॉठकों किसीने बाँधा नहीं है। अनादिकालसे पड़ी हुईं है। शिष्यकों समझानेंके सुमीतेके छिये 'पड़ गयी? कहा | कारणशरीरमें जो चेतनका अध्यास हुआ वहीं प्रतिविम्ब है; वही गाँठ है | यथा-- रजत सीप महँ भास जिमि, जथा भाजुकर बारि। जद्पि रूपा तिहुँ कारूमहैं, जम न सकईट कोड टारि ॥ एट्दि विधि जग दरि आश्रित रहई ॥ जदूपि झुषा--यर्याप गाँठ शड़ी है, भ्रममात्र है। सायाके साथ असंग कूटथ्का सम्बन्ध कैसा ! घटाकाशका जल्से सम्बन्ध केवल अ्रमसे सिद्ध है | यथा-- जद॒पि असत्त्य देत घुस जहई | छूठत कठिंनई--छूटना कठिन है। किसीका हटाया यह अध्यास नहीं हटता। क्या लोकका; क्या वेदका, सत्र व्यवहार इसी अध्यासपर टिका है। यथा--- कम कि होह सरूपाई चीन््हे। ३... भू तबते जीव सयऊ संसारी | ग्रंथि न छूट न होइ खुखारी ॥ अरथे--जवसे जीच संखारी हो गया; तबसले न तो गाँठ
छटती है और न यह सुखी ही होता है ।
तबते--अथांत् कालका कोई नियम नहीं है, अनादि अन्ध- परूपरासे । अनादिकाल्से संसार ऐसा ही चलछा आता है। इसीको
अविच्ा-निद्या कहते हैं | इसीमें खल्पाच्ान अर्थाद् ठुपर॒प्ति होती है। इस अवस्थाके विभु ईश्वर है। अपरिच्छिन्न तथा अठंग होनेसे विरूमें अहंकासक्ी गाौँठ नहीं होती; परिच्छिन्ष और उंगी होनेते जीवमें अह्कारकी गाँठ है। इसी गाँठमें आवरण औरर विक्लेपल्पी निद्रा है।
सोह निसा सद सोवनिहारा । देखहि सपन जबनेक अकारा ॥
जाकर चारि ऊछाख चोरासी । जोनिन अनत जीव लविभासी ॥
पिरत सदा साथा कर पेंरा । कार करम सुभाव गुन घेरा ॥
इसी सुउुम्तिते चूर्तोक्नी उत्तति, स्थिति और लय होता है । कारण- देइ-आत ईश्वरंझके मोगके लिये ईखरेच्छासे तमःप्रधान अकृतिमें (१ ) आकाश (२ ) वायु (३ ) तेन (४) ज5ऊ जौर (५) प्रध्वीतत्त्त उत्पन्न हुए, विनके सच्चांगसे क्रमशः पदश्च ज्ञानेन्द्रियोँ और मिलकर अन्तःकरण तथा रजांदसे क्रमशः पदश्च कर्मेन्द्रयों और मिलकर प्राण उतच्नन्न हुए । बथा--
१ «४
गंगन समीर जनक जल धरनी । इनकर नाथ सहज जड़े करनों ॥ लत प्रेरित साथा उपदायें। चुष्टि हेतु सब अंयनि गाये ॥ विपय करन सुर जीव समेता ॥
इन पाँचों ठत्त्वोंसे जो दारीर व्ना वही लिह्नदेह हैं। ग्रहोँसे संसार अद्लुरित हो गया; जो कि स्थृच्यवखानें पछवित और घुब्यित होगा। इस लिल्नदेहामिमानीका नाम तैजस हैं और इसके विश्यु दिस्प्ययर्म हैं । इस तैजसके मोयके छिये भगवानने पद्चतत्तोंका पश्चीकरण कस्के स्थूछ
€ ऋषित० )
शतपश्च चौपाई दर सोलह आनेमेंसे आठ आने एक तच््वविद्येषको लेकर उसमें दोन्दो
आने शेष चार तच्वौकों मिछाकर; उस तच्व-विश्येपकों स्थूल रूप दिया |
यही पश्लीकरण है। जब तैजस स्थूल देहका अभिमानी दोता है तब उसे
विश्व कहते हैं इसकी जाग्रत् अवस्था ऐ और विराट विश्वु 9ैँ । यया-- जजु जीव उर चारिड अवस्था बिभ्लुन्द सहित बिराजद्दी ।
प्रतिविम्ब चाददे किसी अवस्थाकों पहुँचे, पर चिम्बसे उसका साथ नहीं छूटता। यथा--त्रष्म जीव इव सद्दज सँघाती ।? अवस्थाभेदके सम्बन्धसे चिम्बमें भी भेदकी कल्पना होती है। सुपु्ति, स्वत और जाग्रतके भेदसे जीव ऋ्रमसे प्राश, तैजल और विश्व हुभा । उसी भाँति तुरीय ब्रष्य भी ईश्वर, हिरण्यगर्म और विराद कहलाये । ऐसा संसारका रूप अनादिकालसे चला आता है, केवछ समझानेके लिये 'तबते? कहते हैं | यथा---
विधि प्रपंच अस अचल अनादी ।
ज्ञीव सयड संसारी--जीव अपने सहज स॒माव सच्चिदानन्दरूपकों छोड़कर ईश्वरांदाके ऐ/धर्यको खोकर संसारी हुआ, देहबाला हुआ । अब ( १ ) लिज्ञदेह (२) लिज्नदेहमें स्थित चिच्छावा और (३ ) अधिष्ठान चैतन्य, तीनों मिछ्कर जीव कहल्यये | इस प्रकार त्तीन प्रफारके जीव हुए। (१) पाससार्थिक (२) प्रातिमासिक और (३) व्यावहारिक | पारमार्थिक जीव कूथ्स्प है और प्रात्तिमासिक जीव चित्- जड़की ग्रन्थिवालछा प्रतिविम्ध है और व्यावहारिक जीच लिझ्लदेहवाला है। इसी तीसरेकों संसारी कहा । इसीका लछोकपरलोकर्म आना-जाना लगा रहता है। स्थूछ-शरीर छूटता रहता है, पर यह लिज्लशरीर नहीं छूटता । यथा--
कौन जोनि जनमेउ जहाँ भाहीं । में खगेंस भ्रसि श्रसि जग साहीं ॥
ऐ अंथि न छूट न होइ खुखारी--न जढ़-चेतनवाली अज्ञामकी गॉँठ छूटती है और न जीव सुखी होता है। अज्ञानवाली गॉँठ च्चूटे
७ * झानदीप्रक
बिना सहज-खरूपकी प्राप्तिका दूसरा कोई उपाय नहीं है। किसी प्रकार जडञ-चेतनकी गांठ छूटनी चाहिये | यथा--- तुलूसिद्ास "मैं? 'मोर” गये बिचु जिव सुख कचहूँ कि पाचे तीनों चौपाइवोंमें सर्वप्रथम साधन मुमुक्ष॒ुत्वका वर्णन किया । श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥१५॥ अर्थ--वेद-पुराणोंने चहुत-ले उपाय वतछायें हैं, पर गाँठ डउलझती ही जाती है, छूटती नहीं । श्रुति पुरान-अर्थात् वेद-पुराणसे बढ़कर कोई प्रमाण नहीं, यथा- ( मारुत खास ) निगम निजवानी। तथापि ये भी जड़-चेतनके अध्यास- पूर्वक ही प्रहच होते हैं | अतणव अविद्यावाले ही हैं, पर प्रन्थिमेदका उपाय बतलानेमें भी यही समर्थ हैं । तस पूजा चाहिय जस देवता ॥ चहु कद्ठेड उपाई-बहुत-से उपाय वेद-पुराणोंने बतलाये हैं। जप; तप; श्रत, यज्ञ) दानादि अनेक साधन जो बतछाये गये हैं वे सब जीवके कल्याणके लिये ही हैं | यथा-- घप तीरथ उपवास दान सपष जो जेंहि रुचे करो सो। पायेद्ि पर जानियो करमफलछ भरि भरि बेद परोसो॥ जागम ब्रिधि जप जोग करत नर सरत न काज खरो सो ॥ अधिर अधिक अरु्झाई-अधिक-अधिक उल्झनेका कारण यह है कि-- जज अहेत अगुन हृदयेसा॥ अकल अनोह जनास अरूपा | अनुमव-गम्य अखंड अनूपा ॥ “का कर्मकाण्डमें उपयोग नहीं है। और वाह्मधर्म, देहधर्म, इन्द्रियधर्म
शतपश्च चौपाई ण्ट भर अन्त/करण-घर्म-सम्बन्धी मिधि-निषेध कदकर ही कर्मकथाका उपदेश है। (१) बाह्मघर्म, यथा--- पूजहु आमदेव सुर नाया। को बहोरि देन बलि भागा ॥ (२ ) देहधर्म, यथा-- करहु जादू त्प सेलकुमारी । ( ३ ) इन्द्रियर्म, यथा--- काटिय तासु जीह जो वलाई | श्रवन मुद्दि न तु चलिय पराई ॥ (४ ) अन्तम्करण-घर्म, यथा--- सनहु न आनिय अजमरपति रघुपति भगत अकाज्ञ । इन विधियोंके पालनमें धर्म है। स्वर्ग है, पर कर्मसन्तति बढ़ती हीं जाती है | बिना अध्यासकी दृढ़ता बढ़ाये कोई धर्म नहीं हो सकता ! अतः वाह्मपदार्थ, देह, इन्द्रिय और अन्तःकरणमें अध्यार्सोंकी उलक्षन बढ़ती ही जाती हैं, यथा--“मर कि जाहि मल्हीके धोये ।? छूट न-चित््जड़-अन्यथि नहीं छूटती | कारण यह कि साधन- चतुष्टयकें बिना तत्व-विवेकका अधिकार नहीं होता । अतः जिसने साधन नहीं किया उसे शात्रके पाण्डित्यसे मी शान नहीं होता, वथा--- वाक्य ज्ञान जर्त्यंत मिपुन भवपार कि पावे कोई । लिसि शृद्द साक्ष दोपके बातनिह तस निदृत्त नहिं होह। ( विनय ० ) ( १ ) नित्यानित्य-वस्तु-विवेक ( २) इहछोंक और परलोकके विषयभोगसे विराम ( ३ ) पद-साधन-सम्पत्ति और ( ४ ) मुमुझुत्व ये
चार साधन हैं और शम, दम, उपरति, तितिक्षा; श्रद्धा और समाधान ये घद्सम्पत्तियाँ हैं, इन सबका वर्णन यथास्थान किया जायगा |
ण्ष्् छानदीपक
इस गकार साधन-चत॒ष्टय-सम्पन्न अधिकारी जब गुरुवेदान्त-वाक्य- जन्य शानसे ग्रन्थि-मेद करना चाहे तभी सम्मव है | नहीं तो-- सुनिय गुनिय समुझिय समुझाधय दसा हृदय नहिं जावे । जेद्दि अनुभव विनु मोहजनित दारुन भव विपति सतावये ॥ केवल शाल्रचर्चा या यों कहिये कि अनधिकार चर्चासे गाँठ नहीं छूटती ।
जीव हृदय तम मोह बिसेषी । ग्रंथि छूट किमि परे न देखी ॥
अर्थ-जीवके हृदयमें चिशेप मोहान्धकार है, इससे दिखायी दी नहीं पड़ता, फिर गाँठ तो कैसे छूटे !
जीव हृद्य-यहाँ हृदय कहनेंसे स्थूछ देहकी प्राप्ति दिखछायी । जीवकी स्थूल देहमें हृदय ही राजप्रासाद है, यथा--- अस प्रश्नु हृदय जछत अविकारी । तम मोदद विसलेपी-मोह अविवेककों कहते हैं, उसीको तम अर्थात् अन्धकार कद्दा गया है, इसीके कारण अध्यास होता है और यही अध्यासको बढ़ाता है | यथा-- मोह न ऊंध कोन्द्द केद्दि केह्टी ॥
अविद्यानरात्रिम मोह-तमकी प्रवछता होती है। जीव-हृदयपर अधिदाका अधिकार है, क्योंकि वहीं जड़-चेतन-प्रन्थि पड़ी हुई है । अन्धकार तो संसारी होनेके पहले ग्रन्थिमात्रसे दी था, परन्तु अब संसारी होनेसे अधिक हों गया | यथा-- भस हृदयसवन श्रभ्ु तोरा। तहँ बसे आई वहु चोरा॥ अति कठिन करहिं बरजोरा | सानहिं नहिं बिनय निहोरा ॥
शतपख् चौपाई ६०
त्तम मोह लोभ अ्ँकारा | मद क्रोध बोध रिपु सारा ॥ ऊति करहिं उपद्रव नाथा। मर्दहिं मोधहि जानि जनाथा ॥ मैं एक, अमित बटपारा। कोड खुनद न मोर पुकारा ॥ भागेड नहिं. नाथ उयारा। रघुनायक करहु सैँमारा ॥ कह तुलसिदास सुनु रामा | तस्कर छटह्ठधिं तव घामा॥ए चिंता मोहि नाथ अपारा | अपजस जनि होद तुम्दारा ॥ अंथि छूट किमि-गाँठ कैसे छूटे ! छूटना तभी सम्भव है; जब प्रकाशमें दिखलायी पड़े कि गाँठ कहाँ है और कैसी है! नहीं तो बिना देखे ही व्योलकर ममताके सूत्रोको इधर-उधर खींचनेसे बन्धन ही दृढ़ होता है | छूटनेकी कहाँ सम्भावना है
परे न देखी-अविद्या-रात्रिमें मोहान्धकफार छाया हुआ है । हृदयके
भीतर और भी घना अन्धकार है| जड़-चेतनकी गाँठ दिखायी ही नहीं पड़ती । अतएव दीपक जल्णना चाहिये ।
अस संजोग ईस जौ करई। तबहु कदाचित सो निरुअरई ॥१४॥
अर्थ-यदि ईश्वर ऐसा संयोग वना दे, तो कदालित् वह गाँठ खुलझ जाय |
अख संजोग-भाव यह कि ऐसा होना क्रिया-साध्य नहीं है ! संयोग जान पड़े तो हो जाय; संयोग ब्ह्माके दाथक्री बात है, मनुष्यकी सामथ्यसे सर्वथा परे है । यथा--जो त्रिघिवस अस बने सजोगू ।? ऐसा कहनेका भाव यह कि संयोगोंका सिलसिला बंध जाय । अर्थात् गौ भी सिछ जाय; चाय भी मिले, दूइनेवाछा; औदनेयाला, दूध उण्डा करने- वाला, दद्दी मथनेवाल्ा इत्यादि यथेप्सित मिलते ही चले जायें |
ईस जौ करई-अर्थांत् ईश्वर यदि करें। भाव यह कि ऐसा संयोग विधि मी नहीं कर सकते, वे तो खमके विश्वु हैं, कारणपर उनका
घर ज्ञानदीपक
अधिकार नहीं है, कर्म शुभाद्यम दिया करते हैं, यथा-कर्म सुमासुम देइ बिधाता ।! और ईश्वर सुपुप्तिके विभु हैं। कारणपर भी उनका अधिकार है, कर्मकी अपेक्षा न करके भी संयोग कर सकते हैं | अथवा जीव जिनका अंश् है, जिन्होंने करुणा करके उसे नरदेह दी है, वही चाहे
तो करुणा करके ऐसा संयोग भी कर दें, यथा-- कवहूँ करि करुना नरदेही | देत ईंस विद्व देत सनेही ॥
और वह ईशका किया हुआ संयोग इस प्रकार हो कि सात्विकी श्रद्धा हरिकी कृपासे हृदयमें बसे, और उस श्रद्धाद्मरा खूब घर्माचरण हो जिसमें श्रद्धा परिपुष्ट होती जाय और धर्मके साथसे रण और तमक्रे अमिमूत होनेसे साक्चिक भाव उत्पन्न हो । तब श्रद्धा द्ववीभूत शोती है; धर्माचरणका सात््विक परिणाम अहिंसा--दया-भावमें प्रकट होता है । तब वशीभूत निर्मल मनको श्रद्धाके चरणोंमें छगा दे, और दृढ़ विश्वास करके अहिंसामें ग्रतिष्ठित हो जाय, प्राणिमात्रकों अमयदान दे | जबंतक धर्मत्रतधारीके हृदयमें दयाका प्रादुर्भाव नहीं होता, तवतक समझना चाहिये कि परम घर्मका उदय नहीं हुआ । अहिंसामें प्रतिष्ठित होनेपर निष्कामतासे अद्दिसागत कामनाके अंश्वको दूर करे | कामनाकै अंशको दूर करनेंसे जो ताप होता है उसे क्षमाद्वारा तोषसे दूर करे | जब शीतल निष्काम दयाभाव हो जाय तो उसे घृतिसे ठोस करे | तव उस शीतल ठोस निष्काम दयाभावक्रा दमपूर्वक ग़ुरुगासत्रोपदेशानुसार विचारसे सन््यन करे । ( दसपूर्वक इसलिये कहा कि छृदय-दौर्बेल्यकों खान न मिले, जैसे व्यमिचारी व्यक्तिकी तृप्ति आदि शाल्रविरुद्ध विधयका दयामें समावेश न हो ), विचार करे कि संसार दुःखसय है | इस जीव इसमें पड़े हुए छेश उठा रहे हैं, इस दुःखकी अत्यन्त निशृत्ति केसे हो इत्यादि | इन विचारोंसे साधक जिस निमश्चयपर पहुँचेगा, वही वैराग्य है | उस निश्चयका यह रूप होगा कि “ये विषय अनित्य हैं, दुगःखकी योनि हैं, चाहे ये इस छोकके हों चाहे परछोंकके ।! और फिर उनसे
शतपश्च चौपाई चर
अपने-आप जी हटेगा । जब चित्तमें विराग आ जायगा तब बह विधयोंकों छोड़ सकेगा, और तब उसे योगका अधिकार होगा |
चितद्ृत्तिका निरोध योग है| वेराग्यसे चित्तइत्तिनिरोधकी योग्यता प्राप्त होती है, परन्तु शुभाशुभ कर्मसे सम्बन्ध त्याग किये बिना निरोध नहों हो सकता । चुद्धिद्दारा झुमाशुभ कर्म-सम्बन्ध त्यागते ही चित्त निरुद्ध दोता है। ममता नष्ट होती है, तब सत् वस्तु॒में चित्त एकाग्र होता है । 'तत्” पदका ज्ञान अर्थात् परोक्षज्ञान होता है । तब विज्ञान- रूपिणी ( उपनिषद्-जन्य ) बुद्धि उत अपरोक्षशानको चित्तमें जमाकर समता स्थापन करती है । अब (त्वं” पदार्थका झोघन छोष है | अतः इस प्रकारका परोक्षशानी ध्यानमें स्थित होंकर अपनेकों स्थूछ, सक्षम; कारण तीनों शरीरोंसे पृथक भावना करके, अर्थात् त्व! पदार्थका शोधन करके तुरीयावस्थाको प्राप्त होता है | फिर तु॒रीयावस्थाके संस्कारों- को एकीमूत करके परोक्ष-ज्ञानमें मिला देता है | यह “असि? पद है। और तव शब्दानुविद्ध समाधिमें स्थित होनेसे आत्मानुमव प्रकाश उत्पन्न होता है, और वह 'सोडहमस्मि! चइत्तिवाछा अपरोक्ष होता है। यह मोहान्धकारकों मिटा देता है। परन्तु अभी चित्-जड़-पन्थि बनी हुई है । विज्ञानरूपिणी बुद्धि इस प्रकार अन्थि-मेदन कर सकती है। यदि ग्रन्थि-मेदन हो गया तो अध्यास सदाके लिये मिथ गया और सहज- स्वरूप कैवल्यकी प्राप्ति हुई | यही परमपद है । इसी बातकों दीपकके रूपकमें सुलमताके लिये विशद्रूपसें वर्णन किया जायगा |
तबहु कदाचित-माव यह कि ईशके ऐसा संयोग कर देनेपर भी कार्य-सिद्धिमं बहुत सन्देह है | क्योंकि साधन बहुत कठिन है और संसारी जीव रोगी हैं | रोगीकी क्या सामर्थ्य जो कठिन साधनका सासना कर सके । यथा---
मोह सकक व्याधिनकर मछा । तेहिते घुनि उपजें बहु सूछा ॥ यदि विधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरव सय प्रीत्ति बियोगी ४
द्३े ज्ञानदीपक
एक व्याधिवस नर मर, ए असाध्य बहु व्याधि। संतत पीडहि' जीव कहेँ, सो किमि रद्द समाधि ॥ और दूसरी वात यह है कि “अक्वतोपास्ि-ज्ञान' जिसमें भक्तिकी सहायता नहीं है, सिद्ध नहीं होता, यथा--- जे क्लानमान विमतच तव भयहरनि सगति न आदरी। से पाह सुरहुर्लन पदादपि परत हम देखत हरी ॥ सो--वबह चित्त ( अस्ति; भाति; प्रिय ) और जड़ ( मामरूप ) की गांठ । निरुअरई-अर्थात् वह गाँठ सुछझे । अस्ति ( सत् ), भाति ( चित् ) और प्रिय ( आनन्द ) ये तीन अंश ब्रक्मके, और नाम और रूप) दो अंश मायाके, इन्हीं पॉँचॉने उल्झकर प्रपश्चकी गाँठ बना खखी है, और इन्हींके उठ्झनपर उलझन पड़नेसे संसार बना हुआ है, सो सुल्झ जाय ! अर्थात् तीन अंश ब्रह्मके प्रथक् और ( नाम-रूप ) दो अंग मायाके प्रथक हो जाये । गॉठके अधेरेमें होनेके कारण प्रकाशके लिये दीपका संकल्प हुआ | दीपके साधनमें, ठदृरनेमें, ऐंसा विज्न- वाहुल्य है कि संयोग अनुकूल होनेपर भी कहना पड़ा कि कदाचित् ही वह सुलछ्झ सके | यथा--- साधव ! भमोहफाँस क्यों दृटे ? थाहिर कोटि उपाय करिय अभ्यंतर अंथि न छूटे ॥ घृत-पूरन कराह अंतरगत ससि-प्रतिबिम्ब दिखावे।) इँघन जनक छगाय कऊपसत औटत नास न पाते ॥ त्तरुकोटर भहँ वस विंग तरू काटे मरे न जैसे । साधन करिअ विचारहीन मन सुद्ध होट्ट नहिं तेसे ! अंतर मलिन विपय भन अति तनु पाचन करिय पखारे । सरइ न उरग अनेक जतन वलमीकि विविध विधि सारे ॥
शतपञथ्च चौपाई दे
तुलसिदास हरि-गुरु-करुना विजु बिमझ विवेक न होई। बिहु विबेक संसार-घोर-निधि पार न पाये कोई ॥
सात्विक श्रद्धा घेनु सोहाई। जो हरिकृपा हृदय बसि आई ॥
अर्थ-सार्विकी अ्रद्धा वियायी हुई अच्छी गो दै। यदि वह हरिरपाले हृदयमें आकर बसे ।
सात्विक अद्धा-अड्धा तीन प्रकारकी होती है (१) तामसी (२) राजसी और ( ३ ) सात्त्विकी । यहाँ तामसी एवं राजसी श्रद्धाका उपयोग नहीं है। यहाँ तो साक््विकी भ्रद्धकी द्वी आवश्यकता है; क्योंकि यह पुरुष भ्रद्धामय है। जिसकी जैसी श्रद्धा है वैसा ही यह है, अतएुब सात्विकी भ्रद्धावाछा पुरुष भी सात्विक होगा ।
घेलु खोदाई--सोहाई व्यायी गो है;माव यह कि राजसिक-तामसिक श्रद्धा भी गो हैं, पर वे सोहाई नहीं हैं, दूध नहीं देंगी, यथा--
तामस घर्से करहिं नर, तप मप ब्रत जप दान। छेव न बरसहिं धरनिपर वोए न जामहिं घान ॥ जहु रज स्वहप सच्व कछु तामस | द्वापर हप सोक भय मानस ॥ इहरिक्ृपा--हरि सच्चगुणके अधिष्ठाता हैं। अतएव साक्त्विकी अद्धाकी प्राप्तिके लिये हरिकी ऊंपाकी आवश्यकता हे ।हर तमोगुणके अधिष्ठाता ह्ँ सुधुसिके विश हैं; उनकी कृपासे हरिकी कृपा होती है, सुघुत्तिकी कृपासे जाणति होती है और जाते ही ठुरीयका द्वार है। जब शंकर कृपा करके तमकों दबावेँंगे; तब सच्तका उदय होगा |
जो हृदय बसि आई-अथौत् जो हरिकी कृपासे हृदयमें आकर बसे, क्योंकि 'जीव छदय तम मोह बिसेषी -छृदयमें अन्धकार मरा हुआ है।
च््ण जशानदीपक
बछड़े वाली गौ तमोंमय अंधेरी जगहमें जाना नहीं चाहेंगी। (इस चौपाईसें अद्वौसम्पत्तिका वर्णन किया है | )
जप तप ब्रत जम नियम अपारा।
जे श्रुति कह सुभ धरम अचारा ॥१ण।
अर्थ-जप) तप+ श्रत, यम, नियम और वेद्विद्वित धर्मांचार येसव अपार हैं। जप, तप, बत; शुभ धर्माचार ये सब उपरामता- के अंग हैं; यम-नियम दोनों समाधानके अंग हैं। जप तप त्रत-यहाँ जपसे वाचा, तपसे मनसा और बतसे कर्मणा शर्मांचण बतछाया है, नहीं तो नियममें तीनोंका समावेश हो जानेसे पुनर्क्ति दोष आ जायगा । और गोस्वामीजीने यही अर्थ लिया भी है। जप, यथा- तुम पुनि रास राम दिन राती । सादर जपहु अनंग अजराती ॥ तप; यथा-- विसरी देह तपहिं मन छागा ॥ (इससे तितिक्षाका वर्णन किया । ) ब्त, यथा--हरितोपन बश्रत ह्विज सेवकाई ॥ यम पॉँच हैं--अ्रह्मचयमदिंसा व सत्यास्तेगापरिगद्दाः । (१ )--ब्रह्मचयें--स्मरणादि अष्टचिंघ मैथुनके अभावकों कहते हैक | यथा-- ब्रह्मचय ब्रत रत मति धीरा । तुमद्धि कि करदह्द मनौभव पौरा ॥ (२) अहिंसा--सदा-सर्वदा किसी भी प्राणीसे द्ोह न रखनेको कहते हैं, यह सव यम-नियमोंकी जड़ है । यथा-- _ १-यह पद सम्पत्तियोंमेंसे पॉचवीं है ।
२-शीतोष्ण छुख-दुःखादि सहनेको तितिक्षा कहते हैं। यदद पट सम्पत्तियों मेंसे चौथी है।
* स्मरण कीतेन केकछिः प्रेक्षणं गुद्ममापणम् । सह्ूूल्पोध्ध्यवसायश्व क्रियानिद्र तिरिव चच णज्
आतपश्च चौपाई ध््दे
परस धर्म श्रुति बिदित अहिंसा । चरम कि दया सरिस हरियाना ॥ इसीकी सिद्धिके लिये शेष यम-नियमोंका उपयोग है | अहिंसाकी अतिष्ठा होनेपर उसके सन्निकटमें रहनेवाले प्राणिसात्र चैर त्याग द्वेते हैं, यथा-- चरहिं एक सेंग गज पंचानन । बैर॑ बिगत बिचरहिं सब कानन 0 (३) सत्य---इन्द्रिय और मनके छारा जेसा निश्चय किया गया; बैसी ही वाणी और बैसे ही मनके होनेको रुत्य कहते हैं | वह वाणी बश्विता।; आन्ता। और प्रतिपत्तिवन्ध्या $ नहीं होनी चाहिये । प्राणियोंके- उपकारके लिये होनी चाहिये, उपघातके लिये नहीं ।
एतन्मैथुनमण्ज्ध अवदन्ति.. मनीपषिण+ । विपरीर्त जहामचयेमनुष्ठेयं मुसुक्षुमिः ॥
“ल्लीके रूपछावण्य, ह्वभाव आदिका स्मरण करना, दूसरेंके प्रति कहना, ल्लीके साथ क्रीढ़ा करना, ल्लीका दर्शन करना, एकान्तमें सम्माषण करना, स््रीके संगके लिये इढ़ निश्चय करना,उसकी प्राप्तिके ल्यि उयोग करना तथा अमीष्ट सिश्वयकी पूर्ति करना-श्न आठ प्रकारके आचरणोंसे वचनेको जछ्मचर्य कहते हैं
+ बब्ननापूर्ण, जैसे अपने पुत्र अइ्वत्यामाका मरण सुनकर द्रोणाचार्यने युधिष्ठिससे पूछा हे जायुष्मन् , हे सत्यवादी, सचमुच अद्व॒ृत्थामा मारा गया ?? इसके उत्तरमें, थुधिष्ठिरका अद्वत्थामा नामक हाथीको अमिलक्ष्यकर, “हाँ, सच अश्वत्थामा मारा गया।? ऐसा कथन वच्ननापूर्ण है। यही वाणी वश्चिता कही जाती: है। वक्ताका अभिप्राय जन्य हो और श्रोता अन्य समझ जाय । जैसे यहाँपर शुधिष्ठिरने द्ाथीको लृक््यकर कहा और द्रोणाचार्यने अपना युत्त समझ लिया । पर इसको कहनेमें युधिष्ठिरने छलसे काम लिया। इसलिये यह वाक्य सत्य नहीं है ।
[| आ्ञान्तिसयुक्त। वक्ताको खयं अम हो और दूसरेको समझाना चाहे।
$ अप्रसिद्ध पदोके रहनेसे यथार्थ वोध करनलेमें गक्षम। जैसे आवेल्ोगोंके अति स्लेच्छ भाषा वोध करानेमें मसमथ हैं ।
दछ ज्ञानदीपक
यथा--कह॒हिं सत्य प्रिय बचन विचारी” इससे क्रियाके फलकों आश्रय मिल्ता है, यथा--
“सत्य मूल सब सुकृत सुहाये |?
(४) अस्तेय--आ्वाखविधिके प्रतिकूछ दूसरेके द्वव्यकों लेना स्तेय कहलाता है, और उस स्तेयके निषेघकों अस्तेय कहते हैं | स्पृहा न रखना भी अस्तेय कहलाता हे। यथा--धन पराव बिषते विष भारी ॥! इससे सब रल उपस्थित होते हैं, यथथा--डारहिं रतन तर्हिं नर लहदीं ॥?
(०) अपरिश्रद्द-विषयोंक्रे अजन, रक्षण, क्षय और संगसे हिंसादि दोष होते हैं; अतएव उनके अखीकारकों अपरिग्रह कहते हैं | यथा---
यद्यपि जर्थ जन सूल तम कप परव पुद्धि छागे।
त्तदपि न तजत मूढ़ ममतावस जागतह्ट नहिं जागे ॥
( विनय० ) इससे जन्मकथनताका बोध होता है, यथा--“निज-निज मुखन कही निज होनी |?
नियम भी पाँच हैं---
शौचसन्तोपतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि. नियमा$ ।
(१) झ्ौच-देद और मनके मछूकों दूर करमा शौच है | यथा-- सकल सौच करि जाइ अन्हाये ।? शौचकी स्थिरतासे बुद्धिकी शुद्धि, उससे मनकी प्रसन्नता; उससे एकाग्रता; उससे इन्द्रियजय और उससे आत्म- दर्शनकी थोग्यता होती है। अपने शरीरसे घृणा और दूसरेके संसर्गसे घृणा होती है । यथा--रह्हिं न अंतहु अधम सरीरू ।!
(२) सन्तोप-प्रात्त साघनसे अधिक पैदा करनेकी. अनिच्छाकों सनन््तोष कहते हैं, यथा--“आठवे जथालाभ संतोषा |? इसके द्वारा सबसे बढ़कर सुखकी ग्राप्ति होती है, यथा--“मन संतोष सुनत कपि बानी ।?
इझातपश्च चौपाई ६८ (३) तप-जाड़ा-गर्मी, भूख-प्यास आदि इन्द्रके सहनेकी कहते हैं। यथा-- कछु दिन भोजन बारि बतासा | किये कठिन कछु दिन उपचासा ॥ इससे देह-इन्द्रियकी सिद्धि और अश्जुद्धिका क्षय होता है। यथा-- बरप सदहस दस त्यागेउ स्रोऊ। ठाढ़े रहे एक पणग दोऊ॥ा॥ा सॉंगहु बर वहु भाँति छोमाये | परम धीर नहिं चलहिं चलाये ॥
(७) खाध्याय-मोक्षशासत्रका पढ़ना अथवा प्रणबका जप करना । इससे देवता-ऋषियोंके दशेन होते हैं | यथा---
नाम जपत प्रञ्चु कीन्ह असादू। भगतसिरोसनि से प्रहलादू॥
(५) ईश्वरप्रणिचान-सव कर्मोंकों ईश्वरापंण कर देना, यथा-- “प्रमुहिं समर्पि कर्म भव तरहीं।|? इससे समाधिकी सिद्धि होती है। यथा--- “सहज बिमछ मन छाग समाधी ॥?
अपारा-कहनेका भाव यह है कि इन द्शों थम-नियमेमेंसे एक- एक असाध्य है। इनका पार नहीं पाया जा सकता । यह रोगी जीव क्या पार पावेगा १
जो श्रुति कहद-जिसके लिये वेदमें विधि है। वेदकी आशा
धर्म है। वेदकी आज्ञा दो अकारकी होती है--(१) विधि और (२)
निषेध | इनमें निषेघ स्वथा त्याज्य है, इसलिये 'सुम धरम अचारा कहा |
छुस चरमस अचारश-इसस सम्पूर्ण कमंकाण्ड आ गया। यज्ञ- दानादि शेष धर्म सब इसीके अन्तर्गत हैं | यथा--
जहँ छगि कह्यो घुरान श्रुति एक एक सब जाग। वार सहस्त सहस्त्र लुप कियो सहद्तित अनुराग ॥
द््ष जशानदीपक
(इस चौपाईसे उपरम # कहा | )
तेइ तृन हरित चरइ जब गाई। पेन्हाई भावबच्छ सिसु पाई पेन्हाईं ॥
अर्थ-डस हरे ठुणको जब गाय चरे और भावरूपी चछड़ा पाकर उसके थनमे दूध आ जाय
तेइ ठून हरित-वे ही हरे ठण अर्थात् जप, तप, ब्रत, यम; नियम और झुभ धर्माचार--ये छह्ाँ प्रकारके सरस तृण उस श्रद्धारूपिणी गौके लिये चारारूप हैं | लौकिक गौका चारा ठृण, ओषधि और वनस्पति-भेदसे तीन प्रकारका होता है और उनके भी वीजरुद तथा काण्डरह-मेदसे दो प्रकार होते हैं) कुछ छः प्रकार हुए; | इसी भांति श्रद्धारूषिणी सौके चाराके भी जप-त्तपादि-मेदसे छ+ प्रकार कहे हैं
हरा तृण कहनेका भाव यह कि तृण सूखा न हों यरं॑ सरस हो, नहीं तो गौ चावसे नहीं खायगी, फलतः यथार्थ तृप्ति न होगी; दूध भी कम होगा, जिससे बछड़ेकी तृत्ति भी कठिन हों पड़ेगी, किर और कार्मो- के लिये दूधका मिलना तो दूरकी बात है | अतः जप-तपादि आनन्दरहित न हों, यथा--
अस्थिमात्र है रहा सरीरा | तद॒पि मनाक मनहि नहिं पीरा॥
चरइ जवब-मभाव यह कि जैसे गौ गोंठ छोड़कर बाहर जाय और गोचरभूमिमें चरे, इसी मौति श्रद्धा भी हृदयसे बाहर शब्द, स्पर्श, रूप) रस, गन्धरूपी गोचरमें, जिस रुचिसे भूखी गाय इरी घास चरती है; उसी रुचिसे शुम धर्माचरण करे और तृत्त हों, यथा---
नित नव रास प्रेमपन पीना। बढ़्दह ध्मदक सन से सलीना व
गाई-गाय कहा; थेनु नहीं कहा) क्योंकि वश्या घर छोड़ आयी है | अकेली घास चर रही है; पर चित बश्चेकी ओर छगा है; यथा--
# उपरम खधर्मानुष्ठानकों कहते हैं, यह पट. सम्पत्तियोंगसे तीसरा दै ।
शतपश्च चौपाई ७०
जज्ञु धेज्न बारऊक बच्छ तजि शृद्द चरन बन परवस गहड।
यह गाय जब अघाकर त्ृण चरे तभी इतना दूघ दे सकेगी कि जिसमें बच्चेका भी काम चले और अपने काम भी आवे | स्मरण रखना चाहिये कि चरा हुआ चारा गौके पेटर्मे है | यह सामथ्यं गौमें ही है कि उस चारेका सात्त्विक परिणाम दूधघके रूपमें जगत्के कल्याणके लिये देवे, राजसिक परिणाम अपने शरीरके पोषणके लिये अलय कर छे और तामसिक परिणाम गोवर आदि प्रथक् दें । किसी भी शिल्पीकी सामर्थ्य नहीं है कि इस प्रकारसे साक्त्विक, राजसल और तामस परिणाम किसी उपायसे प्रथक कर सके । इसी भांति श्रद्धासे आचरित झुम धर्म भ्रद्धाके उदरमें जाकर परिणामकों प्रास होता है और उसके साक्त्तिक परिणाम-- परम घर्मसे जगत्का हित होता है, नहीं तो जिस भाँति तृणादि मनुष्यके ग्रहणयोग्य नहीं रहते, उसी भाँति भ्रद्धाहीन शुभ धर्म भी मनुष्यके कामके नहीं होते, वथा--
श्रद्धा बिना 'धरस नहिं होई। बिनु महि गंध न पाने कोई ॥
गौने जितने प्रकारका तृण खाया है उन सबके सार्विक परिणाम- का स्वास्थ दूघ है, इसी प्रकार श्रद्धासे जो यम-नियमादि आचरित हुए हैं उनके साक्ष्विक परिणामका स्वारस्थ परम धर्ममें है ।
भाववच्छ सिद्धु-भ्रद्धारूपिणी घेनुका साक्ष्चिक भाव अबोध बच्चा है, वह छल-कपट नहीं जानता, अतएव बहुत प्यारा है। चरनेके समय भी उसीकी ओर ध्यान छग्ा रहता है। इसी भाँति श्रद्धासे धर्मांचरण हो और वह भाव हत न होंने पावे, यथा--- किये सहित सनेह् जे अध हृदय राखे चोरि। संग बस किय सुभ सुनाये सकल छोक निहोरि॥ करों जो कछु धरों सचि-पचि सुकृत-सिा बदोरि। पैडि उर बरबस कृपानिधि दंभ छेत झँजोरि ॥
9१ जशञानदीपक
पाइ पेन्द्राई-जब गौ दरी-हरी घास चरके तृत्त होंकर सम्ध्याके समय घर छौटती है, तो वालक-बच्छकों पाकर द्रबीभूत हो जाती है । उसके थर्नोमे दूध आ जाता है। इसी भाँति श्रद्धा धर्माचरण करके कृतझत्य होकर भावपुष्टिके लिये अन्तर्मुख होती है। उस समय वह परम घमे प्रसवमें समर्थ होती है, यथा--
दिन जंतपुर रुख श्रवत थन हुंकार करि घावत्त भई । नोइनि वृत्ति पात्र बिसवासा। निर्मल मन अहीर निज दासा॥ १८॥
अर्थ-चत्तिको नोइन, विश्वासको दोहनी और दासीभृत निर्मंछ मनकों अहीर वनाचे।
नोदनि-दूहनेके समय जिस रज्जुसे गौका पैर बाँधते हैं उसे नोइन कहते हैं। वह नोइन बृत्ति है। अर्थात् इत्तिकों उस समय भ्रद्धाके चरणंमें लगा देना चाहिये, जिसमें श्रद्धा अचल रहे | पात्र विसवासा-विश्वासको पात्र ( दोइनी ) वनावे; जिसमें दूध रखा जा सके | विश्वासमें छिद्र होनेसे दूध बह जायगा। यथा-- कौनिउ सिद्धि न बिन. विसवासा |
निर्मल मन अहीर-अहीर अर्थात् दूहनेवाला निर्मठमन हों । काम-संकल्पवाला मन मठीन और कामवर्जित मन निर्मेह कहलाता है; अशुद्ध मन श्रद्धाकों छटका देगा; तो बना-बनाया कास बिगड़ जायगा ।
निजञ्ञ दासा-वह अद्दीर अपना दास हो, अपने वचमें हो अर्थात् मन निर्मल होनेपर भी अपने काबूमें न हो तो काम नहीं चछता; अतः वह निर्मल भी हों और अपने काबूमें भी हो । गौके पेन्द्रानेपर वह निर्मल मनरूपी सेवक अद्दीर जब उस गौके चरणोंमें उसे निश्चक करनेके लिये नोइन लगाकर देखे कि अब वछड़ा अपनी पुष्टिके लिये योग्य
इातणञ्थ चौपाई ०
जनु घेहु बाहक बच्छ तजि शृह चरन बन परवस गई।
यह गाय जब अधाकर तृण चरे तभी इतना दूघ दे सकेगी कि जिसमें बच्चेका भी क्राम चले और अपने काम भी आवे। स्मरण रखना चाहिये कि चरा हुआ चारा गौके पेटमें है। यह सामथ्थ्य गौमे दी है कि उस चारेका सात्त्विक परिणाम दूधके रूपमें जगत्के कल्याणके लिये देवे, राजसिक परिणाम अपने शरीरके पोंषणके लिये अछग कर ले और तामसिक परिणाम गोबर आदि प्रथक् दे । किसी भी शिव्पीकी सामर्थ्य नहीं है कि इस प्रकारसे साप्यिक, राजसल और तासस परिणाम किसी उपायसे प्रथक कर सके । इसी भाँति श्रद्धासे आचरित शुम धम श्रद्धाके उदरमें जाकर परिणामकों प्राप्त होता है और उसके साक्त्विक परिणाम--- परम धर्मसे जगत॒का हित होता है, नहीं तो जिस भाँति तृणादि मनुष्यके ग्रहणयोग्य नहीं रहते, उसी भाँति श्रद्धाही न शुभ धर्म भी मनुष्यके कामके नहीं होते, यथा--
अछ बिना धरम नहिं होई। बिच महि गंध न पावे कोई ॥
गौंने जितने प्रकारका तृण खाया है उन सबके सात्विक परिणाम- का स्वासस्य दूघ है; इसी प्रकार श्रद्ास जो यम-नियसादि आचरित हुए हैं उनके साक््विक परिणामका खारस्य परम धर्ममें है ।
भावबच्छ सिखु-भ्रद्धारूपिणी घेनुका सातक्त्विक भाव अबोध बच्चा है; वह छल-कपट नहीं जानता; अतएब बहुत प्यारा है। चरनेके समय भी उसीकी ओर ध्यान लगा रहता है। इसी मौंति श्रद्धासे घर्माचरण हों और वह भाव हत न होने पावे, यथा-- किये सहित सनेह जे अघ हृदय राखे चोरि। संग वस किय सुभ सुनाये सकक ऊछोक निहोरि ॥ करों जो कछु घरों सचि-पचि सुकृत-सिकछा घटोरि । पेंडि उर बरचस कृपानिधि दंस लेत जखैजोरि ॥
१ “ जझानदीपक
पाइ पेन्द्राई-जब गो हरी-हरी घास चस्के तृत् होकर समन्ध्याके समय घर लौटती है, तो वालक-बच्छको पाकर द्रवीभूत हो जाती है । उसके थनोंमें दूध आ जाता है। इसी भाँति श्रद्धा धर्माचरण करके कृतकृत्य होकर भावपुष्टिके लिये अन्तर्मुल होती है। उस समय वह परम धर्म प्रसवर्में समर्थ होती है; यथा--
दिन अंतपुर रुख श्रवत थन हुंकार करि घावत्त भई । नोइनि बृत्ति पात्र बिसवासा। निर्मल मन अहीर निज दासा॥ १८॥
अर्थ-तुत्तिको नोइन, विश्वासको दोहनी और दासीभृत निर्मल मनको अहीर बनाघे
नोइनि-दूहनेके समय जिस रज्जुसे गौका पैर बॉधते हैं उसे मोइन कहते हैं। वह नोइन बृत्ति है। अर्थात् इक्तिकों उस समय श्रद्धाके चरणंमिं गा देना चाहिये, जिसमें श्रद्धा अचल रहे | पात्र विसवासा-विश्वासको पात्र ( दोहनी ) बनावे, जिसमें दूध रखा जा सके | विश्वासमें छिद्र होनेसे दूध बह जायगा, यथा--- कौनिउ सिद्धि न बिन. विसवासा |
निर्मेछ मन अहीर-अहीर अर्थात् दृइनेवाछा निर्मलमन हो | काम-संकल्पवाल्ा मन मलीन और कामवर्जित मन निर्मेल कहलाता छे अश्युद्ध मन श्रद्धाकों छटका देगा, तो वना-बनाया काम बिगड़ जायगा |
निज दासा-वह अद्दीर अपना दास हो, अपने वश्में हो अर्थात् मन निर्मल होनेपर भी अपने काबूमें न हो तो काम नहीं चछता, अतः वह निर्मेल भी हो और अपने काबूमें भी हो। गौके पेन्ानेपर वह निर्मल मनरूपी खेवक अहीर जब उस गौके चरणोंमें उसे निश्चक करनेके लिये नोइन लयाकर देखे कि अब बछड़ा अपनी पुष्टिके लिये योग्य
झातपञ्च चौपाई २
मात्रामें दूध पी छुका तब उसे इृटाकर दोहनीमें दूध डुह्दे। इस भाँति धर्माचरणके द्वारा कझृतकृत्य होकर श्रद्धा अन्तमुंखी हो और सम्पूर्ण धर्मोके सात्विक परिणामसे सात्तिक भावकी पुष्टि करने छगे, तत्र भली भाँति वश किये छुए. कामसंकल्परहित मनकी जइत्ति लगाकर अपनी श्रद्धाकों अचछ कर ले । नहीं तो साक्ष्चिक भाव ( छुखभाव ) के हृटाते समय श्रद्धा छठक जायगी । और यदि सातक्त्विक भाव न हटाया जायगा; तो वह अनुष्ठित धर्मके सम्पूर्ण साक्विक परिणामकों पी जायगा । मनके सात्िक भावमें अनुरक्त दोनेसे भी सुखके साथ बन्धन होगा, अतएव साक्त्विक भावकों भी धीरे-घीरे हटाकर मनको परिपूर्ण विश्वासका पात्र करनेके लिये उसे श्रद्धामें लगा दे |
(इस चीपाईसे शम# कहा गया | ) परम घरमसय पय दुहि भाई ।
ओऔटइ अनलरू अकाम बनाई॥
अर्थ-हे भाई! परम धर्ममय दूध दुद्धकर उसे अक्रामकी आग वनाकर औटटे। परम घरममय पय-जो सात्त्विक परिणाम दूधरूपमें परिणत हुआ उसीको परम घर्ममय कद्दा अर्थात् अहिंसामय कह्दा, क्योंकि अहिंसामें ही शेष सब घर्मोकी चरितार्थता है, यथा-- “परम घरम शरुतिबिदित अहिंसा! । “धर्म कि दया सरिस दरिजाना ।?
दूसरा परम घममय”! कहनेका भाव यह है कि 'मयद प्रत्यय बहुतके अर्थमें होता है; अर्थात् उस दूघमें परम घर्म बहुत है, पर थोड़ा- सा काम, वासना; ममतादिरूप दोष मी हैं ।
डुद्धि भाई-विश्वासरूपी पात्रमें ही यह दूध डुह्य जा सकता है,
+--+-पपपत्+-+टर्््पाय ::ैप।भभप:भ/््चघ्प्प्"--...त.
# शाम मनोंनिम्मदकी कददते हैं, यद् पद् सम्पत्तिमें प्रथम है ।
छ३् शानदी पक
अन्य पात्रमँ रखनेसे बिगड़ जायगा, अतएवं परम धर्ममय सात्विक परिणामसे विश्वासरूपी पात्र भर लेना चाहिये | न मावके काम आ सके न मनके । क्योंक्रि भाव और मन दो ही पदार्थ ऐसे हैं जो श्रद्धासे घममके साक्ष्विक परिणामकी अलग कर सकते हैं, और केवल मन ही ऐसा है, जो उसे श्रद्धासि छेकर विश्वासके सुपुर्द कर सकता है। “भाई सम्बरोधन है तथा विचारके लिये आश्वासन है, यथा---
करे बिचार करों का भाई ।
ओऔटइ-अर्थात् पाक करे; गुणाधिक्यके लिये, घनीमावके लिये; जलरूपी अबगुणके नाशके लिये | यथा-- शद्धि गुन पय त्तजि अवगुन वबारी।
अनछ अकाम वनाई-अकामकी आगको प्रज्वलित करके औटे, अर्थात् आगपर रखकर देश्तक गरम करे, जिसमें उसके एक-एक परमाणु तकर्मे भी अकामकी आग पहुँच जाय | धर्मके सात््विक परिणामर्मे भी काम रह जाता है, क्योंकि धर्म सदासे ही कामका संगी है। धर्मका साथ सुख और स्वर्गसे है, और ये द्वी काम है | अकामकी अभि इसलिये कहा कि 'काम! शब्द यावत् वैषयिक सुखका वाचक है ( केवल स््री- सुखका दी नहीं ) । उसका त्याग ही अकाम है ) वेघयिक सुखमात्रके त्यागके ध्यानसे ताप दोता है, अतएव उसे अमि कहा; इस अभिकी उत्पत्तिके लिये कामकों दूर करना कर्तव्य है। फिर वह अभि आप-से- आप बनी रहेगी इसलिये बनाई कहा | अकामकी अग्नि परम घर्ममय पयका पाक करके उसके ग़ुणकों बढ़ा देगी, उसमें घनत्व पेदा करेगी और उसके कामांशकों दूर करेगी । औवनेसे दूध अत्यन्त गरम हो जाता है | यदि ऐसे समय जाँवन डाल्य जाय तो वह फट जायग्रा, अतएव उसे ठंडा करना चाहिये | गायके चरानेसे लेकर दूध औदनेतक मनका काम था; अब ठंडा करनेका काम क्षमाका है। क्षमा; मुदिता और बुद्धि ये सब मनके परिघार हैं ।
आातपश्च चौपाई छ तोष सरुत तब छसमा जुड़ाबे ।
धृति सम जाँवन देइ जमाबै ॥१०॥
अर्थ-प्षमा-तोष रूपी वायुसे उसे ठण्डा करे । तब चैयका सम जॉवन देकर ( दही ) जमावे ।
तोष मरुत-तृषा शानन््त करनेवाले गुणकों तोष कहते हैँ। तोषकी उपमा मझत् (हवा ) से दी गयी है। हवासे गर्मी झान्त होती है, दूध ठंडा होता है | परम धर्ममय पयका कामांश तो दूर हुआ, पर ऐसा करनेसे वह सनन््तप्त हों उठा; उस सस्तापकों दूर करनेके लिये तोषकी आवश्यकता हुई | भाव यह कि--
सर्वे च सुखिनः सन्तु सर्चे सन््तु निरामयाः |
ऐसी धारणा अग्ल होनेपर भी कामसे भय रहता है; क्योंकि वह क्रोध उत्तन्न कराके हिंसा करा देता है। कामका विरह हुआ, कामके विरहसे सन्ताप हुआ अतएव उस सनन््तापकों तोषसे दूर करे | जो अहिंसामें प्रतिष्ठित हो गया है उसके लिये आत्मघातक (जिससे आत्माका आवरण बढ़े ) दोषोंका दूर करना परम कततंच्य है | छमा जुड़ावै-दूसरेके अपराधसे मी न सन्तस होनेवाली क्षमामें ही कासके विरहसे उत्पन्न ध्मके सन््तापकों दूर कर सकनेकी शक्ति है अतएव क्षमा ही उसे तोषकी वायुसे शीतल करे | दूसरी बात यह है कि तोषके प्रास करनेमें क्षमा ही समर्थ है। अतः वही सन्तप्त परम घर्ममय पयकों शीतल करे | यथा-- त्रिबिध पाप संभव जो तापा। मिट॒ट्ट दोष दुख दुसह कछापा ॥ परम सांत सुख रहे समाई । तहँ उत्पात न ओेदै आई।॥ तुलसी ऐसे सीतछ संता सदा रहहिं एड्टि भाँति एकन्ता॥
(् चै० स०)
५ शानदीपक
ठंडा करनेका दूसरा यह भाव भी है कि साधकको व्यर्थ काल बिताना उचित नहीं; अनायास भी दूध धीरे-धीरे ठंडा हो जाता है; पर उसमें देर लगेगी, अत्णव तोषरूपी शीतल वायुसे उसे क्षमाह्दारा शीतल करनेका उद्योग करे |
घृति सम जॉवन--ध्रति अर्थात् धैर्य, ऋतकार्य होनेका प्रधान साधन है, यथा--“घीरज घरइ सो उतरे पारा? (सम से भाव यह कि समतावाला पैय॑ होना चाहिये, विषमतावाछा नहीं । इसीकों जाँवन बनावे | जाँचन दहीकी उस मात्राकों कहते हैँ जिसे दूधमें डालकर दहो जमाया जाता है। खाई आदिसे भी दही जमता है पर चह अच्छा नहीं होता । अथवा सम जॉवनसे यह तात्पय दै कि जितना उचित हो उतना ही जाँवन दे, क्योंकि उचित मात्रासे कमम दही नहीं जमेगा, और अधिक होनेसे वह पानी छोड़ देगा । अतएवं जितने पघेर्यकी आवश्यकता हो उतनेद्दीसे काम छे, धैर्य कहीं हठमें परिणत न हो जाय ।
देइ जमाबै--जॉवन देकर जमा दे | अर्थात् जाँवन डालकर उसे उतना समय दे, जितनेम जॉवनका प्रभाव सम्पूर्ण दूधपर पड़े और यह जमकर एक थका द्वो जाय | दूधके जमानेमें जाॉवनके लिये दूसरे दहीकी आवश्यकता पड़ती है, और उस दूसरेके लिये तीसरेकी | इस भाँति यहाँ अनादिकालसे साधनपरम्परा दिखलछायी है। यह नहीं समझना चाहिये कि ऐसा उद्योग आजतक कभी नहीं किया गया | जीवकी स्थिति अनादि कालसे है ओर उसका उद्योग बराबर जारी है। न जाने कितनी वार दही जमा, पर काम पूरा चौकस न उतरा | इस बार भी दद्दी जमकर तैयार हुआ । जिस प्रकार हरे तृणका परिणाम बूध एक वूसरी वस्तु तैयार हुई; इसी भाँति दूधका परिणाम दही एक बिल्कुल तीसरी वस्तु है| इसमें दया, निष्कामता, तोप और घेय॑ चार्रोका सेल है | क्षमाका कार्य समाप्त होते ही मुदिता अपने-आप उपस्थित हो जाती है | इसी प्रकार अन्य पात्र भी आते जायेंगे ।
इातपश्च चौपाई दे मुदिता सथे बिचार मथानी। दम अधार रज़ु सत्य छुबानी ॥
अर्थ-मुद्ति विचारकी मथानीसे, जिसका दम आधार और सत्य खुवानी डोरी हो, दह्दीको मथे ।
मुद्दिता मणै--दहीको मुदिता अर्थात् दूसरेके सुखरमें आनन्दित होनेवाला गुण भथे। यहाँ मथना विचार करना है। विचारमें मुदिताकी बढ़ी आवश्यकता है ।
विचार मथानी-विचारकी मथानीसे मुदिता मथे | धर्मको
सदासे कामके साथका संस्कार है | धर्मके साथसे काम हटा दिया गया, पैसे मैत्नी करायी गयी; पर अब भी उसमें ( दुःखके बीज ) कामका संस्कार शेष है, उसी संस्कारकों तोंड़नेके छिये उस दहीके थक््केकी विचार ( वस्तु-विचार ) से मथे ।
दम अधार-दम# अथोत् इन्द्रियदू्मन, उस बस्घु-विचारका आधार होगा; मथानीका फछ होगा | उसकी चोंटसे यह जमा हुआ दहीका थक्का छिन्न-मिन्न होकर रवा-रवा हो जायगा ।
रज़ु सत्य खुबानी-सत्य सुबानी अर्थात् हितकर सत्यवाणी (गुरु तथा शाज्रकी ) उस विचार-मथानीकी डोरी होगी ) उसकी खींचके अनुसार जब वस्तु-विचार-दण्ड अपने फलके साथ घूमेगा; अथात् शास्त्रभयोदाके भीतर तक होगा; तब दही मधित होकर नवनीत ( मक्खन ) प्रसव कर सकेगा । विचारका दिग्दशंस--यथा--
जिय जबते हरिते बिछगान्यौ। तबते देह गेह निज सान्यो |
मसायावस॒सरूप विसरायो। तेह्ि श्रमते दारुन दुख पायो 0
# यह पद सम्पत्तियोंमैंसे दूसरा है ।
3
क्षानदीपक
पायो जो दारुन दुस॒ह हुख सुखलेस सपनेहु नहिं मिलयोौ। भय सूल सोक जनेक जेद्दि तेद्टि पंथ तू. इठि ह॒ढि चलल््यो ॥ बहु जोनि जन्म जरा ब्रिपति सतिसंद हरि जान्यो नहीं। श्रीरास विन्नु विश्राम मूढ़ विचारि छखु पायो नहीं॥ झआरनेंद-सिंधु मध्य तव धासा | बिलु जाने कस मरसि पियासा ॥ रूग-अ्रम बारि सत्य जल जानो | तहेँ तू सगन सयठ सुख मानी ॥ तहँ समगन मज़सि पान करि न्रयकाल जल नाहीं जहाँ । निज सदज अनुभव रूप तव खलु भूलि जनु कायो तहाँ॥ए निर्मठ निरंजन निर्चिकार उदार सुख ते परिहरपो। निईकाज राज बिहाह नूप हव स्वप्न-काराशणुदह परपों॥त हैं निजकरम छोरि दठ कौन्दं। अपने करन्ह गाँठि हृढि दीन्हों 0 छेहिते परवस परपी छमाणे १ रा फऊः शर्भवास दछुसक आएो ५ आगे अनेक समूह संसृति उदरगत जान्यों सोऊ। सिर हऐैेठ ऊपर चरन संकट बात नहिं पूछे कोऊ॥ सोनित पुरराप जो मूत्र मर कृमि कदंसाइत सेवद्दीं। कोसऊ सरीर गरभीर बेदन सीस धघुमि धुनि रोवहीं ४ प्रेरेठ जो परम पचंड भारुत कष्ट नाना तें सथ्ो। सो ज्ञान ध्यान विराम जनुभव जातना पावक दो ॥ अति खेद प्याकुछ अल्पवरू छिन एक बोल न आवई ॥ तब तीम्र कष्ट न जान कोड सबलोग हरपित गावई ॥ बालरूद्सा जेते छुस् पाये। अति असीम नहिं जाहेँ ग्रिनाये # छुथा व्याधि बाघा भट्ट भारी । चेदन नहिं जाने महतारी॥ जननी न जाने पीर तथ केहि हेतु सिखु रोदन करे। सो करे विविध उपाय जाते अधिक तुच छाती जरे ॥ कौसार सैंसव अरु किसोर अपार अघ को कहि सके । वितरेक तोहि निर्देय महाखल आन कहु को सहि सके ॥
शतपञ् चौपाई 3८
जोयन झुवत्ति संग रंग रात्यी। तब तू महामोदद मद सात्यों ॥ ताते तजी धर्म-मरजादा । बिसरे तय सथ प्रथम बिपादा ॥ बिसरे बिपाद निकाय संकट समुझि नहिं फादत हियो | फिरि गर्भगत जावर्त संचतिचक्र जेहि द्वोष्ट सौदद कियो ॥ कृमि भस्त्र बिट परिणाम तनु तेहि छाम्रि जय यैरी भयो परदार परधन द्रोहपर संसार वादे नित नयो॥ देखत ही जाई घिरधाई | जो तें सपनेहु नाहिं घोछाई ॥ ताके भुन कछु कद्दे न जाहीं । सो अब श्रगट देखु जगमाहों॥ सो प्रगट तनु जजर जराबस व्याधि-सूछ सतावई ॥ सिर कंप इंद्धिय सक्ति अतिदत बचन काहु न भावई ॥ गरृहपालहूते अति निरादर खानपान ने पावई ॥ ऐसिठ दसा न बिराग तहेँ तुस्रात्तरंग बढ़ावई॥ को कह्लि सके महाभव त्तेरे। जन्म पुकके कछुक गनेरे॥, ख़ानि चारि संत्तत जवगाहीं । जजहुँ न कर विचार मन माही ॥ एट्टि तजुकर फल विषय न भाई | स्वर्गहु स्वल्प अंत छुखदाई ॥ नरतज्नु पाए विपय सन देहाँ। पलटि सुधा ते सठ बिप लेही ॥ सुर-नर-सुनिकर याही रीती | स्वारथ छामि करहिं सब पीती ॥ जेहिते कछु निज स्वारथ होई । तेद्ठि पर ममता कर सब कोई ॥ जग अनभलरू भर एक गोसाएँ । इत्यादि ।
सव कार्य श्रद्धासे छेकर ग्रन्थि-मेदतक विधिके अनुसार होने चाहिये; अविधि होनेसे वह असुरोंका भाग हों जायगा |
तब सथि काढ़ि लेइ नवनीता । बिसल बिराग खुमग सुपुनीता॥ २० ॥
जर्थे पे के थ-तवब दद्दी मथकर झुन्द्र पवित्र विरागरूपी मक्खन निकाल ले |
९, जशानदीपक
लवब भधि-इस प्रकार विचार-मथानीद्वारा मथनेसे काम-संस्कार दृट जायगा और उसके टूटते ही नरिवर्ग वा घडविकारकी जो कुछ वासना परम धर्मके सारकों ढके हुए. थी, छिन्न-मिन्न होकर अछग हो जायगी और नवनीत ( विराग ) प्रकट हो जायगा | काढ़ि छेह नचनीता-तव नवनीतकों उस तक़से अछय निकाछ ले | अबतक सव काय॑ विश्वासरूपी पाचमें ही होता आया। उसीमें दूध दुह्य गया, औंदाया गया, ठंडा किया गया; जमाया गया और सथा गया | अब मक्खन निकल आया तो उसे (विश्वास ) पाचसे अछग कर लिया गया । भाव यह कि विरागका केवऊ विश्वास होनेसे काम नहीं चलेगा | विमल विराग-वह मक्खन विमर विराग है, यथा-- भूपन बसन भोग सुख भूरी । सव तन बचन तजे तन तूरी ॥ अवधराज सुरराज सिहाई। दसरथ घन खुनि धनद लजाई ॥ तेष्टि पुर वसत भरत विनु रागा | चंचरीक जिमि चंपक बागा॥ए विराम साधन-चत॒ष्टयमेंसे दूसरा साधन है | खुभग खुपुनीता-मक्खन झुन्दर हे और भलीमाँति पवित्र है। वूध-्सा सुमग है; पर दूध पुनीत था यह सुपुनीत है। अब साधन-चव॒ष्टयक्रे प्रूण होनेमें केवठ समाधानकी चुटि है। अतएब--
दो०-जोग अगिनि तन प्रगट करि कम सुमासुम छाइ।
बुद्धि सिरावे ज्ञानघुत ममता मरू जरि जाइ ॥
अर्थे-शुभाशुम कर्मकों छगाकर दारीरमें योगाझि प्रकट करके वुद्धि-जशान-घुतको तैयार करे, जिसमें ममतारूपी मर
जरू जाय]
शतपश्च चौपाई ८०
जोग अगिनि-जब विराग उत्पन्न हुआ तब योगका अधिकार भी हो गया। चित्तव्ृत्तिका निरोध करके सत् छक्ष्यमें एकाप्र होना योग है और वह अभ्यास तथा वैराग्यसे छोता है । बेराग्यद्वारा चित्तव्ृत्तिनिरोध कहनेसे ही यह बात आ गयी कि वैराग्यका निवास चित्तवृत्तिमें हुआ ।
तन प्रमट करि-योगामिको प्राण-अपानके संघर्षणसे झरीरमें प्रकठकरके अर्थात् हृठयोग करके जिसमें मनकी गतिकी भाँति देहकी क्रिया श्वास-प्रश्यासादि रक जाय | मनके रोकनेसे वायु रुकता है और चायुके रोकनेसे मन रुकता है। यथा--
जिति पवन मन गो निरस करि झुनि ध्यान कबहुँक पावहीं |
अतः राज; हठ दोनों योग युगपत् होने चाहिये) इससे समाधान कहा । अब साघन-चट॒ष्टवके पूरा होनेसे साधक तत्वज्ञानका अधिकारी हुआ । ऐसे अधिकारीके लिये ही “तत्वमसि? महावाक्यका उपदेश है यथा--- ह सोद्धि पर्स अधिकारी जानी। छागे करन श्द्म उपदेसा | अज सद्दैत अगुन हृदयेसा॥ा सो छें (तरचम )तोहि ताहि नहिं सेदा ।(असि)वारि वीचि इच गावद्िं बैदा ॥ कमे छुमासखुभ लाइ-अग्रिको स्थिर रखनेके लिये इंघन चाहिये। अतः शु॒भाशुभ कमको रूगाकर अम्नि जलावे | योगसे परोक्षशान होता है। यथा-- घरम ते बिरति जोग ते प्वाना।
४ और परोक्षज्ञानसे बुद्धिपूर्वक किया हुआ पाप नष्ट होता है | योगीका कर्म अश्क्लाकृष्ण होता है, पाप-पुण्यसे रहित होता है, अतः सशखित आगामी कि किक ४-५2 03424 0-00 3५ 40022
# चित्तकी एकाय्रताको समाधान कहते हैं, यद्द साधन सम्पत्तियोंमें छठी सम्पत्ति है|
<१ छानदीपक
यावत् झभाशुम कर्माकों नष्ट करती हुई योगापि प्रकट होती है, केवछ आरूध बच रहता है | यथा-- कद भुनीस द्विमवंत सुचु जो विधि लिखा लिलार | देव दनुज नर नाग स्॒ुन्नि कीड न मेटनहार॥
चुद्धि सिरावे-घुद्धि मक्खनको पिघलानै, अर्थात् वैराग्यसे और सत् लक्ष्यपर चित्तके स्थिर करनेके अभ्याससे चित्तद्नत्तिका निरोध करे | मक्खन निकालनेतक मुदिताका काम था; अब गरम करना बुद्धिका काम है| घी कच्चा रह गया) ममता कुछ शेष रह गयी, तो ज्ञानदीपके जलनेमें कठिनता होगी और जों खर हो गया; तो योगशाज्रोक्त असंप्रशात समाधि हो जायगी । आगेकी सब्र क्रिया रुक जायगी । मसल है कि धी जलकर तेल होता है | असंप्रज्ञात समाधि तो हुईं, पर ज्ञान न हुआ |
शानघृत-यदि घुद्धि ठीक तरहसे पका सकी; तो ज्ञान-छत तैयार हो जायगा | यह “तत्! पदका ज्ञान परोक्षक्षान है, यथा--
तव प्रसाद सब संसय गयऊ । रास सरूप जानि मोहि परेऊ ॥
ममता मछ् जरि जाइ-भाव यह कि विरागमें यह धारणा रही कि ये सब विधय-विलास मेरे वश हूँ, में इनके वदामें नहीं हूँ । अतः उसमें ममता-मल रहा । वह ममता योगामिसे जलती है । इस प्रकार 'तत् पदुका शोघन हुआ । ज्षानदीपकर्म योगशास््रातुमोदित असंप्रज्ञात समाधिका उपयोग नहीं है, क्योंकि सम्पूर्ण इत्तियोंका निरोध न मानकर, शानी लोग ब्रह्माकारजृत्तिकों असंप्रशात समाधि मानते हैं, और कारण यह देते हैं कि योगवाली असंप्रशात समाधिसे छौटनेपर, संसार ज्यो-का- स्यों छौट आता है, ज्ञान कुछ भी नहीं होता । यहाँतक बुद्धिका कार्य समास हुआ ।
दो०-तब बिज्ञानरूपिनी बुद्धि बिसद घृत पाय ।
चित्त दिया भरि धरे दृढ़ समता दियट बनाय ॥ हे |
दातपशथ्च चौपाई ८
अर्थ-तवब विज्ञानरूपिणी बुद्धि खच्छ घी पाकर चित्त- रूपी दीयामें भरे, और समताकी दीवट चनाकर उसपर डइढ़ करके रक्खे ।
तब विज्ञानरुपिनी चुद्धि-अब गुरुसे उपदिष्ट 'सो तें तोहि ताहि
नहिं भेदाः (तत्वमसि ) महावाक्यसे उत्पन्न विशञान जिसका रूप है, ऐसी बुद्धिका कार्य आरम्भ होता है। अर्थात् गुरु-वेदान्त-वाक्यसे जो ब्रह्मात्मेक्थका अनुभव होता है, उसे विज्ञानरूपिणी बुद्धि कहते हैं |
विखद् छुत पाय-उपयुक्त निर्मल घी ( परोक्षश्ञान) को जब विज्ञानरूपिणी बुद्धि पावे, तब--
चित्त दिया भरि घरे हढ़-चित्तके दीपकममें भरकर दृढ़ रक्खे | भाव यह कि “ब्रह्म समान सब्र माहीं' यह भाव हृढ़रूपेण चित्तमें जमा रहे ।
समता द्यिट वनाय-और समताकों दीपक बनाकर उसपर शानघृत मरे हुए, दीपकको स्थापित करे, जिसमें दीपकके टेढ़े हो जानेसे छत गिर न जाय | भाव यह कि चित्तमें वैधम्य न होने पावे; नहीं तो ज्ञान नष्ट हो जायगा | यथा--
ज्ञान मान जहँ एकौ नाहीं। देखिय अह्य समान सबसाहीं ॥?
यह बाह्य समाधि हुई ।
इस ग्रकार ज्ञान-घृत तैयार हुआ, उसे दीयेमें भरकर सुरक्षित खानमें रख दिया गया, ठब्र साधककी साध्ठु पदवी होती है, यथा---
चंदी संत समान चित हित अनहित नहिं कोड । अंजलिगत सुभ सुमन जिसि सम सुगंध कर दोड ॥ ऐसे ही साधु मद्ापुरुषोंकी कपाससे उपसा दी गयी है। साधुका
चरित्र कपासका चरित्र कह्य गया है, मीरस, विद्यद और शुणमय करके उसके फकछका वर्णन किया गया है, यथा--
साधु चरित्र सु चरित कपासू। निरस बिसद गुनसय फल जासू॥
€३ जानदीपक
अपना कार्य जिससे हो उसे फल कहा गया है। जैसे तलवारका फछ, वरछेका फल, वृक्षका फल | इसी प्रकार कर्मका फल देह है । साधुका दरीर विषयरसरूखा होनेसे नीरस कहा गया और पुनीत होनेसे विशद कहा गया । ऐसी ही देहसे तीनों शरीरोंका प्थक् करना; ठुरीयाकी प्राप्ति आदि, जिसका वर्णन पीछे किया जायगा, सम्मव है, दूसरेसे नहीं । दूसरोंके तीनों शरीर सरस होनेसे, मलिन और दोषयुक्त होनेसे एक दूसरेम ऐसे सने होते हूँ कि उसको पार्थक्यका अनुभव नहीं हो सकता | यथा--- काम क्रोध मद छोमरत ग्रुहासक्त दुखरूप। ते किमि जानहिं रघुपतिहि मृढ़ परे तम-कृप॥
दो०-तीनि अवस्था तीनि ग़ुन तेहि कपासते काढ़ि । तूल तुरीय सेंबारि पुनि बाती करिय सुगाढ़ि ॥
अर्थ-उस कपाससे तीन अवस्था और उसमेंसे तीन शु्णोंकों निकालकर, सुरीयरूपी रूईकों सँवारकर, अच्छी मोटी बत्ती चनावे ।
तेहि कपासते-अर्थात् उस कपाससे | कपासकी उपमा देहसे दी गयी है | जिस प्रकार कपासमें तीन कोष ( खाने ) होते हैं, उसी प्रकार देहमें तीन शरीर होते हैं--स्थूछ, सूक्ष्म ओर कारण | पाश्चमौतिक देहको स्थूछ शरीर कहते हैं । पश्चज्ञानेन्द्रिय--श्रोत्र, चक्षु, त्वक्, जिहा और घाण, तथा पशञ्चकर्मेन्द्रिय---वाक + पाणि; पाद, पायु और उपस्थ तथा पश्चप्राण--प्राण; अपान; समान) उदान और व्यान तथा बुद्धि और मन; इन सत्रहके समूहकों सूक्ष्म शरीर कहते हैं। इन दोनोका कारण आत्माका अज्ञान है, जो आत्माके आमभाससे युक्त होकर 'कारण- शरीर” कहलाता है ।
शतपश्त चौपाई ८8
तीनि अवस्था तीनि झ़ुन-जाग्त्; खप्त और सुषु्ति ये तीन अवस्थाएँ हैं | इन्द्रियोंसे विषयका ज्ञान जिस अवस्थामें होता है उसे जाम्मत् कहते हैँ । इन्द्रियोंके उपरत होनेपर जाग्मत् संस्कारजन्थ संविषय ज्ञानकों स्प्त कहते हैं और जिस समय किसी प्रकारका ज्ञान नहीं होता, बुद्धि कारण-शरीरमें जाकर ठददरती है उसे सुपुप्ति अबस्था कद्दते हैं । यथा--
ततेरेसि तीनि अवस्था तजहु भजहु भगवंत्त । (विनय० )
सत्त्त; रज, तम ये तीन शुण हैं । जाग्रत् सच्त्यप्रधान है; खभ रजभ्रघान है और सुषुति तमश्प्रधान । ये ह्वी तीनों अवस्थाएँ कपासके तीनों कोर्षोकी तीन ढेढ़ियाँ हैं और सत्त्व, रज, तम उनके क्रमसे ब्रीज (बिनौले) हैं । कपासके प्रत्येक कोषमें विनौंलेसे लिपटी हुईं रूई होती है उसे ढेढ़ी कहते हैं ।
काढ़ि-निकालटकर। भाव यह कि वैराग्य उत्पन्न होते ही
साधु तीनों शुणोंकों त्यागना चाहता है। उसकी विधि यह है कि
स्थूठल. शरीरसे ढेढ़ीरूपी जाग्रतू अवस्थाकों अलग करके
उससेंसे बिनौलारूप सत्व अथात् वैधयिक शानको दूर करे | सूक्ष्मकी
अवस्था स्मप्ममेंसे उसी वैषयिक ज्ञानके संस्कारकों दूर करे। कारण
शरयरकी सुषुप्ति अवख्थामेंस आत्माके अज्ञानकों दूर करे | ये सब क्रियाएं मनसे होती हैं | अतएव राजयोगक्रे अन्तर्गत हैं। यथा-- कहिय तात सो परम बिरागी | तून सम सिद्धि सीन ग़ुत्त त्यागी ॥ यह परम विराग ज्ञानरूप ही है। यह इश्यानुविद्ध समाधि हुईं ।
तूल तुरीय सँवारि पुनि-जब तीनों अवस्थाओंमेंसे तीनों शुण
निकल गये; ढेढ़ीमेंसे त्रिनौले बाइर निकाल लिये गये, ओंटनेका काम
समास हुआ तब केवल रूई बच गयी वहीं तुरीयावस्ा है । उसे भी
सवार ले अर्थात् ठुनकर उसमेंसे कोषोके संस्कारकों दूर करे। इस प्रकार लि? पदका शोधन हुआ |
<्ज् झानदीपक
वाती करिय खझखुगाढ़ि-खूब मोटी बत्ती बनावे। अर्थात् तुरीया- वस्थाके संस्कारोंकों मढीमौँति घनीभूत करे, जिसमें सब मिलकर एक हो जाये ।
सो०-एहि बिधि लेसे दीप तेजरासि बिज्ञानमय । जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलूम सब
अर्य-इस प्रकारसे तेजराशि विज्ञानमय दीपक जछाचे, जिसके समीप जानेसे मदादि सब पतंग जरू जायें।
एहि विधि-इस विधानसे अर्थात् जो विधान ऊपर कह आये हैं। प्रकाशके और भी बहुत उपाय हैं | तेलके दीयेसे भी प्रकाश होता है, विद्युत्से भी प्रकाश होता है, परन्तु अन्य उपायोंसे आत्मानुमव- झुखका प्रकाश न होगा । शासत्रकी विधिका त्याग करनेसे कदापि कल्याण नहीं हो सकता । ग्रन्थि छूटनेके पहले ठीक-ठीक विधिनिषेधके अनुसार बरतना होगा, अतएव जो विधान कहा गया है उसीके अनुसार करे यह नहीं कि दूधकों ही मथकर मक्खन निकाछ ले अथवा घीका काम तेलसे ही ले ले ।
लेसे दीप-अर्थात् उस बत्तीको घीके दीपमें छोड़ दे जिसमें बत्ती छघीसे मींग जाय तब उसे योगामिसे लेस दे । भाव यह कि ठुरीयाको परोंध्ष शानमें डुबा दे | “त्वं! पदके रूक्ष्याथंकों 'तत्? पदके लक्ष्यार्थमं लीनकर सानन्द समाधिमें स्थित हों। इसे शब्दानुचिद्ध समाधि कहते हैं ।
तेजरासखि विज्ञानमय-इस प्रकार विधिसे जलाया हुआ दीप तेजोमय होता है | उसे विज्ञानमय इसलिये कहते हैं कि उससे अपरोक्ष ज्ञान होता है, यथा-- दुलेम बरह्मलीन बिज्ञानी |
शतपज्च चौपाई <द
मदादिक सलूभ सब-जहाँ दीया जछा कि शलभ अर्थात् पतञ्ञ चले | झण्ड-के-झुण्ड कभी-कभी दीयेपर टूट पड़ते हैं, खय॑ जछते जाते हैं, पर यदि दीया छुवंल हो तो उसे चुझाकर ही छोड़ते हैं । मद, मात्सतय आदि शल्भ हैं । शल्म इसल्यि कहा कि मायाका परिवार बहुत बड़ा है। यथा--
यह सब साथा कर परिवारा | प्रवकू अमित को वरने पारए ॥
जातहिं जाखु समीप जरदि-भाव यह कि इतने प्रवल होनेपर भी उस दीयेतक नहीं पहुँचने पाते, समीप आते ही नष्ट हो जाते हैं। अर्थात् मदादिकी इस शब्दानुविद्ध समाधितक गति नहीं है । इससे तेजोराशि विजश्ञानमयका साफल्य दिखलाया |
की ७ 'सोहमस्मि' इति बृत्ति अखंडा। दीपसिखा सोड़ परम प्रचंडा॥
अर्थ-चह मैं हैँ” ऐसी अखण्ड चृचि ही उस दीयेकी परम प्रचण्ड शिखा है ।
सोहमस्सि-माव यह कि “सो तें तोहि ताहि नहिं भेदा? इस मह्यवाक्यके अवण-मननके पश्चात् “वह मैं हूं? इसी रूपमें निदिध्यासन होता है ।
इति वृत्ति अखंडा-“वह मैं हूँ? यह इत्ति बराबर वनी रहे, विक्षेप न होने पावे | भाव यह कि समाधिमें निर्वात दीपकी भाँति अचल एकरस चित्त बना रहे |
दीपसिखा सोह परम प्रचंडा-यही जपरोश्ष शानब्ृत्ति दीपकी परम अचण्ड ली है। सायाकी सेना पचण्ड है, यथा---
ज्यादि रझो संसारमहँ भाया कटक प्रचंड |
उसके भस्म करनेके लिये परम प्रचण्ड अमिकी आवश्यकता है, अतः यह दीपशिखा परम प्रचण्ड है ।
<छ शानदीपक
आतम-अनुभव सुख सुप्रकासा |
तब भव मूल भेद अ्रमनासा ॥श्शा
अर्थ-आत्म-अनुभव-छुख उस दीयेका प्रकाश है, तव संसारके मूल भ्रममेद्का नाश दोता दे । आतम-सजुभव झखुख-इस सुखसे बढ़कर कोई सुख नहीं है। क्योंकि इत्तिजन्य अपरोक्ष ज्ञान भी आत्मानुभव सुखरूप ही है। यथा-- जेद्दि अनुभव बिन्ु सोहजनित दारुन भव ब्रिपति सत्तावे ॥ मह्म पियूप सधुर सोत्ततक सन जोपे सो रस पथ । तो कत भुगजलरूप विषय कारन निसिवासर घावे ॥
झखुप्रकाला-जब दीप हुआ तो उसका अच्छा प्रकाश भी चाहिये, सो आत्मानुमवसुख ही सुप्रकाश दे । भाव यह कि ब्र्माकारबत्ति करके समाधिर्म स्थित होनेसे अपरोक्ष शानकी अखण्ठ चृत्ति होती है और उससे आत्मानुभवसुख द्वोता है, और जब आत्मानुभवसुख होता है; तब--भव मूल भेद श्रमनासा । भेद श्रम-कहनेका भाव यह कि वस्त॒तः ब्रह्म-जीवमें अभेद है । भेदभाव केवल भ्रम है, यथा-- निज अमते संभव रबतिकर सागर अति भय उपजावे ॥ अवगाहत बोधित नौका चढ़ि कबत्रहँ पार न पाये ॥ चुलसिदास जग आपु सहित जब छगि निर्मछ न जाई। तब छूबगि कफोदि कऊूप उपाय करि भरिय तरिय नहिं भाई ॥ भेद न होनेपर भी भेदका भ्रम होता है, यथा-- चितव जो लोचन अंशुलि छाये | प्रगट ज़ुगल सस्ि तेहिके भाये ॥ “और भेदकश्षमसे खरूपका विस्मरण होता है, यथा--
दातपथ्च चौपाई ८८
सायावस सझूप चिसराये | तेट्टि अमते दारुन दुख पाये॥ पायो जो दारुन घुसह दुख खुखलछेस सपनेहु नहिं मिल्यों। सव-सूल सोक अनेक" ' ** * *****००००*०*०*००५०*००+०*००*०*०**“*** ॥ भव सूछ-अर्थात् यह भेदअ्रम ही संसारका मूल है, और जिसका मूल भ्रम है वह पदार्थ वस्तुतः नहीं होता । यथा--- जग नभवाटिका रही हैं फलि फूलि रे। धुवों केसो धोरहर देखि तू न भूछि रे ॥ नास(-भाव यह कि मूल नष्ट दोते ही वस्तु छिन्ममूठ होकर गिर जाती है; पर जिसका मूल भ्रम है उस वस्त॒का तो भ्रमके नष्ट होनेपर पता भी नहीं चछता | यथा--- जब हरि माया दूरि निवारी । नहिं तहँ रमा न राजकुमारी ॥
प्रबक्ष अबियया कर परिवारा ।
मोह आदि तम मिट॒हिं अपारा ॥
जरथे-अविद्याके प्रवक् परिवार मोह आदि अपार तम मिठ जाते हैं। अविद्या परिवारा-अविद्याके परिवार अरथात् अविद्याके बाल- बच्चे, यथा--- मोह न अंध कीन्ह केहि केही । को जग काम नचाव न जेंही ॥ तुर्तर/ केहि न कीन््ह बौराह्य | केट्टिकर हृदय क्रोध नहिं दाहा ॥ ज्ञानी तापस सूर कबि कोबिद गन झागार । केहिके लोभ बविडंबना कीन्द्र न एह्टि संसार ॥ श्रीसद चक्र न कीन्ह केहि अभ्रुवा बधिर न काहददि । रूगनयनीके नेन-सर, को अझअस छाग न जाहि ॥ गुनकृत सन्निपात नहिं केह्दी । कोड न मान मद स्ञेउ निवेही 0
< जानदीपक
जोबन ज्वर केष्टि नष्टिं चछकावा। समता केहिकर जस न नसावा ॥ मत्सर काहि कलंक न छावा | काहि न सोक-समीर ठोलावा ॥ चिंता सॉपिनि काद्दि न खाया | को जग जाहि न व्यापी साया ॥ कीट मनोरथ दारू सरीरा। जेंहि न छाग घुन को अस घीरा ॥ सुत बवित नारि ईपना तौनी | केष्टिकर मति इन कृत न सछीनी ॥ यह सत्र साया कर परिवारा | प्रबल अमित को यरने पारा ॥ प्रवलू-अर्थात् बढ़े बलवान । यथा--- सिध चततुरानन जाष्टि त्राष्ट्री । अपर जीव केद्दि लछेखे माही ॥ भोद्ध आदि तम अपारा-भाव यह कि अविद्यानरत्रिमं मोहादि अन्धकार हैं, वया-- भसदामोह तम-पुंज! मिठ्हिं-अर्थात् आत्मानमवसुख-प्रकाशसे द्वी यह अपार अन्धकार मिठता है। यया-- सयउ अकास कतहुँ तम नाहीं । ज्ञान उदय जिमि संसय जाही ॥
तब सोइ बुद्धि पाइ डँजियारा। उर गृह बेठि ग्रंथि निरुआरा ॥१२॥ अर्थ-तव चह्दी चिज्ञानरूपिणी बुद्धि हृद्यरूपी घरमे चैंठकर गाँठ छोड़ती है । तब-अर्थात् मोद्दादि तम मिटनेके बाद ।
सोद चुद्धि-अर्थात् वही विशानरूपिणी बुद्धि, जिसने ज्ञानश्वतको चित्तरूपी दीपकर्मे भरकर समतारूपी दीवटपर स्थापित किया था, जिसने कपाससे रूई निकालकर बत्ती बनायी और दीपक जलाया था |
पाइ उँजियारा-भाव यद्द कि उपयुक्त सत्र कार्य अधेरेंम हुए; केचल पहले थोड़ा-वहुत डँजियाला अकाम अप्निका दूधके औदनेतक;
दातपञ्च चौपाई ९७
और बाद उसके योगाप्िका दीया जलनेतक स्थूछ कार्य करनेयोग्य था। उनसे सोहादि तम मिट नहीं सकते थे; अब परम प्रचण्ड शिखाका प्रकाश ऐसा हुआ कि मोह आदि तस मिट गये, और सन्थि सूझ पड़ने लगी।
उर गृह बैठि-भाव यह कि पहले वह बुद्धि दीवट छामे; दौया रखने, कपास ओटने, ठुनने, बत्ती बनाने और दीया जलछानेमें व्यस्त थी, कभी अन्तर कभी बाह्य संप्रज्ञात समाधि#में छगी थी, अब छृदयरूपी घरमें स्थित होकर बेटी |
अंथि निरुआरा-समाधिमें स्थिर होकर जड़-चेतनकी गाँठ खोलने लंगी !
गॉठ तीन प्रकारसे पड़ी हुई है-( १) प्रान्तिजन्य; ( २ ) सहज और ( ३ ) क्मजन्य । अहंकार ( कारण शरीर ) का जो कूटरथके साथ तादास्म्य है सो श्रान्तिजन्य है, चिच्छायासे जो तादात्म्य है सो सहज है और देहसे जो तादात्म्य है सो कर्मजन्य है। कर्मजन्य ग्रन्थि कर्मके नाझसे नष्ट होती है | कर्म तीन प्रकारका होता है-(१) जन्म-जन्मान्तर- का कर्मसमूह जिसे सश्ित कहते हैं, (२) जिन्हें वर्तमान जन्ममें भोगना है उन्हें भारन्ध कहते हैं और (३) जो वर्तमान जल््ममें करते हैं बह आगामी कहलाता है | सश्चित कर्म श्ञानीका नष्ट हो जाता है; आगामीसे उसका लेप ही नहीं होता, केवल प्रारब्ध शेष रह जाता है, यह जबतक शरीर है तबतक उसका भोग होगा ही । अतएवं कर्मज अस्थि बिना कमृक्षयके नहीं छूटती । जबतक भ्रान्तिजन्य और कर्मजन्य जृत्ति रहती है तबतक अन्थि नहीं छूट सकती, प्रतिविम्बके नाशसे नष्ट होती है! अत्व ज्ञान्विजन्य ग्रन्थिका सुलझाना ही परम पुरुषार्थ है|
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१ शानदीपक छोरन ग्रंथि पाव जो सोईं। तो यह जींब छृतारथ होई ॥
अर्थ-यदि चद्द चुद्धि, चिदू-जड़-अन्धि, छोड़ सके तो यह जीव छृतार्थ हो जाय ।
जौं-सन्देहसूचक है, भाव यद्द कि विश्नव्राहुल्यसे कार्य कठिन है ।
सोई अंधथि छोरन पाव-वही विज्ञानरूपिणों बुद्धि यदि भन्थि छोड़ने पावे | भाव यह कि उसके सुलझानेमें सन्देह नहीं, पर विश उसे ऐसा नहीं करने देंगे ।
तौ-अर्थात् विश्नोके अमिभूत होनेके बाद |
यह जीव-अर्थात् जो अपने ही घरमें अशानद्वारा बँधा-सा पड़ा है।
ऊतारथ होई-अहंकारके साथ तादात्म्य कर अपने खरूपकों विस्सरण करके अनादिकालसे जीब निद्वित पड़ा हुआ, संसारका खम्, जनन-मरण, सुख-दुःख, शत्रु-मिच्ादिका अनुभव कर रहा है। जिस प्रकार कोई राजा खम्ममें अपने कारागारमें बद्ध होनेका अनुभव कर रहा हो। अतः निर्विम्न असंग्रशात समाधिक्रे सिद्ध होनेसे, वह श्रान्तिजन्य अन्थि नष्ट हो जाती है एवं वह निद्रासे जाग पड़ता है । निद्रासे जाग जाना ही कृतकारय होना है।फिर तो इस कारागारकी एक ईंट भी कहीं खोजनेसे नहीं मिछती । सखाराज्यसुख तो उसका कहीं गया ही नहीं था; प्राप्त ही था। केवछ निद्रादोपसे अप्रात्त-सा हो रहा था; सो ग्राप्त हो जाता है । निदान, सहज खरूपकी प्राप्तिसे वह कृतार्थ हो जाता है | यथा--“जानत छुमहिं तुमहिं होइ जाई |!
छोरत ग्रैथि जानि खगराया। बिघन अनेक करे तब साया ॥२३॥
हशतपश्व चौपाई ९२
अर्थ-देे पक्षियाँके राजा ! गाँठके छोड़नेकी चात जानकर माया अनेक विश्न करती है।
खगराया-सम्बोधन है; भाव यह कि, आप राजा हैं, जानते हैं कि खतन्त्रता चाहनेवालेंका मार्ग कैसा कण्ट्काकीर्ण होता है ।
छोरत अंधि जानि-माया जब जान छेती है कि विज्ञानरूपिणी बुद्धि जड़-चेतनकी गाँठ छोड़ रही है, असंमशात समाधिमें छगी है; जीव हमारे फंदेसे निकला ही चाहता है ।
विघन अनेक करै-तब अनेक विश्न करती है; जिसमें ग्रन्थि न छूटने पावे और जीव सदा मेरे वशमें पड़ा रहे | दु्शेंका यह स्वभाव ही है कि वे दूसरेका भला नहीं देख सकते । आत्मानुभव-प्रकाशसे मायाका दिव्य- रूप दिखायी पड़ता है | इसके पहले तो इसका परिच्छिन्न स्थूल रूपमात्र दिखायी पड़ता था | इस रूपकी ओर ध्यान न देकर असंप्रशातमें
तन्मय हो जाना असम्भव हो उठता है। यथा--- एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा | जेहि बस जीव परा भवकूषा ॥
तव-अर्थांत् माया जब देख छेती है कि मोहादिका किया
कुछ भी न हुआ, दीपक जल गया और अब गाँठ छूट रही है ।
माया-यहाँ अविद्याका प्रदण है, क्योंकि विद्या तो छोड़नेवाली है | सिर बिरंचि कहँ मोहई को है बपुरा आान।
मैं जरू मोर तोर से साया। जेहि वस कौन्द्रैद जीव निकाया ॥ , गो गोचर जहँ रगि सन जाई । सो सब साया जानेहु भाई ॥ तेहि कर भेद सुनहु तुम सोझ | बिचया अपर अविद्या दोऊ॥ एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा | जेहि वस जोव परा भवकूपा ॥ एक रचइ जग शुन बस जाके। भ्रश्ञु भेरित नहिं निज बल ताके ॥ हरि सेचकहिं न व्यापि अविद्या | अम्लु प्रेरित तेद्दि ब्यापें विद्या 0
श्र जश्ञानदीपक
ऋद्धि सिद्धि प्रेरें बहु भाई। बुडिहिं लोभ दिखाबे आईं ॥ अर्थ-दे भाई | वहुत-सी ऋद्धि-सिद्धियोंकों प्रेरणा करती है, और आकर चुद्धिकों छलचाती दे । ऋद्धि सिद्धि-कद्धि अर्थात् ऐवर्य | सिद्धि अर्थात् अणिमा; गरिमा, रूघिसा; महिमा; प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व । ( १ ) अणिमा) यथा-- ससक समान रूप कपि घरीं । (२) महिमा; यथा-- अद्ृदास करि गरजा कपि बढ़ि छाग्रु अकास ॥ (३ ) गरिसा, यथा-- जेहि गिरि चरन देह हन्चुमंता । चछा सो गा पाताल तुर॑ता ॥ (४ ) रूघिमा। यथा-- देह विसारू परम हरुआई। (५ ) प्राप्ति, यथा-- भट्ट सद्दाय सारद मैं जाना ॥ ( ६ ) प्राकाम्य, यथा--- गरल सुधा रिएर करे मिताईं। गोपद सिंधु जनल सिंतलछाई ॥ (७ ) ईशित्व, यथा-- देखि प्रताप न कपि मन संका | ( ८ ) वशित्व; यथा-- हरि प्रेरित तेहि अवसर चलेउ मरुत उनचास | इत्यादि ।
बतपज्च चौपाई थ्छ
प्रेऱे बहु-माव यह कि ऋचद्धि-सिद्धि सायाकी प्रेरणासे उसकी सेवाके लिये अपने-आप उपस्थित होती हैं ।
साई-कहनेका माव यह कि हमछोंग सव बराबर हैँ । क्या राजा क्या रह; क्या पण्डित क्या मूढ़, माया किसीकों नहीं छोड़ती ।
चुद्धिद्चि-अर्थात् यही विज्ञानलूपिणी बुद्धि ही सब कुछ करनेवाली है, इसीको फसाना चाहिये ।
आई कोभ दि्खिावे-कोई उसे चुलाने नहीं जाता, खय॑ आकर बुद्धिकों छोम दिखाती हुईं मानो कहती हे कि क्या व्यर्थ काममें छूग रही हो ( यद्द साम है )) ऋद्धि-सिद्धि जो कुछ चाहो) मैं देनेको पैयार हूँ ( यह दान है ), जिसके हितके लिये ठुम सब करती हो, बह मुक्त होते ही तुम्हें भी त्याग देगा ( यह भेद है ) ।
कल बल छल करि जाइ समीपा । अंचछ बात बुझाबे दीपा॥२श॥। अर्थ-करू-वलछ-छलसे समीप ज्ञाकर; अद्धरकी हवासे दीपक चुझा देती है।
कछ वर छल करि-कछ अर्थात् कल्य ( उपाय ) से पहले
काम छेती है, साम, दास, भेदका अयोग करती है। जब इनसे काम
५८, ७ 8 [4 ५७. नहीं चलता तब बल अर्थात् दण्डका प्रयोग करती है, यहाँतक, माया- रानीकी नीति है, यथा---
सास दाम जरू दंड विभेदा। हूप उर बसहिं नाथ कह वेद
नोति घर्मके चरन सुद्दायें। नीतिसे है प है. होते देखती हक ठिसे [>प
हे जब नीतिसे कार्य सिद्ध होते नहीं देखती तब अनीतिसें भी काम
है । छल करती है।
जाइ समीपा-भाव यह कि मायाका विज्ञानरूपिणी बुडिसे प्रेम
५ घानदी पक
होनेका तो कोई क्रारण नहीं है, वद्ध किसी-न-किसी उपायसे बुद्धिके पास अपनी खार्य-सिद्धिके लिये पहुँचना चाहती है| अतः वहाँ पहुँचकर--- अंचल चात-भाव यह कि न्त्रियों अश्लकी हवासे दीया बुझाया करती हैँ । अतः माया भी समीप जानेपर बुद्धिकी कोई अपेक्षा न करके | अश्वल-वातसे अमायास ही दीप बुझा देतो है । बातका अर्थ यद्दाँ हवा हैं| हवाफा उपमेय विपव दे। अश्ललके विपयसे तात्पर्य मायारुपी नारीसे है। यथा-- सबते अति दारन छुसद सायारूपी नारि॥ 'देम्ि रूप मुनि बिरति बिप्तारी ।? कु बिधि सिरे कोन बिश्ि घाछा ॥ मोह आदि तो अविया-रानिक्के तम हूं, पर 'नारि निविड्ड रजनी अँधियारी” है । चुझ्ावे दीपा-बुछि जहाँ तनिक भी मायाके भुलावेमं आयी कि उसने अवसर पाकर शानदीपकको बुझाया | विशानरूपिणी बुद्धिका संसर्ग जहाँ मायासे हुआ कि वह अपने स्वरूपसे च्युत हुई, और ऐसा दोते दी सारी इमारत घराश्ायी हो जाती है । यथा-- सो एरि साया सब ग़नखानी | सोसा तासु कि जाइ् बखानी ॥ देखि रूप मुनि विरति बिसारी। बढ़ी बार छमि रहे निद्वारी॥ साया विवस भय मुनि सूठा | समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा ॥ मुनि अति बिकल मोह सत्ति नाठीं। सनि गिरि गयउ छूट जिसि गॉटी ॥ जब हरिमाया दूर निवारी | नए्ठगिं तईं रसा न राजकुसारी ॥
होइ बुद्धि जो परम सयानी ।
तेहि तन चितव न अनहित जानी ॥ अर्थ-जों बुद्धि परम सयानी हो तो मायाकों अनद्वित समझकर उसकी ओर इष्टिपात न करे ।
दतपश्च चौपाई हि
घुद्धि परम सयानी-अर्थात् विज्ञानरूपिणी बुद्धि तों सयानी होती है। जो अपनी छाम-हानि देख सके सो सयानी है, यथा-- कह राचन सुन सुखखि सयानी। संदोदरी आदि सब रानी ॥ तव अनुचरी करों पन भोरा | एक वार विलोकु सम ओरा ॥ अतः बुद्धि यदि केचछ सयानी होगी तो छोममें आ जायगी, और यदि परम सयानी ( धीरत्वसम्पन्ना ) होगी तो अपने स्वामी युरुषका लाभ देखेगी। यथा-- निज घरकी बर वात विलोकहु हो तुम परम सयानी॥ होइ जो-भाव यह कि साधारण नियम तो ऐसा ही है कि बुद्ध परम सयानी नहीं होती, मायाकी वा्तोंमें आ जाती है, और यदि हो तो वात दूसरी है । तेहि तन चितव न-भाव यह कि उस मायाकी ओर आँख उठाकर देखे ही नहीं, और न उसकी बात घने, अपने ग्रन्थि सुलझानेके काममें छगी रहे | जबतक विशामरूपिणी बुद्धि स्थिर है; तबतक मायाकी
भी सामर्थ्य नहीं कि उसके निकट जा सके, दीप बुझाना तो दूरकी बात है। यथा--
परमाश्थ खारथ सुख सारे । भरत न सपनेहु सनहु निहारे॥
अनदित जानी-अर्थात् बात हितकी-सी करती है; पर है वह
माया अहितकारिणी, वह स्वामीका अकल्याण चाहती है, ऐसा समझकर उसकी ओर न देखे ।
जो तेहिः बुद्धि बिघ नहिं बाघी।
तो बहोरि सुर करहिं उपाघी॥२प।
अर्थ-यदि उस चुद्धिको विन्न वाधा न कर सके तो फिर देचता छोग उपाधि करते हैं ।
१-सुख इरखहिं जड़ दुख बिलखाही । दोठ सम धीर परदि मनमाहीं॥#/
द्छ जझानदीपक
तेद्ि चुद्धि-अर्थात् परम सयानी बुद्धिकों, जिसने मायाकी ओर हजार चेष्टा करनेपर भी ध्यान नहीं दिया | जौ विध्य नि वाधी-यदि मायाकृत प्रत्यमोमन आदिने बाधा नहीं की और माया समीप न जा सकी एवं उसके अश्वल्यातकी गति शानदीपकत्तक न हो सकी । ( विशानकूपिणी चुद्धिद्वारा असम्प्रशात- समाधिमें कोई अन्य चृत्ति नहीं उठने पाती, इससे विषयरूप वायुका प्रचार वहाँतक नहीं हो सकता । )
कल जे
तौ घद्दोरि-तब माया देवताओंको प्रेरणा करती है कि वे बलपूर्वक इन्द्रियद्वासी खोल दें, जिसमें विपयवश्रारि भीतर प्रवेश करके अन्य वृत्तियोंकी खड़ी कर दे | क्योंकि देवता भी मायाके वश हूं, यथा--- देव दनुज नर नाग असुर सब साया विवस बिचारे | ( विनय० ) खुर करहि उपाधी-अर्थात् देवता लोग उपाधि करते हैं, जिसमें अन्थि न छूटने पावे और जीवके द्वारा जो भोग उनको मिला करता है; उसमें बाधा न हो | जीव देवताओंके पश्च॒ हैं, इस छोक और परलोक दोनोमें वे देवताओंद्वारा उपभुक्त होते हैं; यथा---
जाये देव सदा स्थारथी | वचन कहेँ जलु परभारथी ॥ इंद्रिय. वार झरोखा नाना। तहँ तहँ घुर बैठे करि थाना ॥ अर्थ-देहग्रदमें इन्द्रियद्धार ही माना प्रकारके झरोखे हैं, जिनमें देवता गद्दी ऊगाये बेठे हैं
इंद्रिय द7९-इन्द्रियाँ दस हैं-पाँच बामेन्द्रिय और पॉच कर्मेन्द्रिय । शानेन्द्रिय-ओच; त्वकू; चक्षु; रसना और प्राण । तथा कर्मेन्द्रिय- वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ | इन्द्रियोंके द्वार अर्थात् गोलक मी
झतपशञ्च चौपाई ९८
फलतः दस ही हैं। इन्द्रियाँ सृक्ष्म हैं, दिखछायी नहीं पद्धतीं, उनके द्वार दिखलायी पढ़ते हैं | अर्थात् इन्हीं द्वारोसे निकलकर इन्द्रियोँ अपने घविषय शब्द, स्पश) रूप, रस, गन्ध, भाषण, ग्रहण, गमन। मलत्याग तथा आनन्दका क्रमशः ग्रहण करती हैं ।
झरोखा नाना-ये ही द्वार नाना प्रकारके झरोंसे हैं । नाना इस-
लिये कहा कि किसी-किसी इन्द्रियोंके दोहरे झरोखले हैं, जैसे ऑँख और कानके, और स्पद्ा-इन्द्रियका तो रोम-रोम झरोखा-ही-झरोंखा है।
तहें तह-उन प्रत्येक झरोंखोंमे ।
खुर-देवता अर्थात् इन्द्रियोंके देवता। श्रोत्रके दिकू, त्वकके वायु, चक्षुके सूर्य; रसनाके वरुण, घाणके अश्विनीकुमार, थाकक़े वहि, हाथके इन्द्र, पादके विष्णु, पायुके मृत्यु और उपस्थके प्रजापति देवता हैं ।
बैंठे करि थाना-इन देवताओंका प्राणिमात्रकी देहेन्द्रियोपर अधिकार है। ये साधकके इन्द्रियद्धारूूपी झरोंखोंमि अधिकार जमाये बैठे हैं। भाव यह कि वहींसे उनको भोग मिछता था | बृक्तियोंके न उठनेसे भोग मिलना बंद हो गया है, अतः वे उत्ति योौको उठानेके लिये अवश्य प्रयक्ष करेंगे ।
आवत देखहिं बिषय बयारी | ते हठि देहि' कृपाट उघारी ॥२७॥ अये-जवब विषयरूपी हवाके झाँकेकी आते देखते हैं, तो चवलपूबेक कियाड़ खोल देते हैं ।
विषय वयारी-विषयरूपी हवाका झोंका | भाव यह कि बुद्धि झुलवेमें नहीं आग्री तो इसके अतिरिक्त दूसरा उपाय नहीं है कि किसी भांति दीया बुझ् जाय | और दीया बुझानेमें समर्थ दवाका झोंका है |
० शानदीपक
इसी विपय-बयारिके डरसे बुद्धि उरण्हमें दीया जलाकर गाँठ छोड़ने बैठी है, कि बाहर रहनेसे हवाके झोंकेसे दीया बुझ जायगा। अतएव मायाकी प्रेरणासे सब प्रकारके विषयोंके झोंके आने लगते हैं |
आवत देखहिं-ये देवता लोग जब झरोखेसे अर्थात् इन्द्रियह्वारसे देखते हैं कि झोंका आया। ते हढि देहिं कपाट उधारी-तव जबरदस्ती झरोखेका किवाड़ खोल देते हूँ | बुद्धि आसन और मुद्राद्वारा इन्द्रियद्धार झरोखों- को बंद करके उरगइमें बैठी थी; ये हठ करके झरोखेका किवाड खोल देते हैं | बुदि मना करती ही रह जाती है; उसकी एक नहीं सुनते । भाव यह कि साधककों मधुमती भूमिकाकी प्राप्ति होती है, और बह सिद्धियोमें आसक्त हो जाता है ।
जब सो प्रमंजन उरणह जाई । तबहिं दीप बिज्ञान बुझाई॥
अर्थ-ज्ञब वह हवाका झोंका छ॒ंद्यरूपी धरके भीतर जाता है, तो विज्ञान-दीप चुझ जाता है।
जब स्रो प्रभंजन-प्रमंजन इसलिये कहा कि प्रकरष करके भज्ञन करनेवाला है, बड़े-बड़े पेड़ तोड़ डाले, मकान मिरा दिये; फिर दीया बुझाना क्या चीज है !
डउरगृह जाई-अर्थात् झरोखेका कपाठ खुलते ही प्रमेज्ञन घरके भीतर पहुँचा, दिव्य विषय अपने-आप उपस्थित हो गये ।
तबईहिं दीप विज्ञान बुझाई-भाव यह कि पलमात्रमे दीवट कहीं गयी; दीया कहीं गिरा; बची कहीं बुझकर उड़ गयी | एक पल्में अति दुरूह साधन ऐसा नष्ट हुआ कि कहीं पता नहीं । साधक दिव्य विषयोमे लिप्त हो गया ।
दातपश्च चौपाई की
अंधि ने छूटे मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा॥रणज। अर्थ-गाँठि भी नहीं छूटी, चह उजेला भी मिट गया और विषय-चायुस्ते चुद्धि विकलछ हो गयी । अंधि न छूटि-जड़-वेतनकी ग्रन्थि छूटने न पायी, जिस काम- के लिये इतना परिश्रम किया गया सो हुआ ही नहीं । ह मिंठा सो प्रकाला-'आतम अनुभव सुख सुप्रकासा' मिट गया । वह प्रकाश तो 'सोडहमस्मि' वृत्तिके आश्रय था, जब विधयके झेकेसे सोंडइमस्मिवृत्ति ही न रही तब भला प्रकाश कहाँ रहे ! ४ विषय वतएसलए-विपयकी प्रचण्ड हवासे | अर्थात् प्रचण्ड दवाके बेगको बृत्तिजन्य ज्ञानदीप नहीं सह सकता । चुद्धि विकछ भइ-और इतने परिश्रससे तैयार किये हुए. प्रिय दीपके बुझनेसे तथा स्वामीके उद्धारके उपायमें भम्न-मनोंरथ होनेसे एवं
झोंकीकी चपेट्से बुद्धि मी विकल हो जाती है, उसका साहस टूट जाता है और कुछ सूझ नहीं पड़ता |
इंद्रिय-सरन्ह न ज्ञान सोहाई । बिषयसोगपर प्रीति सदाई ॥
अर्थ-इन्द्रियके देवताओंकी भ्रीति सदा विषय-भोगोंपर रहती है, उन्हें शान नहीं खुदाता ।
इंद्विय-खुरस्दद-इन्द्रियके देवताओंकों | देवताभोके अनेक भेद हैं। उनमें शानी देवता और विरक्त देवता भी हैं, यहाँपर उनसे तात्पर्य नहीं है, इन्द्रियोंके देवताओंसे तात्पर्य है )
न ज्ञान सोहाई-शान नहीं अच्छा छुगता। शान होनेसे प्राणी
१०१ शानदीपक
विषय-विमुख हो जाता है; अतएवं देवताओंके भोगर्म कमी आने लगती है । सष्टिके प्रारम्ममें विरादकी उत्पत्तिके बाद जब उसे क्षुधा- तृपासे युक्त किया, तब भूख-प्याससे दुखी होकर इन्द्रिय-देवताओंने अपनी ततिके लिये बद्यदेवसे व्यध्टि शरीर रचनेकी प्रार्थना की। अक्षदेवने ऊपर दॉतवाली गी रची उससे वे ल्लोग तृत्त नहीं हुए । उन्होंने कद्य 'नायमलछूमिति)% | तब ऊपर-नीचे दोनों ओर दातवाला घोड़ा रचा | तब वे बोले क्रि इससे भी हमारा काम नहीं चलेगा, तब मनुष्य रचा | डसे देंखकर देवता बड़े प्रसन्न हुए. कि दससे हमारा काम चलेगा। अतः देवता दन्द्रियोँके रूपसे यथास्थान अश्ठेमें प्रवेश कर गये | अतएव ऐसे भोंगसाधन (मनुष्य ) का विषय-विमुख होकर ज्ञानी होना उन्हें अच्छा नहीं लगता ।
विपयभोगपर पधीति सदाई-ज्ञान न अच्छा छगनेका कारण कहा कि सदा इनकों विपय-भोगपर भीति बनी रहती है, वे एक क्षण भी विपषयसे अलग रहना नहीं चाहते, फिर इन्हें विषयका विरोधी शान कैसे अच्छा छंगेगा ? यथा---
ऊँच निवास नीच करदूती । देखि न सकट्दू पराइ विमृत्ती ॥ बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी | तेहि बिधि दीप को बार बहोरी ॥ २८ ॥ अर्थ-विपयचायुने चुद्धिकों पगछी चना दिया; अब उस विधिसे फिर दीप कौन जछाता है ?
विषय समीर-समीर अर्थात् वायु । समीर-शब्दका व्युत्यत्तिलम्य अर्थ है (अच्छी तरह चलनेवाला ।* भाव यह कि विपयका अंधड़ बंद नहीं होता, चला ही करता है।
# यद्द हमारे लिये यथेष्ट नही है।
आतपथ्च चौपाई १०२
बुद्धि रूत भोरी-अर्थात् उस समीरने परम सयानी बुडिकों भोरी ( पगली ) बना दिया ।
तेहि विधि दीप-भाव यह कि जितनी श्रद्धा, चैये और परिश्रम- द्वारा, जिस विधिसे यह दीप जछाया गया था, उस विधिसे भम्ममनोरथ होंने- परफिरसे संभव नहीं है ओर अविधिसे जछाये हुए; दीपमें 'सो5हमस्मिः इस अखण्ड वृत्तिकी न दीपशिखा होगी और न आत्मानुभव-सुप्रकाश होगा ।
को वार बहोरी-फिर कौन जलछाता है ? भाव यह कि जलानेवाली तो विज्ञानरूपिणी बुद्धि है; वह भोरी हो गयी, बिना उसके दूसरेकी सामर्थ्य नहीं कि ऐसा दीप कोई जला सके । अतः फिर इस जन्ममें ऐसे दीपका जलना सर्वथा असम्भव है |
गोखामीजी विश्नेंसि बचनेका उपासनाके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं देखते और न एक बार दीप बुझनेपर इसी जम्ममें अव्पायु होमैके कारण फिर जलाया जाना सम्भव समझते हैं। विधा नाश उपासनासे होता है, यथा--
सकलछ बिन्न व्यापे नहिं तेही । रास सुकृपा विछोकद्दिं जेद्ी ॥
दो०-तब फिर जीव बिबिध बिधि पावे संसति क्लस ।
हरिमाया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस ॥
अर्थ: ह.०.६ [..] -तब फिर जीव अनेक प्रकारके संसारयी फलेश पाता है, हरिमाया अति डुस्तर है, उससे पार नहीं पाया जाता ।
तव फिर-अर्थात् जिस भाँति साक्त्विकी श्रद्धाके हृदयमें आनेके पहले अवस्था थी वही फिर हुईं, इतना बड़ा अयास व्यर्थ गया। भाव यह कि अनन्तकालसे जीव ज्ञानदीपके उद्योगर्मे है। अनेक जन्ममें
दीप जला और बुझा, पर अन्थि नहीं छूटी, संसार ज्यों-का-त्यों बना रह गया ।
१०३ ज्ञानदीपक
जीव-भाव यह कि 'सोडहमस्सि वृत्तिकों छेकर अपनेकों ब्रह्म मानते थे, सो फिर जीव-के-जीव हो गये |
विविध विधि पाबे संख्ति फ्लेस-अर्थात् अनेक मकारके सांसारिक कलश पाता है| जन्मका छेद, बाल्यावस्थाका छेश, यौवन तथा वार्द्धक््पका क्लेश, तत्पश्चात् मृत्युका छेश, तदनन्तर फिर जन्म, फिर मरण, छेंशका अन्त नहीं है । कछेश पाँच दँ--अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेप और अभिनिवेश | हरिमाया अति उुस्तर-दरिमाया अति अपार है, यथा-- हरिसाया कर अमित प्रभावा | चिपुल बार जेहि सोदधि नचादा ॥ खग जगमय सथ मम उपजाया | नहिं. आचरज मोह खगराया ॥ सो ज्ञानिहु कर चित अपहरई । वरियाई विभोह बस करई॥ा इरिसाया सोद्दृद्धि झुनि ज्ञानी
तरि न जाइ-अर्थात् तरा नहीं जाता । भाव यह कि जब आसुरी माया और दैवी सायाका तरना ही भनुप्यके लिये असम्भव है; यथा-- ज्ञानि न जाय निसाचर माया ।! 'खुर मायाबस छोग बिसोहे ।? इत्यादि, तब इरिमाया कैसे तरी जायगी |
विहगेस-गरुड़कों विहगेश कहकर मायाके विप्तका प्रकरण समाप्त करते हूँ, प्रकरण 'खगराया? से आरम्म किया था। यथा--
छोरत भ्ंथि जानि खगराया । विन्न अनेक करे तब साया ॥ दो०-कहत कठिन समसुझत कठिन साधन कठिन बिबेक। होइ घुनाक्षर न्याय ज्यों पुनि प्रत्यूह अनेक॥
अर्थ-कटना कठिन, समझना कठिन, साधन कठिन और विवेक कठिन है, यदि घुणक्षरन्यायसे दो भी जाय; फिर भी अनेक विषघ्न हैं ।
शतपशञ्च चौपाई १०४
कहत कठिन-अर्थात् कहते नहीं बनता, यथा--- उर अनुभवत्ति न कहि सक सोऊ | कौन प्रकार कहें कवि कोऊ ॥
धन जात बखानी' कहकर मक्रण आरम्म किया था और “कहत कठिन” कहकर उपसंहार करते हैं
समुझत कठिन-प्रमसे सनी हुईं बुद्धि है; अतएवं यदि कोई कहे भी तो समझना कठिन है, यथा-समुझि न परे बुद्धि श्रमसानी !! धसमुझत बने न! कहकर उपक्रम किया; अब 'समुझत कठिन कहकर उपसंहार करते हैं। साधन कठिन-यदि किसी भाँति कद्दते-सुनते भी बने तो साधन कठिन! है क्योंकि मनको कोई आधार नहीं मिलता, निगुंण निराकारमें मनकी गति नहीं है। यथा--
साधन कठिन न मन कहूँ टेका ॥
कठिन विवेक-अर्थात् सुनने-समझने, साधन करनेपर भी विवेक-शान होना कठिन है, यथा-- सुनिय गुनिय समलझ्िय समुझाइय दसा छदय नहिं जावे । जेहि अनुभव विज्वु मोहजनित दारुन भव बिपति सतताबे # (विनय० ) होइ छुनाक्षर न्याय ज्यों-काठमें घुन लगते हैं, जिससे उसमें कभी-कभी अक्षर बन जाता है । घुनकों अक्षरका ज्ञान नहीं जो बना सके, फिर भी देवयोगसे कोई अक्षर बन जाता है। उसीको घुणाक्षर- न्याय कहते हैँ । इस न्यायसे भी यदि शानदीपक ठीक उतर जाय तो-- धुन्ाक्षर न्याय! कहकर 'अस संजोंग ईशा जब करई” का साफल्य दिखलाया |
पुनि अ्त्यूह अनेक-फिर भी वहुत-से विष्न हैं, जो जड-चेतमकी अन्थि नहीं खोलने देते |
श्ण्५ शानदीपक
ज्ञानपंथ कृपान कर धारा। परत खगेस होत नहीं बारा ॥
अर्थ-शानमार्ग तलवारकी धार है। इसपरसे गिरते, हे गरुड़ । देर नहीं लगती ।
शानपंथ-अर्थात् अकृतोपास्तिशानका साघन। भाव यह कि छउपासनाकी सहायता बिना लिये जो ज्ञान-सिद्धि चाहते हैं, उनका मार्ग । कृपान कर धारा-भाव यह कि शानपन्थ बड़ा ही सूक्ष्म है बस, उसे तलवारकी धार दी समझिये । रास्ता क्या है, निरालम्ब मार्गमें एक रेखा है । झलेपर चलना कितना कठिन है ! फिर उस कृपाणकी धारापरसे कोई क्या चलेगा ! खगेस-सम्बोधन, मायाकृत विष्नसूचक | परत होत नहिं' चारा-गिरते देर नहीं लगती । चलते बड़ी देर लगती है | तारपर या रघस्सेपर चलनेवाले समताकों बनाये हुए बड़ी कठिनता और देरसे पैर रखते हैँ | तनिक-सा समतामें चैषम्ध आया कि पतन हुआ; यहाँ तो कृपाणघारा-सा रृक्ष्म पथपर चलना है; पतनमें 'क्या देर है ! यथा--- जे ज्ञान मान बिमत्त तब भय-हरति भगति न आदरी। ते पाहू खुर दुरकूभ पद्राद॒पि परत हम देखत हरी ॥
जौ निर्बिन्न पंथ निरबहई । तो केवल्य परमपद लहई ॥श्था
अर्थ-यदि विन्चनकोी अतिक्रमण करता हुआ रास्ता पार करे तो कैचल्य परमपद् पाये ।
डातपश्च चौपाई १०६ निर्विन्न पंथ-बहुत बड़े और घने विज्नवाले मार्गकों निर्विन्न निवाहना परम पुरुषार्थ हे ।
जन निरवद्ई-जो परम पुरुषार्था आश्रय करके सब विन्त- बाधाओँकों झेलता हुआ बिना पतनके पार पहुँच जाय )
तो कैबल्य परमपद् लरद्दई-तों केबल्थ नामक जो परमपद है उसको प्राप्त होता है अर्थात् निर्विशेष ब्रह्मकी स्थितिक्रों प्रा होता है; यथा--
जानत सुमहिं ठुमहिं होइ् जाई ॥ अति दुलेस कैबल्य परमपद् ।
संत पुरान निगम आगम बद ॥ अर्थ-कैचल्य परमपद् अति दुलम है। संत, पुराण, वेदः शास्त्र ऐसा ही कद्दते हैं । केवल्य पद-त्रिदेवके अधिकारकों पद कहते हैं, यथा--
भरतहिं होइ न राजमद विधि-हरि-हरपद पाई? परन्तु केवल्यपद उससे भी बड़ा है; इसलिये परमपद कहा ।
अति दुलेभ-भाव यह कि अन्तिम देह ब्राह्मणकी सुर-दुलभ है; यथा--
चरम देह ह्विज कर मैं पाया | सुरदुलूभ घुरान श्रुति गावा ॥
5 ० हज विचे हर रु मुनिदुर्लभ_ के उस शरीरमसें भी विरति, विवेक, ज्ञान, विज्ञानका होना मुनिदुलभ_ है, यथा--
ज्ञान विबेक बिरति बिज्ञाना | सुनिदुर्लम गुन जे जग जाना 0
. उन शुर्णोंके होते हुए मी, उनका फलरूप करेबल्यपद अति दुलम है|
१०७ शानदीपक
संत पुरान निगम आगम चद-अथांत् साधु) वेद, शास्त्र, पुराण सभी कद्दते हैँ | भाव यह कि वेद, दान्त्र, पुराणके कहनेपर भी साधुरओके अनुमोदनकी अपेक्षा रहती है | क्योंकि वेद, पुराण सर्वाश्चर्मे समुद्रल्प ऐोनेपर भी उनके वाक्यरूपी जलसे काम नहीं चलता | जन्र बह चेंद, पुराणरूपी समुद्रका चादय-जछ मेघलानीय साधुओंके मुखसे च्युत दोता है तब संसारके कामका दोता ऐ। यथा--
खेद घुरान उदयुधि घन साथू।
परी रच रह जतः वेद, पुराण, शाल्र और साधु सब एक स्वस्से कहते हैँ कि कैवल्यपद अति दुलंभ दे, यही परम पुरुषार्थकी सिद्धि है ।
तृतीय ग्रसद्भ श्रीभक्ति-विन्तामणि
+-++9६899-+--- राम सजत सोइ मुकुति गोसाईं । अनइच्छित आबे. बरिआई ॥ ३०॥
जर्थ--हे गोसाई | रामको मजते-भजते वह्दी मुक्ति विना चाहें भी चलपूर्वक आती है।
राम भमजत-भाव यह कि साधारणतः संसारी जीव संसारकों मजते हैं । संसासमें ममता होना ही संसारकों भजना है; और देहमें, गेहमें, कुटम्बमें, परिवारमें, घनमें, सम्पत्तिमें ममता होना ही सांसारिक ममता या संसारित्व है । मनसे इत्तिरूप मसताके तागे निकलकर देह-गेह-कुटम्बादि- में छगे हुए हैं, जिनकी चौतरफा खींचतानसे मन सतत विकल रहता है, कभी विश्वाम नहीं पाता, वथा--
कवहूँ सन विश्वास न सान्यो | चिसिदिन अमत वबिसारि सहज सुख, जहेँ तहँ इंड्धिय तान्यो |
|
१०९ श्रीभक्ति-चिन्तामणि
इसी दु»खसे छूटनेके लिये शारत्रोंकी उपयोगिता है, और पुरुषार्थ- की प्रचृत्ति है। इस दुःखसे छूटनेके दो ही रास्ते हैं । या तो ममताके तागे ही काट डाले जाये, या ममता संसारसे तोड़कर राममें जोड़ी जाय; यथा- को करू ममता रामसे की ममता परहेलछ ।
इनमें ममता-तागें काटनेवाले रास्तेकों ज्ञानपंथ कहते हैं; यथा-- “ममता त्याग करहिं जिमि ज्ञानी ।! परन्तु यह मार्ग दुर्गम है, इसमें विन्न बहुत हैं, साधन भी कठिन है, मनकों कोई अबरूम्ब नहीं मिलता । अतः इस रास्तेमें कष्ट बहुत हैं; यथा--
ज्ञान अगम भत्यूह जनेका | साधन कठिन न मन कहूँ टेका ॥ करत कष्ट बहु पाने कोऊ | भक्तिदीन मोहिं प्रिय नहिं सोऊ ॥ -
इसमें पर्स अधिकारकी आवश्यकता है। अतः इसके अधिकारी भी बहुत कम हैं । भुशुण्डिजीने खयं अपनेको इसका अधिकारी नहीं माना) यथा---
, 'मोहि परम अधिकारी जानी ॥! “छगरे करन ब्रह्म उपदेसा ।! सो हें तोदि ताहि नहिं भेदा। वारि बीच हव गावरहि बेदा ॥
यदि किसी भाँति ज्ञानकी प्राधि हो भी जाय, तो उसका टिकना बिना उपासनाके सम्भव नहीं, उसका पतन हुए बिना नहीं रहता, यथा--
जे ज्ञान मान चिमत्त तव भयहरनि भगति न आादुरी।
ते पाह सुर हुरलूम पढदादपि परत हम देखत हरी ॥
अतः दूसरा सुगम मार्ग यह है कि ममता राससे जोड़ी जाय | इसीको मक्तिपथ कहते हैं | इसमें ममताके तागे काटे नहीं जाते, क्योंकि इनको काटनेमें जन्म-जन्म अभ्यासनिरत मनकों महाकष्ट होता है। मनसे भी ममतात्यागका ध्यान करनेसे अस्य बेदना होती है। अतः इसकी विधि यह है कि देह-गेह-कुठम्वादिमें जहॉ-जहाँ ममताके तागे छगे हो, वहाँसे हदाकर सबको बट डाला जाय; यथा--
दतपशथ्च चौपाई ११०
जहँ ऊगि नाथ सनेद्र सगाई | भीति प्रतीति निगम निज गाई ॥ सोरे सघुद्द एक तुम खासी ।
और इस भाँति बँटी हुई डोरीको भगवच्रणोंमें बॉधे, यथा--
जननी जनक वंधु सुत दारा । तन घन सहज सुहद परिवारा ॥ सबके ममता ताम बटोरी | मम पद भनहिं बाँधु बरि डोरी गा समदरसी एच्छा कछु नाहीं | हपँ सोक भय नदिं मनमाहीं ॥
इस भाँति ममताकी डोरी भगवच्चरणोंमें लग जानेपर मन खींचा- तानीसे छूटकर स्थितिकों आस होता है, केवल अस्मितामान्र रह जाती है, जिसे ज्योतिष्मती प्रत॒त्ति कहते हैँ । इससे प्रकाश होता है, और सबमें समान रूपसे ब्रक्ष दिखायी पड़ने ऊगता है, और साधक दृर्ष-शोकसे छूट जाता है । वद्दी ममता संसारमें होनेसे अन्धकारमबी अविद्या थी, और वही ईश्वर-प्रणिधानसे ज्योतिष्मती विद्या हो गयी | यही राममजन है।
खोद झुकुति-भाव यह कि साधनकी सुगमतासे कोई सिद्धिमें च्रुटि न मान ले; अतः कहते हैं कि सालोक्य, सामीष्य, साष्टर्थ या सारूप्य नहीं, बल्कि वही चित्जड्ग्रन्थिविमोकरूपा कैवल्यमुक्ति- ( वह्दी शुतिस्म॒तिप्रसिद अति दुलूभ परमपद ) जिसके लिये इतना वड़ा मगीरथ प्रयक्ञ करके ज्ञानदीप जछाया गया, और फिर भी विष्नवाहुल्य- के कारण प्राप्त न हो सकी ।
गोखाई-भाव यह कि आप भी ख्ामी हैं, आप जानते हैं कि सेवककी भक्तिसे प्रसन्न होकर, स्वामी उसके अभिमुख होते हैं, उसपर अनुग्रद करते हैं, इसी भाँति भक्तिविशेषसे ( मानसिक, बाचिक वा कायिकसे ) भीराम अमिमुख होकर अभिष्यान# मान्नसे भक्तपर अनुग्रह करते हैं, और उसके मनोरथको पूर्ण करते हैं, यथा--“भजत कृपा करिहेँ रघुराई ॥?
+# संकल्प ।
१११ श्रीमक्ति-चिन्तामणि
अनइच्छित-भाव यह कि सामान्यतः जीव अति आवदे होकर; जिज्ञासु होकर, अर्थार्थी होकर अथवा ज्ञानकी स्थिरताके लिये रामके सम्मुख होते हैं, यथा--- शस भगत जग चारि प्रकारा | सुकृती चारिड अनघ उदारा श।
परन्तु ऐसी एकाड्भी ग्रीति करनेवाले निष्काम भक्त भी होते हैं, जिनको भजनमें ही ऐसा आनन्द मिल गया है कि वे मुक्ति तककी उपेक्षा करते हैं, उनके लिये मुक्ति अनइच्छित है, यथा-- अर्थ न धर्म न काम रुचि; गति न चहों निर्वान । जनम जनम रति रामपदु, यह चरदान न जान ॥ जैसे अर्थ ( रुपया ) सुखका साधनमात्र है; और इसीलिये जगत् उसके लिये छाल्ययित रहता है; और समी थोड़ा या बहुत परिश्रम अथॉपार्जनके लिये करते हैं, परन्तु फोई-कोई ऐसे भी हैं जिन्हें अर्थ- संग्रहमें ही कोई ऐसा विशेष आनन्द मिल गया है; कि वे अर्थके लिये ही सब्र दुःख उठाते हैं, और उस अर्थसे कोई सुख लिया नहीं चाहते, किसी भाँति जीवन-निर्वाह कर छेते हैं, और सुखकी ओरसे उनकी सर्वथा उपेक्षा-बुद्धि हों जाती है, सुख उनके लियि अनइच्छित पदार्थ हों जाता है, इसी भाँति अनन्य भक्तके लिये मुक्ति भी अनिच्छित हो जाती है, यथा--
सम गुन आस नासरत, गत इर्पा मद भोह। तेहि कर सुख सोह जाने, चिदानंद संदोह ॥ तथा--- जलद् जनम भरि सुरति बिसारै। जाचत जछ पबि पाहन डारे ॥ चातक रटनि रटे घटि जाईं। बढ़े प्रीति सब भाँति भछ्ाईं ॥
[५|
आधे वरिआई-रामका मजन करनेसे विज्नोंका अभाव तो हो ही जाता है, यथा--
शतपशथ्च चौपाई श्र - सकल विन्न व्यापह्दिं नहिं तेही | रास सुकृपा बिलोकट्ठिं जेही #
उसके साथ-साथ प्रत्यक् चेतनका अधिगम अर्थात् ख्वरूपका दशशन भी होता है । भाव यह कि भमताकी डोरी राममें छगनेसे तत्पदवाच्य- का दर्शन तो उसे होता ही है, साथ-ही-साथ उसे त्वंपदवाच्यक्रा भी दर्बान हो जाता है; यथा-- »भंम दरसन फल परम अनूपा। जांच पाव निज सहज सरूपा ॥
जिस भाँति ईश्वर-पुरुष, झुद्ध, प्रसन्न, केवल है और जात्यायु- भोगसे रहित है, उसी भाँति बुद्धिका प्रतिसंवेदी# पुरुष त्वंपदार्थ भी है; अतः एकके साक्षात्कारसे दूसरा भी जाना जाता है। सदृश अर्थक्रे अनुच्चिन्तनसे दूसरे सदश पदार्थके साक्षात्कारकी उपयोगिता होती है, जिस माँति एक शासत्रके अभ्याससे उसके सहश दूसरे शास्रके श्ञानकी उपयोगिता होती है । तत्पश्चात् भेदासहिष्णु भक्ति दोनोंका ऐक्य कर देती है, अर्थात् चितजड्श्रन्थि छोड़ देती है, यथा--
, देखा जीव नचावे जाहो। देखी भगति जो छोरे ताही ॥
इस प्रकार मुक्ति वरिआईसे आती है । ऐसी अवस्थामें यदि सैवक- सेंग्यमाव भयल रह जाय तब तो मुक्ति रुकती है नहीं तो बिना चाहे भी मुक्ति हो जाती है, यथा--
सो अनन्य अस जाकर, भत्ति न टरै हजुसंत | हा]
सें सेवक सचराचर, रूप स्ामि भगवंत॥ा॥ा
यही मुक्तिका बलपूर्वक आना है। मुक्तिके इस माँति आनेका कारण यह है कि--
जिमि थल बिचु जल रहि न सकाई । : कोटि भाँति कोड करे उपाई ॥
# प्रतिविम्बित ।
श्श्३ शरीभक्ति-चिन्तामणि तथा मोच्छसुख सुनु खगराई । रहिं न सके हरिसगति बिहाई ॥३११॥ अर्थ-जैसे धलके विना जल नद्ठीं रह सकता, चाहे कोई कोटि भाँति उपाय करे, चैसे ही हे गरुड ! मोक्षखुख हरिभक्ति- को छोड़कर ठद्दर नहीं सकता | जिमि जल धलर-यहाँ जलछ-थछका दृष्टान्त दिया गया है। जल- थलमें आधाराधेय सम्बन्ध है । जल आधेय है, थल आधार है । जलका प्च्यवनशील ख्माव है, अतः उसके ठहरनेके लिये थलकी आवश्यकता है | जो जिसका आधार नहीं है, बह वहाँ ठहर नहीं सकता । आकाश; वायु और अम्नि ये भूतत्रय जल्के आधार नहीं हैं, अतः वहाँ जाकर भी जल नहीं ठहर सकता । इसके कारण ईश्वरीय नियम हैँ, तदनुसार रहनेमें ही सुख है, यथा-- गगन समीर अनल जल धरनी । इनके नाथ सहज जड़ करनी ॥ अस्षु प्रेरित भाया उपजाये | सृष्टि देतु सब अ्रथनि गाये ॥ प्रभु आज्ञा जेड्टि कह जस जहई । सो तेद्दि भाँति रहे छुख रूदई ॥ विज्ठु रहि न सकाई-भाव यह कि थछका साथ नल नहीं छोड़ सकता | जहाँ जल-ही-जलू हो वहाँ मी अनुमान करना पड़ेगा कि आधाररूपमें थल विद्यमान है; क्योंकि ईश्वरीय नियम भन्ञ नहीं होता । कोड-भाव यह कि साधक चाहे कैसा ही समर्थ हो । जीव तीन प्रकारके होते हं--( १ ) विधयी, ( २) साधक और (३ ) सिद्ध, यथा- निपयी साधक सिद्ध सयाने । त्रिविध जीव जग बेद बखाने ॥ सो इनमेंसे चाहे कोई भी हो वह उपर्युक्त नियम भन्न करनेमें असमर्थ है । कोटि भाँति उपाय करे-जों कार्य सासान्य रीतिसे नहीं होता,
उसके लिये उपाय किया जाता है; यथा-- ८
शतपश्च चौपाई ११७
तद॒पि एक मैं कहव उपाईं | करिअ दैव जो होय सहाईं॥ अतः उपायद्वारा, यन्चद्वारा चाहे जल अन््तरिक्षमें फेंका जाय; अथवा ईश्वरीय नियमसे मेघदढ्वारा आकाशपर चढ़ जाय; पर वहाँ ठहर नहीं सकता । ठहरेगा तो थूपर आकर ही ठहरेगा ।
मोच्छरुख-भाव यह कि मोक्ष और सुख कोई दो पदार्थ नहीं हैं । सुख, ब्रह्म और मोक्ष ये समानाथंक शब्द हैं, यथा--- रास बअह्मय परमारथ रूपा। सुख सरूप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान।
ज्रह्यसुख दी सब छुखोंका मूल है। प्रकारान्तरसे विधयसुख भी ब्रह्मसुखकी दही झलक है | इसीलिये “मंगल मोद निधान? कहा । सो यहाँ 'मोच्छसुख” शब्दके प्रयोगका तात्पर्य यह है कि मोक्ष होनेके पहले साधनद्वारा भुक्तिके साह्निध्यसे मोक्षतुखका अन्नुभव होने छगता है अथवा ब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर भी प्रारब्घक्रे प्रतिवन््धक रहनेसे मुक्ति रुकी रहती है, पर मोक्षसुख नहीं रुक सकता, अतः यहाँ मुक्ति न कहकर मोक्षसुख कहा । खुल खगराई-सनु खगराई कहकर यह जतलाया कि उड़ने- वाल्में प्रथम गणना आपकी है | आप जानते हैं कि कितना भी कोई उड़े; पर बिना थरूके विभाम नहीं मिल सकता । इरिभगति बिहाई-भाव यह कि हरिमक्ति तथा अहृृखुखर्मे आधाराधेय भाव है, जहाँ ब्रह्ममुख हे वहाँ हरिभक्ति अवश्य है, परन्तु मोक्ष तो सब किसीको खभावसे ही प्रात है, क्योंकि वह कृतक नहीं है, नित्य है; फिर उसका आधार कहना नहीं बनता | इसीलिये सोक्ष न कहकर मोक्षसुख कहा, क्योंकि नित्यप्राप्त मोक्षसुखकों आच्छादित रखनेवाली अहन्ता-ममतारूपा अविद्या है, यथा--- कबिट्टि अगस जिसि अहासुख, अह मस भलछिन जनेघु ॥ सो चाहे अहन्ताकों भगवच्रणोंमें बाँघनेसे अर्थात् अहँग्रहो-
५१५० श्रीभक्ति-चिन्तामणि
पासनासे मोक्षसखुत्ध मिले, अथवा ममताकों उन चरणोंमे बॉधनेसे मोक्षसुख मिले, उसके मूल दरिभक्ति तो हुई है, पर अन्य उपायंसि अर्थात् जप; तप, मखादि कर्मोंसे भी जहाँ मोक्षखुख प्राप्त हो वहाँ भी इरिभमक्ति ही अनुसित है, क्योंकि हरिभक्ति छोंड़नेका अथ ही हरिसे नाता तोड़ना है, और उनसे नाता तोड़नेपर सुख कहाँ ! यथा--“बिनु हरि मभगति जाय जप जोगा ।*
तथा रदि न सफे-भाव यद्द कि हरिभक्तिकों छोड़नेपर ब्रह्म सुख निराधार हो जाता है, उनसे नाता बनाये रखनेपर ही, जप तप मखादि कर्मों भी ब्रफ्सुखकी आशा की जा सकती है, और तोड़नेपर तो उसकी कोई आशा ह्वी नहीं । यथा--
जोग कुजोग ज्ञान अज्ञान् । जहेँ नहिं रामप्रेस परधानू ॥
अस बिचारि हरिसगत सयाने | स॒ुकृति निरादर भगति छोमाने ॥
अर्थ-पऐसा विधारकर ही तो खयाने दरिभक्त भक्तिके छोभमें पढ़कर मुक्तिका निरादर करते है। अस विद्यारि-भाव यह कि भक्तिसे द्वी आतंजीवके संकट कटते हैं और सुखकी प्राप्ति होती है। भक्तिसे अर्थार्थियोँंकीं अणिमादि सिद्धि मिलती है; भक्तिसे जिज्ञासुओंकों गूढ़ गतिका ज्ञान होता है, और भक्तिसे द्वी शान दृढभूमिक होता है; यथा--- नाम जीद्द जपि जागहि जोगी। विरति बिरंचि प्रपंच वियोगी ॥ महासुखहिं जनुभवदिं जनूपा | अकथ जनामय नाम न रूपा ॥ जाना चद्॒टि गूठ गति जेऊ | नाम जीह जपि जानहिं तेऊ # साधक नाम जपद्िं छय लाये । होईदि सिद्ध अनिभादिक पाये ॥ जपहिं चाम जन आरत भारी । सिट॒हिं कुर्सकट होहि सुखारी ॥
शतपश् चौपाई श्श्द
तथा--- एकहद्नटि साधन सब रिघधिसिधि साथि रे। प्रसे. कलछिकाछ जोग संजम समाधि रे॥ ( विनय० ) हरिभगत खयाने-कहनेका भाव यह कि सयाने लोगोंकी यह रीति है कि उपायकी उपेयसे भी अधिक ग्रतिष्ठा करते हैं, यथा--
तुमतें अधिक गुरुद्दिं जिय जानी। सककछ भाँति सेवद्वि सनमानी ॥
इस माँति यद्यपि घन सुखके ही लिये है, पर सयाने छोग सुखसे अधिक प्रतिष्ठा धनकी करते हैं, और धनसंग्रहमें किसी ढुःखकों दुःख नहीं गिनते, इसी तरह हरिभक्तोंमें सयाने अनन्य भक्तलोंग हैं, मक्तिके सामने मुक्तिकों भी नहीं मानते | सुकुति निरादर-भाव यह कि करगत मुक्तिसे मी पीछे हठते हैं, भक्तिके आनन्दमें ही मिमग्न हैं, मुक्तिकी ओर देखनेके लिये उन्हें अवसर नहीं, यथा--- दिसि अरु विदिसि पंथ नहिं सूझा । को मैं कौन कहाँ नहिं. घूझा॥। मुनि सगमाँझ अचल है बैंसा | पुछक सरीर पनस फल जैसा ॥ मुनिद्धि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यानजमित सुख पावा॥ सगुन उपासक सोच्छ न लेहीं | तिन कहे राम भगति निज देहीं ॥ भगति छोमाने-भाव यह कि भक्तिशास्त्रमे कार्पण्यविशेषका आदर है। जैसे कृपणकों घनका छोम होता है, धनके लिये सुख त्याग करनेका उसका ऐसा खमाव पड़ जाता है कि वह मुफ्तमें मिले हुए सुखको भी नहीं भोगना चाहता, दूसरेके भोगकों भी नहीं देख सकता, उसी भाँति भक्तको भी भक्तिका छोम हो जाता है, उसे खय॑ भी मोक्षकी इच्छा नहीं रहती, ओर दूसरोंकों भी मुक्ति छोड़कर भजन करनेका ही उपदेश देता है, यथा-- कासिद्धिं नारि पियारि जिमि, छोमिहिं प्रिय जिसि दास । सिसि रघुनाथ निरंतर प्रिय लछागहु मोहिं राम ॥
१५७ श्रीसक्ति-चिन्तामणि
भजन करत बिन्नु जतन प्रयासा |
संस्ति मूठ अबिद्या नासा॥३२॥
अर्थ-भजन करते हुए बिना यल्न और प्रयासके। संसारके मूल अविद्याका नाश हो जाता है। भजन करत-भाव यह कि भजन करनेमें तीन चत्छठ अपेक्षित हैं---( १ ) भजनीय भगवान्, ( २ ) भक्ति और ( ३ ) अधिकारी । भगवानके दो रूप हैँ, निर्गुण और सग्रुण | सो निर्मुककी उपासना अमेद भक्तिसे होती है। सगुण ब्रह्मकी दो उपाधियाँ हैं---नाम# और रूप| । इन्हींके द्वार इनका भजन होता है, यथा--
# नाम-मवन प्रधान ए, क्योंकि इसके द्वारा निर्युण-सग्रण दोनों रूपोंका भजन हो सकता है। नामका जप अर्थमावनाफे साथ ऐना चाएये। लामोंमें मी प्रणबरूप ोनेसे, सुखमुखोद्यार्य शोनेसे, सर्वदित ऐनेसे तथा अधिक प्रापनाशक दोनेसे राम-नाम सब नामोंमें श्रेष्ठ ऐ ।
+ उस विश्वरूपके पाँच भजनीय रूप मदात्माओंने माने ईं---१ परमरूप, ३ व्यूदरूप, ३ विभवरूप, ४ अन्तयोमीरूप और ५ अर्चावताररूप ।
२०-परमरूप-नित्य विभूतिमें ऐ | परमरूप और वासुदेव एक दी हैं। वामुदेव च्यक्ताव्यक्तात्मक विप्णुको कएते हैं, यया--वामुदेव पदपंकरुदद, दंपति मन अति छाग्र 7! इसी रूपको व्यूइमें मिलाकर चारकी संख्या पूरी करते हैं ।
२-अ्यूदरूप चार ऐं,--वासुदेव, सझुपंण, प्रयुम्न और अनिरुद्ध । ये छी क्रमशः राम, लक्ष्मण, भरत और झत्रुष्न एैं। शान और बलकी प्रधानता समूपंणव्यूइमें है, ऐश्वर्य और वीयंकी प्रधानता प्रयुन्नव्यूएमें, शक्ति और ठेजकी प्रधानता अनिरुदव्यूइमें, और छट्ों शुर्णोक्ती पूर्णझूपसे एक साथ छी स्थित्ति वाझुदेवरूपमें है, यथा---
शातपश्च चौपाई श्१८
अगुन सगुन& दुद ब्रह्मस्यरपा। जअकथ अगाधि अनादि अरूपा #
भक्ति नं प्रकारकी होती है, यथा--“अवनादिक"] नव भक्ति इृढाहीं |? यह अवणादिक भक्ति वर्णाअमधर्माधिकारियोंके लिये है, यथा-- चारिड रूप-सीलू-सुन-धामा | तदपि अधिक सुखसायर रामा॥ इ-मक्तोंपर अनुग्नद करके संसारमें जिस रूपसे अवतरित दोते हैं, उसे विभवरूप कहते हैं, यथा--- इच्छामय नरदेह संवारे | होहों प्रग/ निकेत तुम्दारे ॥ ४--अर्वावताररूप-भक्तलोग जिस खरूपका ध्यान करते हैं, और जिस सामका स्मरण करते हैं वैसा ही नाम और रूप धारण करके भगवान् अर्चा- वतारमें विराजते हैं । सर्वश्, सर्वशक्ति, पूर्णकाम, रक्षक और सबेखामी होते हुए भी भश और असमर्थ-से दोकर, अपेक्षा करने और रक्षा करनेयोग्य मालम पड़ते हैं, भक्तके अधीन अपने ख्वरूपको कर देनेसे नेत्रोंको सुलूभ हो जाते हैं, यथा---
कर नित करहद्ििं रामपद पूजा ।
# सगुणरूपके साथ-दी-साथ लीला और भामका भी झद्दण द्योता है । 'नित्यधामदायक दोनेसे लीलाधामकी मद्दिंमा नित्यभामसे भी वढ़कर है, यथा- “मम थामदा पुरी सुखरासी 7?
+ अश्रवर्ण कीत्तेन विष्णोंः स्सरणं पादसेंवनस्।
अच ने वन्दन दास्यं सख्यमात्मनिवेदनस् |
( १ ) अवण, यथा-मासा असन व्यसन यह तिनहीं | रघुपतिचरित होइ तहँ सुनहीं ॥ ( २) कीतेंन, यथा-कहत फिरों दरिग्युन अन्ुवादा। (३ ) स्मरण, यथा-राम-नाम सिव झुमिरन छागे। ( ४ ) पादसेवल, यथा--चरन-कमल चापत विधि नाना ॥ (५) अचल, यथा-कर नित करहिं राम पद पूजा । (६ ) बन्दन-राम लमामि नमामि नमामी ॥ ( ७) दास्य, यथा-मोर दास कंद्ाइ नर जासा। करे तो कहाँ रक्बौं विखासा॥ ( ८ ) सख्य, यथा-कीन्द प्रीति कछु वीच न राखा | ( ९ ) आत्मनिवेदन-अव प्रश्न पाहि सरन तकि आाएडें ।
१५१०, श्षीमक्ति-चिन्तामणि
भ्रथमष्टिं विप्रचरन अति प्रोत्ती । निज निज घर्मनिरत श्रुतिरीतों सेहिकर फछ पुन्ि ब्रिपय बिरागा । तब मम धर्से उपज अनुरागा ॥
परन्तु आचाण्डाल मनुष्यमात्रके लिये जिस नवधाशभक्तिका उपदेश है बह शबरीके प्रसज्ञमं कही गयी है। बिना संसारसे चित्त हृटाये भमगवत्- घचरणोंम चित्त नहीं छग सकता। बिना वेराग्यके साधनभक्ति भी नहीं हो सकती | सो वैराग्य ज्राएणभक्ति करते हुए स्वधर्माच एणसे होता है, यथा-
घंदौं प्रथम मदहीसुर चरना | मोहजनित संसय सब हरना ॥
तब भागवतघम्ममें अनुराग होता है तत्पश्नात् श्रवणादिक साधन- भक्ति दृढ़ होती है |
अधिकारी- राम-भगतिके ते अधिकारी । जिन कह सतसंगति अति प्यारी ॥
विज्ञु ज़जन प्रयासा-भाव यह कि यज्ञ उपायको कहते हैं यथा- 'कौनिउ जतन देइ नहिं जाना !? और यज्ञ करनेमें जो भ्रम होता है उसे अयास कहते हैँ | सो यत्ष और प्रयास ज्ञानमार्गमे है। भक्तिमें तो सबसे ममता हटाकर राममें जोड़ना ऐ, और किसी यज्ञ तथा प्रयासकी आवश्यकता नहीं है; यथा--
कहदहु भगत्ति पथ कौन अ्यासा । जोग न जप तप सख उपवासा ॥
# प्रथम मगति संतन कर संगा । दूसरि रति मम कथा असंगा ॥ चुरुपदर्षकन सेवा त्तीसरिं सगति अमान | चींगि भगति मम गुनगन, करइ कपट तजि गान ॥ मंत्र जाप मम दृढ़ विस्वासा। पंचम भजन सो बचेद प्रकासा ॥ छठ दम सील बिरत बहु करमा। निरत निरंतए सज्जन धरमा ॥ सातवें सम मोदिमय जग देखा | मोदिते अधिक संत करि लेखा ॥ आठवें जथारहाभ संतोपषा | सपनेड नहि देखइश परदोपा॥ नवम सरल सब सन छलद्दीना | मम भरोसत द्विय दरप न दीना॥
शतपश् चौपाई १२०
संख्ति मूछ-यद्यपि यह सृष्टि मायाकी रची हुईं है, पर हरिकी प्रेरणासे रची गयी है, यह बन्धका कारण नहीं है । बन्धका कारण जीवकुत सृष्ि है। यह अविद्यासे है, यही दुध्खरूपा है; इसीके कारण जीव भवकूपमें पड़ा है, यथा--
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा | जेंहि वस जोव परा अवकूपा ॥ सअविद्या-अवियया पश्चपर्वा है, इसकी पॉच अवस्थाएँ हैं! अविया,
२ अस्मिता, ३ राग, ४ द्वेष और ५ अभिनिवेद्य; यथा-दारुन अविद्या ५. ८ हे हि. पंचजनित बिकार भ्रीरघुबर हरे ।?
१ अविद्या-अनित्य, अश्चि) दुःख और अनात्ममें नित्य, झुचि; सुख और आत्मके भानकों कहते हैं, यथा- तहूँ मगन संजसि पान करि तन्रय कार जल नाहीं जहाँ | निज सद्दज अज्ञभव रूप खल तू भूलि थों आयो कहाँ ॥ २ अस्मिता--चित-शक्ति और जड-दक्ति (बुद्धि) की एकात्मता-
को कहते हैं ! भोक्तुशक्ति और भोग्यशक्तिकी एक स्परूपापत्ति (अध्यास) ही भोग है, यदि दोनों एथक् कर दी जायें तो कैवल्य हो जाय, यथा---
संसतिमूल सूलभअद नाना। सकल सोकदायक शझमिसाना ॥ ३ राग-सुखके जानकारकी सुखानुस्मृतिपूर्वक सुख या सुखके साधनमें जो तृष्णा है, उसको राग कहते हैं, यथा-- अलि पतंग मूंग सीन गज जरत एकहदी आँच। चुलसो वें कैसे जियं जिनके लऊागे पाँच ॥ ४ दछेष-दुशखके जानकारका दुः्खानुस्मृतिपूर्वक दुश्ख या दुःखके साधनमें जो क्रोध होता है, उसको द्वेंष कद्दते हैं; यथा- खर दूधन बिराध तुम मारा। हतेउ व्याध इव बालि बिचारा ॥ २०००००००००० ००० ०००५०» ]आज बैर सब छेडें निबाद्दी ।
१२५१ शीमक्ति-चिन्तामणि
७-अभिनिवेश--मरणमयकोी कहते हैं। यथा- उत्तर देत सोहि बचव जअभागे। नासा-माव यह कि ममताके रामचरणमें छग जानेसे पश्चपर्वा अविद्याका नाश होता है, यथा- अविद्याका नाशा- हरिसेवरद्टि न उयाप अविद्या। प्रशुप्रेरित व्यापे तेहि विद्या ॥ अस्मिताका नाश- जन अभिमान न राखहिं काऊ। दीनवंधु अति मदुर सुभाऊ ॥ शागका नाश-- ; जी तुम राम छागते मीछे। तौ नवरस पटथरस रस अनरस छे जाते सब सीठे । द्वेषका नाश-- निज प्रश्लुमय देखहिं जगत का सन करहिं विरोध ॥ असिनिवेशका नाश- सपने नहिं. काछहुते ढरिये | (कवित० ) अब प्रश्न यह है कि संसारमें जहा-जहाँ ममताके तागे छगे हुए, हैं, बहाँ-वहाँसे उन्हें हटाकर, उनकी एक डोरी ववकर भगवत्-चरणोंमें बॉघना भी तो साधारण व्यापार नहीं है, बिना प्रवल वैराग्यके इस नरिशुणात्मक संसारसे ममता छूट भी तो नहीं सकती; यथा--- कहिज तात सो परस विरागी। ठून सम सिद्धि तीन गशुन स्थागी ॥ अतः उस चैराग्यब॒लका सम्पादन करनेके ल्ये तो क्लिष्ट साधनोका सामना करना ही पड़ेगा । अतः कहते हैं---
भोजन करिओअ तृपिति हित छागी। जिमि सोइ असन पचब जठरागी ॥
शतपश्च चौपाई १२२
अर्थ-जैले भोजन ठृप्ति और दवितके लिये किया जाता है, और उस भोजनकों जटठराशि पचाती है।
जिमि-दृष्टान्तवोघक शब्द है, दृशन्त पीछे कहा जायगा ।
भोजन करिअ-भाव यह कि इस शरीरयन्बका परिषोधषण और चर्धन भोजनसे ही होता है | शरीरमें रातदिन श्रवण, स्पशन, दान) रसन। प्राण और गमनादिक क्रियासे शक्तिक्षय हुआ करता है| भोजनसे ही उस क्षतिकी पूर्ति और बलवीर्यवर्धन तथा संग्रह हुआ करता है; भोजनके विना यह शरीर-यन्त्र चछ नहीं सकता । इतना आवश्यक होनेपर भी भोजन-ऐसा सुगम व्यापार कोई भी नहीं; इसमें कोई आयास नहीं होता, छोग सुखपूर्वक ग्रास-प्रास करके भोजन करते हैं। और स्वाद छेते हुए, शनेः-शने: तृत्त हो जाते हैं ।
तृपिति द्वित छागी-माव यह कि खाली पेट होनेपर पेटमें जलन होती ( भूख लगती ) है। यह नित्यरोग है, यथा-'क्षुध। व्याधि वाघा भइ भारी” पर यही भूख खास्थ्यका लक्षण है; यही बलका मूल है। जिसे भूख नहीं, समझिये उसकी अम्रि दुष्ट हो गयी है; वह मन्दाग्नि आदि रोगोंके वशीभूत है, इससे और भी आगन्ध॒ुक रोग उत्मन्न होंगे, शरीरयन्न ही खतरेमें है । यदि भूख ठीक लगे तो उसका प्रकृत औषघ भोजन है । भोजन न मिलनेसे अन्नामिलाषा बढ़ती है, त॒रन्त दुर्बछताका अनुमव होने छगता है | अतः उक्त अभिलाषाकी पूर्ति अर्थात् तृप्तिके लिये तथा दुर्बछता दूर करनेके लिये, बलाधानके लिये अर्थात् द्वितके लिये भोजन किया जाता है | भोजनके एक-एक आससे क्रमशः ठुष्टि और पुष्टि होती है; आँख खुल जाती है और प्राणका सद्चार हो उठता है ।
सोइ असन-भाव यह कि वही भोजन जो तुष्टि और पुष्टिके लिये किया गया था; तात्कालिक तुष्टि और धृष्टि सम्पादन करके ही अपनी उपयोगिता समाप्त नहीं करता; इतना लाभ तो इसका आह्ुषज्ञिक फल
है, जिसका मनुष्य अनुमव करता है, परन्तु उसका यथार्थ छाम तो मनुष्यके बिना जाने हुआ करता है |
श्श्डे शओरीभक्ति-चिन्तामणि
पचवच जठरागी-भाव यह कि जिस भाँति यन्त्रोंके सश्लालनके लिये भौतिकाग्निकी आवश्यकता होती है उसी भाँति इस शरीर-यन्त्रके लिये जठराग्नि ( पेट्की अग्नि ) है। जठरारिन उदरख भोजनकों पचाती है; उसीसे रस-रक्तादि सात्तों घातु बनकर इस शारीस्यन्त्रका पोषण करते हैँ और बल-सम्पादन करते हैँ । जब इस अमिकों भोजन नहीं मिलता, तो यद मल ओर घाठुओंको पचाने छगती है तब जलन; अन्नामिलापा और दुर्बलता उत्पन्न होती है। कुछ दिनोतक अनशन करनेसे शरीरयन्च ही नष्ट हो जाता है। अति तीम्र वेराग्यवान् अब भी असाध्य घातक रोगमे फेस जानेपर अनशनत्रत करके ही प्राण देते हैं जब भोजन मिल जाता है, तव वही अग्नि मल-घातुओंका पचाना छोड़कर अन्न पचाने लगती है और दशरीरकी रक्षा करती हुई बल- सम्पादनका हेतु दो जाती है ।
अस हरिसमजन सुगम सुखदाई । को अस मूढ़ न जाहि सोहाई ॥१३॥
अर्थ-ऐसा दी हरिभजन सुगम और ख़ुखदायी है, पेसा कौन मूढ़ दे जिसे अच्छा नहीं रूगता ।
अस-यह दाशन्तसूचक शब्द है। भाव यह कि मोंजनकी भाँति भजनकी भी व्यवस्था समझ लेनी चाहिये | जिस माँति इन्द्रियगम्य यह स्थूछ शरीर है, उसी माँति अनुभवशम्य इस शरीरमें व्यात्त सूक्ष्म या मानसिक छारीर है | असली शरीर तो यही है, इसीलिये इसकों अन्त:- करण कहते हैं, स्थूछ शरीर तो आयतनमात्र है । जिस भाँति स्थूलछ शरीरका घारक; पोषक और नाशक जठराग्नि है, उसी मौँति मानसिक शरीरका सर्वस्व सुमति है, यथा--सुमति छुघा वाढ़े नित नई”, और जिस भाँति हित-मित और पशथ्य भोजनके जठराग्निद्वारा परिपाकसे शरीरका धारण, पोषण तथा बलवर्धन होता है, उसी भाँति हरिभजनके
दशातपञ्च चौपाई १२७
प्ररिषाकसे मानसिक शरीरका धारण, पोषण तथा परम देराग्यका उदय होता है, यथा-- ३
जामनिआ तब मत बिरुज गोसाईँ । जब उर वल बिराग अधिकाई ॥
जिस भाँति खयं भोक्ताको पता नहीं चछता और उसके भीतर भोजन पककर रस-रक्त-मांसादि वनकर शरीर पुष्ट किया करता है; और बल बढ़ता जाता है, उसी माँति भक्तकों भी पता नहीं चलता कि उसका किया हुआ भजन किस भाँति मानसिक शरीरका पोषण करता हुआ वेराग्यकों बढ़ाता चला जा रहा है | जिस भाँति अग्नि दुष्ट होकर शरीरका अपकार करती है, और दुर्बलता बढ़ातो है, उसी मॉति सुमत्ति कुमति होकर मानसिक रोग उत्पन्न करती है और विषयाशा बढ़ाती है; यथा--जह्ँ कुमति तहेँ विपति निदाना' तथा--बिषय आस दुर्बलता ( गई )! जिस भाँति मोजन न मिलनेपर जठराग्नि अज्नामिलाषा; डुबंलता उत्पन्नकर शरीरका ही नाश कर देती है, उसी भाँति सुमतिमें भजनकी आहुति न पड़नेपर वैषयिक सुखाभिछाष विषयादा उत्पन्न करके सानसिक शरीरका सत्यानाश कर देती है, जिस प्रकार किसी भॉंतिका भी भोजन न मिलनेसे अथोत्त् अनशनज्रत करनेसे मृत्यु होती है, उसी भाँति किसी प्रकारका भी भजन न करनेसे, अथात् संसार और ईश्वर किसीका भजन न करनेसे मानसिक शरीरका भी पतन हो जाता है । जिस भाँति चटनी; अँचार आदि उत्तेजक पदार्थोंसे न पेट भरता है और न यथोक्त छाम होता है, बल्कि तृषा बढ़ती है, उसी भाँति कामोप- भोगसे वासना बढ़ती है, शान्ति कमी नहीं होती, यथा--
सेचत विषय बिबधें जिसि निति निति नूतन सार।
जिस भाँति पेवक्ी जलन बिना भोजनके नहीं जाती, उसी भाँति जियकी जरनि बिना भजनके नहीं मिटती, यथा---
जासु भजन बिनु जरमनि न जाहोीं।
श्र५ श्रीभमक्ति-चिन्तामणि
दरिभिजन-मभाव यह कि हरिभजनमें विशेषता है, क्योंकि हरिकी भाँति प्रीतिरीति जाननेवाला कोई नहीं है, यथा--
जानत प्रीति-रीति रघुराई ।
नाते सब हांते करि राखत, प्रीति प्रतौोति सभाई। नेष्ट निवाहि देह तजि दुसरथ, कीरति अचल चलाई ॥ ऐसेहु पितु ते अधिक गीधपर समता गुन शसुआई। घर गुरु गृह प्रिय सदन सासुरे भइ जहँ-जहेँ पहुनाई॥ तह तएँ कट्दि सबरीके फलनकी रुचि साधुरों न पाई।
७७ ७७०३७ ७७ ५ ७४७ ७ ७७ ७ 9०००७ ७ ५२५०३ ७०७७७७५+१०००७० 8०३७७ ०७४०७ ०७७
हरिहु जोर औतार आपने राखी बेंद बढ़ाई।॥ ले चिउरा निधि दयउ सुदामहिं जद्यपि बारूमिताई। झुगम खसुखदाई-भाव यह कि जिस क्रियाके करनेमें भी खाद हो, सवोमिलाषाकी पूर्ति हों और फल सुखमय हो, ऐसी सुगम और छखसदायिनी क्रिया या तो भोजन है, या भजन; यथा-- डसा रास खनाव जेहि जाना । ताहि भजन तजि भाव न आना ॥ को अख सूढ़-भाव यह कि जो मायाके बचमें होकर बुद्धिहीन हो जाय, वही मृढ़ है, यथा-- साया विवस भये मुनि सूठा | ससुझी नहिं हरि गिरा निगूढा ॥ सो मृह्ोंकों भी हरिभजन अच्छा लगता है, यथा- विषयिन कह घुनि हरियुन आसा। श्रवन सुखद अरु सन जभिरासा॥ न जञाहि खोहाई-भाव यह कि मूढ़ दोना भजनके न सोहानेमें कारण नहीं है, बल्कि पापी होना कारण है, यथा-- ते जढ चेतन आतसमधाती | जिनहिं न रघुपति कथा सोहाती ॥ पापवंत कर सदज सुसाऊ | भजन मोर तेहि साव न काऊ।वगा
दो ०-सेवक सेज्य साव बिनु भवन तरिअ उरगारि। भजिअ राम पद्पंकज अस सिद्धांत बिचारि॥
शतपश्च चौपाई श्र
अर्थ-सेवक-सेव्यभावके बिना संसारसागर पार नहीं किया जा खकता+ ऐसा सिद्धान्त विचारकर रामपद्कजञज- का भजन करना चाहिये ।
भाव-छाक्षाकी भाँति चित्तकी भी दो अवस्थाएँ होती हैं--(१) कठिन, और (२) द्रव । चित्त खमावसे ही कठिन है; पर छाक्षाकी भाँति तापक द्रव्यके योंगसे कुछ देरके लिये द्रव हो जाता है; और उसके अयोगसे पुनः कठिन हो जाता है। करुणा, भय, प्रेमादि उस चित्तके लिये तापक हैं | भलीभाति द्रवीभूत चित्तमें जिस वस्त॒ुकी छाप पड़ जाती है, वह कठिनावस्था प्राप्त होनेपर भी उसमें बनी रहती है। इसी छापको संस्कार, वासना या भाव कहते हैं, यथा--
परम प्रेममय रूदु मसि कीन्ही । चारू चित्त भीती छिख लीन्ही ॥
यह भाव ही विभाव; अजुभाव, सद्वारीभावसे पुष्ट होकर रसत्व- को प्राप्त होता है ।
सेवक सेब्य-तात्पय॑ं यह कि व्यवहारमें पड़े हुए. जीवको स्वाभाविक भाव यही होता है कि भगवान् सेव्य हैं और मैं सेवक हूँ । भगवान् रामचन्द्रमें गुण ही ऐसे हैं कि उनके चित्तपर चढ़नेंसे चित्तकी द्रवावस्था हो ही जाती है । अतः स्वाभाविक पहली छाप जो पड़ती है बह सेवक-सेव्यभावकी होती है| रामसे सम्बन्ध जोड़नेका मूल सेवक- सेव्य भाव है । इसीकों 'तदीय! कहते हैं । फिर सम्बन्धप्रागल्म्यसे “बह मेरा द्वी है? ऐसा भाव उठता है और फिर प्रेममें विभोर होकर “मैं वही हूँ? ऐसी स्थितिकी प्राप्ति# होती है। जबतक देहबुद्धि है, देहात्माध्यास बना है तबतक “दासोडहम? यही माव ठीक है। ऐसा भजन करनेवालरा
# भक्तिमें तीन भाव क्रमशः होते हँ--तस्वैवाद ममैवासौ स एवाह- मित्ति त्रिधा ।
बे त्तीन प्रकार ये हैं (१) मैं उसका हूँ (२) वद मेरा है और (३) मैं वह्दी हूँ ।
१५७ श्रीभ्क्ति-चिन्ता्माणि
ही 'सोहम?# पदको प्राप्त दोता दै और सोहम् पदकों आम्त होना और भवसागर पार होना एक बात है । अतः सबका मूल सेवक-सेव्य-भाव हुआ ) प्रथ्वीपर गिरे हुए प मल॒ष्यको जमीन थामकर ही उठना पढ़ता है, देद्वाध्यासकों प्रात हुआ जीव ईश्वर कैसे है! बिना सेवक-सेल्य-माव- से उपासना किये अन्तिम भावका उठना अखस्वामाविक है; भावाभास है, बह स्थायी भावको कभी नहीं प्राप्त हो सकता, इसीलिये कहते हैं कि---
भच न त्रिआ-भाव यह कि सेवक-सेव्य-भाव ही भवसनन््तरणका असाधारण साधन है, क्योंकि हरिमाया अतिदुस्तर है; इसकी पार कर जाना जीवके सामथ्यके बाहर है। क्रियासाध्य है ही नहीं, कृपासाध्य है । अतएज़ जिसे अपने बलका भरोसा है वह अपने ही वलसे तरना चादेगा; और उसीमें बहता फिरेगा, पार नहीं पहुँच सकेगा, यथा--
सवर्ध्षिषु अगाघ परे नर ते पदर्षकज् प्रेम न जे फरते।
और जो सेवक्र-सेब्य-मावसे मगवानकी शरण हैँ, वे उनके बलसे
अनायास पार पा जायेंगे; यथा--- जनहि भोर वऊ निज बल ताही । दौड़ कई काम क्रोध रिउ्ठु आद्दी ॥ अस बिचारि पंडित भोहि भजहीं । पाए ज्ञान मगति नहि तजहीं ॥
उरगारि-माव यह कि आप सॉपोके श्र हैं, उनका विष आपप- के भक्तोपर भी काम नहीं करता, पर अलौकिक सर्पोका विष आपपर मी काम कर जाता है । काम-क्रोधादि छः शन्रुआंकों सर्प कद्दा है; यथा---
आऔर सकल सुर ऊसुर ईस बस खाए उरग छहूँ ।
अस सिद्धांत चिचारि-भाव यह कि जीव सब्िदानन्द रामका
अंश है, मायाके साथ बंधकर संसारी हो दुःख भोगने लगा | चित्जड-
# दासोष्दमिति मे बुद्धि; पुरासीन्मधुसदने | दाकारोध्पद्तस्तेन गोपीव्ापहारिण ॥ + भूमी स्खलितपादानां भूमिरेव पर वरूमू।
शतपश्ल चौपाई १२८
ग्न्थि यद्यपि झड़ी है, पर छूटती नहीं; जब छूटे तव कल्याण हो । इसके छूटनेका एकमात्र साक्षात् कारण ज्ञान है, यथा--शान मोच्छप्रद बेद बखाना ।? उसके भी दो रास्ते हैं, एक तो ज्ञानपन्थकथित साधनौंसे ज्ञानद्वारा मुक्तिताभ करना; और दूसरा भक्तिसे भगवानको प्रसन्न करके मुक्तिकाम करना; यथा--- सोद् जाने जेहि देउ जनाई । जानत तुमहि तुमद्दि होइ जाई ॥ तुम्दरी कृपा तुमहिं रघुनंदन | जानहि भगत भगत उर चंदन ॥ सो पहला रास्ता विना उपासनाकी सहायताके अतीब दुष्कर है; और सेन्य-सेवक-भाव अति खुगम और झुखद है, इससे ज्ञान तथा परा- भक्ति दोनोंकी अनायास सिद्धि होती है; अतः यही अनुष्ठेय है; यही सिद्धान्त है । भजहु राम पद्पंकज-भाव यह कि भवसागर पार करना है | तुम क्षुद्र जीव ठहरे, अपने बलपर मत भूलों । कितना द्वी बल त॒म्द्ारे क्यों न हो, पर इस महासमुद्रके सामने अकिश्वित्कर है| अतः रामके चरणकमल पकड़ों, इस महासमुद्रके छिये यही नाव है; यथा--“यत्पाद- छवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावताम् |? अब 'रामके चरणकी शरण ग्रहण करनेसे अवश्य ही पार हो जायेंगे! इस विद्वासके लिये रामकी सामर्थ्य
कहते हैं-- दो०--जो चेतन कहूँ जड करइ,जडहिं करइ चैतन्य । अस समथ रघुनायकहिं भजहिं जीव ते घन्य॥ अर्थ-जो चेतनको जड़ और जडकों चेतव वनाता है,
ऐसे समर्थ रघुनायककों जो जीव भजते हैं, थे घन्य हैं ।
चेतन कहें जड-भाव यह कि जीव तो खभावसे ही ईश्वरका अंश होनेके कारण चेतन, अमल और सहज सुखकी राशि है) बह मायाके वश होकर कौर मरकंठकी नाई बंघ-सा गया | मायाके रजोगुण तथा
१२०, श्रीभक्ति-विन्तामणि
तमोशुणकरे तारतम्यानुसार उसमें भो जरत्वका तारतम्य भासने लगा; इसीको चेतनका जड होना कहते हैं ।
जो करइ-भाव यद्द कि जड भी तो खभावसे ही चेतन है, केवल मायाका पर्दा पड़नेसे वह जड-सा बना हुआ है | उस पर्देके हटने मरकी देर है, चेतन त्तो बह है ही, यथा---
सायावचस सतिमंद अभागी। हृदय जवनिका बहु विध छागी॥
वह माया ही पर्दे पछटकर कभी अपेक्षाकृत चेतन और कभी जड़ ॒ बनाकर नचा रही है, और आप भी प्रभुके इशारेपर नाच रही है | इस विधिसे वह मायापति जडकों चेतन और चेतनकी जड़ दिन- रात बनाता रहता है, यथा--
जो साया सव जगहिं नचावा | जासु चरित ऊुखि काहु न पादा 0 सो प्रभु श्रुविकास खगराजा । नाच नदी हव सहित ससाजा ॥
अख समर्थ-भाव यद्द कि सब्र सामथ्योसे बड़ी चेतनकों जड और जदको चेतन बनानेवाली सामथ्य है। अतः ऐसा सामर्थ्यवाल्य ही सबसे अधिक समथ्थ है| चितशक्ति तो सवेच्न ही समानरूपसे अवस्थित है, पर चैतनके अधिक विकाससे ही ब्रक्ददेव सबसे बड़े हैं, और संकोचसे ही मशक छोटा है। अतः समर्थ वही है जो चेतनके संकोच-विकासका नियमन करता हों; यथा--“मसकहिं करे विरंचि प्रभु, अजहि ससकते हीन ।! रघुनायकद्दि-भाव यह कि भक्तोपर अनुप्रह करके भगवानते अनेक अवतार घारण किये; पर जडको चेतन करनेकी सामर्थ्य जैसी रामावतारमें दिखछायी बैसी अन्य अवतारोंमें नहीं दिखायी है; यथा-- जेंडि पद परसि त्तरी ऋषिनारी । दंढक कानन पावनकारी ह
सझ सेवककी भीति रुचि रखिहैँ राम कृपाछ | उपछ किये जलजान जेद्दधि, सचिव सुमति कपि भालछु ९
झातपश्च चौपाई १३०
तथा-- भ्जे विन्नु वानरके चरवाहे। रुनायक कहकर दानशीलता तथा करुणा दिखछायी, यथा-- “मंगन लहृ॒हिं न जिनके नाहीं !? भजहिं जीव ते घन््य-भाव यह कि अप्राप्य वस्तुकी प्राप्तिके लिये ही छोग प्रभुकों भजते हैं, अतः अभागा ही करुणाहीन तथा सामथ्ये- हीनका भजन करेगा । जिसे स्॒र्य साभथ्यं नहीं, वह दूसरेका क्या उप- कार कर सकता है ! अतः समर्थ और कृपाहका भजनेवाला हीं माग्य- वान् है। अब रघुनाथ-सा समर्थ; करुणासागर और दानशीलकौन होगा * यथा-- एकह दानिसिरोसनि साँचो | जेद्धि जाचत पुनि जाचकता बस सो वहु नाच न नाच्यो । अतः जो जीव रघुनायकको भजते हैं वे दी धन्य हूँ, जिस कुलमें वे. उत्पन्न हैं, वह कुछ धन्य है, यथा-- सो कुछ धन्य उम्रा सुनु जगतपूज्य सुपु्नीत आ्ररघुनाथ परायन जेंहि कुछ उपज बिनीत ॥ धतस्वैचाइम! भावसे भजन, यथा-- इस सत्र सेवक अति बढ़भागी । संतत सगुन ब्रह्म अजुरागी॥ पभमैबासी' भावसे भजन) यथा--फिरें राम सीता मैं हारी “स एवादम भावसे स्थिति, यथा-- दिसि अरु विदिसि पंथ नहिं सूझा। को से कौन कहाँ नहिं घूझा ॥ मुनि सग साँझ अचल छै वैसा । घुकक सरीर पनस फल जैसा ॥ ऐसी स्थितिमें भी सिद्धिभक्ति चाहनेवार्लका सेवकर्सेब्यमाव- सम्बन्धी संस्कार वीजरूपेण रहता है, इसीसे प्रेम समाधिते छोटता है, और जिनका सेवकसेव्यसंस्कार नष्ट हो जाता है; वे नहीं छौय्ते ।
१३१ अआीभमक्ति-चिन्तामणि
कहेजेँ ज्ञानसिडांत. बुझाई । सुनहु भगतिमनिकी प्रम्मताई ॥
अर्थ-शानसिद्धान्त तो मैने समझाकर कहा, अब भक्ति- मणिकी प्रभुता खुनो १
शानसिद्धांत-माव यह कि रिद्धान्तमें कोई भेद नहीं है; शान भर भक्तिका सिद्धान्त एक ही है, यथा--“भगतिदिं ज्ञानद्विं नहिं कछु भेदा ।? इसील्यि भक्तिका सिद्धान्त एथक् नहीं लिखते, केवल प्रभुत्तामें भेद है, उसीका कथन करते हूं । सिद्धान्तमें भेद होनेसे अभेदकथन किसी प्रकारसे नहीं बन सकता । सो यहाँ ज्ञानका सिद्धान्तमात्र कहा; विस्तार इसका वेदान्तश्ास्त्रमें है; यथा-वेदान्तवेय विभुम् ।? वादि- प्रतिवादिभ्यां निर्णीतो5थः सिद्धान्तः । अतः यहाँ शञानका निर्गलितार्थ मात्र कह्दा गया है |
चुझआई कहेंडें-भाव यह कि शानसिद्धान्त न कहते बने और न समझते बने; वेखरी वाणीसे जो कुछ कद्दा जायगा; वह ठीक नहीं ब्रैठेगा । अतः दृष्टान्त दें-देकर इस ज्ञानदीपप्रसज्धमें समझाकर कह दिया, यथा--
सुनहु तात यह अकथ कहानी । समुझत बने न जात बखानी ॥
धुझाई कहेउें? कहकर ज्ञानप्रकरणकी समाप्ति कहा |
खुनह-भाव यह है कि ज्ञान और भक्तिके सिद्धान्तमें तो कुछ भी भैद नहीं है, पर उपाय और प्रभुताईमें भेद है, सो भक्तिकी ग्रभुत्ताका प्रसज्ञ आरम्म करते हैं, अतः पुनः 'सुनह” कहा ।
भगतिमनिकी-माव यह कि ममताके तागोंके संसारसे छूटकर भगवश्चरणोर्मे लग जानेसे मन खींचातानीसे बचकर स्थिर हो जाता है; तव उसकी दशा अभिजात% मणिकी-सी हो जाती है । जिस
* स्वच्छ
इतपञ्च चौपाई १३२
भाँति स्फथ्किमणि अपने उपाश्रयके रंगसे रंग जाती है; जवाकुछुमके सन्निघानसे छाल प्रतीत होने छगती है, इसी भाँति ग्रहीता पुरुषके आलम्बनसे उसीके रंगरमें रंग जाती है, इसीकों तत्खतदअनता- समार्पज्नि कहते हैं। मसमताकी डोरी भगवव-चरणोमें बंधनेसे मन भी भगवानके रंगमें रैग जाता है, यथा--- परम प्रेमसय झूदु मसि कीन्द्रीं । चारु चित्त भीतो लिख लीन््द्टीं ॥
इसी लिये भक्तिकों मणि कद्दा ।
प्रशुताई-भाव यह कि यद्यपि दीप और मणि दोनों अन्धकारका नाश करनेमें समर्थ हैँ, पर मणिकी प्रभुता अन्य प्रकारकी है। इसी भाँति शान और भक्ति दोनों अविद्यान्धकारका नाश करनेमें समर्थ हैं । ज्ञानकी प्रभुता तो कह चुके, अब भक्तिकी प्रभुताई कद्दते हैं | कर्तमकर्तसन्यथा- कठे समर्थ: प्रभुः। अतः (१) करने (२) न करने और (३ ) अन्यथा करनेकी सामथ्यंको प्रभशुताई कहते हैं । सो करनेकी सामथ्यंका वर्णन करते हुए, कद्दते हैं--
रामसगति चितामनि सुंदर ।
बसे गरु(ड जाके उर अंतर ॥१४॥
अर्थ-रामभक्ति झुन्दर चखिन्तामणि दै, दे गरुड़ ! यह जिसके हृदयमें चसती है । शामभगति-भाव यह कि भक्ति व्यर्थ जानेवाली वस्तु नहीं, चाहे वह किसी भाँति हो, यथा--- अपनो पेपन निज हथा तियगन पूजहिं. भीति । फले सकल मनकासना चुऊूसी रीति प्रतीतिग॥ा प्रीति बड़ी प्रद्माददकी जिन पाहनते परमेसुर काढयों॥ बात इतनी है कि मजनीय उत्तम होना चाहिये | जो जिसे भजेगा वह उसीकों प्रात्त होगा; भूर्तोकोी मजनेवाला भूतकों प्रात्त होगा, यक्ष-
श्र अआीभक्ति-चिन्तामणि
राक्षतकों भजनेयाह्य यक्ष-राक्षसकों औौर देवताओंकों भजनेवाला देचत्वको प्रात होगा अर्थात् मजनसे इष्टकी प्राप्ति अवश्य होती है। बया--- यिधि हरि हर पद श्यागि जे मजहिं सूतगन घोर । तिनकी गति भोहिं देड विधि जो जननी सति मोर ॥
अतः मजनीयमें जितना शुणोत्कर्ष दोता है, भक्तिकी महिमा भी उतनी ही बढ़ती है। सो राम तो ब्र्म हैं, अतः राममक्तिम उत्कर्मताकी पराकाष्टा है, चया---
रास प्रह्म व्यापक जग जाना । परमानंद परेस पुराना ४ अथ जाना मैं श्रो चतुराई | भजिय तुम्हदर्हि सब देव बिहाई 0
सिंतामनि-भाव यह कि सणियोम सर्वोत्तृष्ठ होनेसे चिन्तामाणि कट्टा | माणिके चार शुण हैं--(१ ) जाति, (२) शुचिता, (३) अमूल्यता और (४) सुन्दरता | यथा--
सनिगन छुर नर नारि सुजाती ) छुचि अमोछ सुंदर सब भाँती ॥
यहाँ चिन्तामणि कहकर दिव्य जाति बतलायी । और मूल्य तो इसका कुछ हो ही नहीं सकता, क्योंकि सब कुछ चिन्तामणिमें बसता हैं। जिसमें सब्र कुछ बसे; उसका मूल्य क्या * यथा-- अखने बसन सथ बस्तु दिविध ब्रिध सब मनि महँ बस जैसे ।
इससे त्तीसरा शुण अमृल्यता कद्दी । इसी भाँति राममक्ति-चिन्ता- मणि है, इसमें सब शक्ति है, आतंके सक्ृत्को दरण करती है, अर्थार्यीको अणिमादि सिद्धि देती है, जिशासुको ग्रूढ्गतिका ज्ञान ग्रदान करती है, ओर शानीके ज्ञानकों अचल करती है । अन्य देवताओंकी मक्ति मी मणि है, बढ़ी अमूल्य दे, यथा--आरोग्यं मास्करादिच्छेत् घनामच्छेत् हुताशनात? पर राममक्ति सब कुछ देती है। इसलिये चिम्तामणि है | मूल्यके विषयमें हम चर्चों नहीं करते, क्योंकि उसका सांसारिक मूल्य कुछ भी नहीं दे )
झातयश्ञच चौपाई श्श्छ
खुंद्र-अब चौया गुण छुन्दरता कदते हैं| माव यद् कि शमभक्ति- चिन्पामणि केवल छामग्रद ही नहीं है, सुन्दर भी है| जैसे सुन्दर मणिके दृदयमें धारण करनेसे पुदुघकी ओंगमा होती है, उसी भाँति मक्ति- चिन्तामणिके भी छुदयमें घारण करनेसे युदघकी शोमा होती है, वथा---
सोह सैंठ गिर्जा शुद्द जाये। जिसि जन रामसगतिके पाये ॥ चसौ-भाव यह कि च्वच्छन्दाचारिणी न हों; ऐसी मक्तिकों
अव्यभिचारिणी भी कहते हैँ | सो अव्यमिचारिणी भक्ति होनी चाहिये, जो छदयमें निरन्तर वास करे ।
गरुड-माव यह कि आप स्वर्य भगवान् गदडइध्दवजकों पीठपर बढ़ायें घूमते हैं, सों आपको भी मोह हो गया । अतः शारीरिक भजन य्थेष्ट नहीं है; बथा---
राम राम सब कोठ कहें ठग ठाकुर झा चोर॥
बिना असम राौसे नहीं सुलसती संदक्िसोर
भक्तिकों छदयमें स्थान देनेसे फिर मोहका उदय नहीं होगा )
जाके उर अंतर-भाव यह कि वाह्य लछिज्घारण अकिश्वित्कर है, बथा---
तुलसी देखि सुबवेप मूलहे भूठ न चतुर नर।
सुन्दर केकी पेखु बचन सुधा सम जसन जहि।॥
“जाके उर अंतरः कहकर अलौकिक सुन्दरता कही; और मणि तो उरके ऊपर बसनेसे शोमा देती है; पर यह मक्ति-चिन्तामणि छुदयके अंदर बसकर झोमा देती हैं |
परम प्रकासरूप. दिनराती । नहिं कछु चहिआ दिया घृत बाती ॥
अर्थ- ( बह चिन्तामणि ) परम प्रकादारूप दिनरात बनी रहती है; दीया; चची, घीकी कुछ आवदच्चयकता नहीं ।
१३० श्रीभक्ति-चिन्तामणि
परम प्रकासरूप-भाव यद्द कि अन्य देवताओँकी भक्ति मणि होनेसे प्रकादरूपा टै । मणिकव्प चित्तमें जेसा उपाभश्यक्रा प्रकाश दोता है, बेसा ही प्रकाश आता है| यहाँ तो राम परमतत्व होनेके कारण परम प्रकाशमय हूँ, यथा-- जोगिन परम तष्त्मय भासा । सांत खुद्ध हुव परम प्रकासा ॥
अत्एुव उनमें लगा हुआ चित्त भी परम प्रकाशरूप हो जाता है । इसीलिये राममक्तिकों परम श्रकाशमय कहां | इस भौंति मणिका दूसरा गुण अलीकिक शुचिता मी कह दिया ) दिनराती-माव यद्द कि दीपका प्रकादय अँधेरी रातमें दी शोमित द्ोता है; सवेशा होते ही धीमा पढ़ जाता टै। यथा--'जैसे द्विवस दीप छब्रि छूटे ॥7 वैसे ही शानदीपका प्रकाश अविद्यान्धकारका नाश करता हुआ दी शोमित दोता है; विज्ञान ब्रिद्यान (प्रातः) के समय अर्थात् अभेदज्ञान ( साक्षात्कार )के समय सोडहमत्॒त्ति भी फीकी पड़ जाती हे; परन्तु मणिदीप रातकों तो उजेला करता दी है। दिनकों सकी किरणंकि पड़नेसे और भी चमकने लगता है, इसी भौंति राममक्ति मोदराजिके तमका नाश करती हुई तो शोमित होती ही हैँ भगवत- साक्षात्कारके समय और भी देदीप्यमान दो उठती है, क्योंकि वही उसके अत्यन्त उत्कर्पषफा समय ऐ, यथा--
सुनि प्रश् बचन भगन सब भये । को हम कहाँ बिसरि तन गये ॥ दिया छूत बाती-भाव यद्द कि जिस भाँति |देवेकी बनाये रखनेके लिये दीया, धी और बत्ती आवश्यक है; एकके अभावसे भी दीया घुझ जायगा, उसी भाँति सोहमब्त्तिकों अखण्ड रखनेके लिये चित्तकी समता, परम वेराग्य ( ज्ञान) और तुरीयावस्था तीनोंकी आवश्यकता है। नहें कछु चद्धिअ-परन्तु भक्तिचिन्तामणिकों कायम रखनेके लिये अन्य सामग्री (साघन) की अपेक्षा नहीं है, मगवत्-चरणॉंमे डोरी ऊगी रहनी ही यथयेष्ट है, उसीसे सब कुछ हो जाता है, यथा-
शतपथ्च चौपाई श्३६ सो सुतंत्र अबवरूंच न आना। तेहि आधीन शान बिज्ञाना ॥ मोह दरिद्र निकट नहिं आवबा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा ॥३५॥
अर्थ-न तो इसके निकट मोहदरिद्र आया, और न ( फभी ) इसे छोमवायुने चुझाया ।
मोह द्रिद्ध-भाव यह कि मोह दरिद्र है, क्योंकि उसके भाग्यमें सुनि-जन-घन ( राम ) नहीं है, यथा--सुनि जन घन सर्वस सिव प्राना? इसीसे वह चोरी करता है) यथा-“मत्सर मान मोद्द मद चोरा# ।? मदादि झलम होनेके कारण चोरीमें सद्यायक होते हैं, अतः इनकी मी चोरोंमें गणना है; उँजेलेमें चोरी नहीं करते बनता, इसलिये दीपक घुझा देते हैं) यही मोहदरिद्र डुःखोंका मूल है; यथा--नहिं दरिद्र सम झुख जग माही ।?
निकट नहिं आवा-भाव यद्द कि जितनी ममताकी दृत्तियाँ रहीं वे तों एकीभूत होकर भगवश्चरणोंमें छूय गर्यी, और ममताकी इत्तिकों ही संसारमें लगाकर भोद अपना अधिकार जमाता है | अतः अब उसे निकट जानेके लिये मार्ग ही नहीं रह गया, इसीलिये कहते हैं कि मोह निकट नहीं आ सकता । लोस बात-से तात्पय॑ विषयसमीरसे है | यह झानदीपकका
प्रवछ शत्रु है। जहाँ सनोहर विषय---शब्द स्पर्श रूप रस गन्धका साक्षात्कार हुआ वहीं बत्ति उस ओर दौड़ी, और 'सो5हमस्मि? 'चृत्ति गयी? क्योंकि तत्यदके शोघनसे उसमें विधयका छेश नहीं रह जाता, अतः चत्ति दूसरी ओर दौड़ जाती है; और यहाँ सणुण ब्रह्म श्रीराममें यावत् विषय दिव्या-
+ करों जो कछु धरों सचि पचि सुकृत सिंला बयेरि।
पैठि उर बरबस दयानिधि दंभ छेत अऑजोरि।!॥ + पतंग।
श्र्७ श्रीभक्ति-चिन्तामणि
तिदिन्य रूपमें वर्तमान हैँ, अतः उनमें लगी हुई जत्ति ठुब्छ विषयोकी ओर नहीं दौड़ सकती, यथा-- देव देखि तसतव थालक दोझ | अब न जाँखतर जाये कोऊ ॥ तथा-- रास काम सत्तकोटि सुभग तजु। हुगों कोटि अमित अरिमरदनु ॥ सक्र कोटि सत बिभव बिछासा | नक्न सत कोटि अमित अवकासा ॥ मरत कोटि सत ब्रिपुल बर रत्रि सतकोटि भ्रकास। ससि सतकोरि स्री सोत्तत, समन सकल भवत्नास ।॥। काऊकू कोटि सत सरिस जत्ति दुस्तर दुर्ग दुरंत। घूमफेतु सत्तकोटि. सम छुराधर्ष भगवंत ॥ प्रभुभगांध सतकोटि पताछा । समन कोटि सत सरिस कराछा ॥ त्तीरथ कोटि अमित सम पावन । नाम जखिक अघपुंज नसावन 0 द्विमिशिरि कोटि अचछ रघुबीरा । सिंधु कोटि सत सम गंसीरा ॥ कासधेनु सतकोटि समाना। सकल कामदायक भगवाना # सारद कोटि अमित चतुराई | विधि सतकोटि सृष्टि निषुनाई।॥ चिप्नु कोटि सत पालनकरता | रुद्ध कोटि सत सम संहरता ॥ घनदु कोटि सत सम भनवाला। साया कोटि प्रपंचनिधाना॥ भार भरन सतकोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रछु जगदीसा ॥ निरुपम न उपमा झान राम समान रास निगम कहे । जिमि कोटि सत खथ्योत सम रबि कद्दत अति लघुता छह # नहिं तादि चुझावा-भाव यद्द कि दीप घुझता है, मणिदीप नहीं बुझता । भगवानके रंगमें रंगे हुए मनपर दूसरा रंग नहीं चढ़ता, यथा- सूरस्थामकी कारी कमरिया चद़े न दूजो रंग । सुछु सठ भेद होह मन ताके | श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाके ॥
शतपश्च चौपाई श्३८
प्रबल अबिद्यातस मिटि जाईं।
हारहिं सकर सलूूम सखुदाई ॥
अर्थ-अविद्याका प्रबछ अन्धकार मिट जाता डै। और शलभाँका समुदाय भी छदार जाता है ।
' प्रवछ अविदयातम-भाव यह कि तम तो नित्य ही मिटा करता है, परन्तु यह अविद्याका तम बड़ा प्रबल है | अनादिकाब्से आजतक चला आ रहा है, अगणित उपाय जन्मजन्मान्तरसे करते चले आये हैं, पर सिटा नहीं ! यह अविद्यातम अमिमान है, यथा--०त्यागहु तम अभिमान ।” इस प्रबल तमकों उनके चरणोंके आश्वित होनेसे भगवान् मिटाते हैं, यथा--
संसति मुझ सूलछप्रद नाना । सकक सोकदायक अभिमाना ॥ ताते करइ कृपानिधि दूरी | सेचक पर ममता अति भूरी॥
मिटि जाई-माव यह कि मूलाविद्याका अन्धकार मिट जाता है जिससे चित्जड़गन्थि स्पष्ट भासने लगती है। एक बार मिट जानेपर फिर अन्घकार नहीं होता, क्योंकि मणिदीप बुझता ही नहीं । अब मक्त- को अधिकार है कि या तो उस ग्रन्थिको छोड़कर वह कैवसल्यसुक्ति छे, और चाहे उसे रहने दे, मोक्षके समीपवर्ती होकर भगवदनुभवरूप मोक्षसुख छेता रहे | इस अवस्थामें मुछाविद्या तों मिट जाती है, पर लेशाविद्या रहती है, और यह मक्तोंकों इष्ट है; यथा--
अस अभिसान जाह जनि भोरे । में सेवक सियपति पति मोरे ॥
सलऊभ सझ्भुदाई-यहाँपर उपमेय नहीं कहा, अतः उन्हें शानदीप- प्रसज्षसे छाना पड़ेगा, यथा--“जरहिं मदादिक सलम सब )? सदादिक शल्म हैं, प्रकाश देखते ही उसपर ट्टट पड़ते हैं, खयं मले ही जल जायें, पर रोशनी बुझानेके उद्योगसे बाज नहीं आते । भाव यह कि ज्ञान होते ही अपने उत्क्षका मद होता है, चाह्दे ज्ञानी अपने शानसे उसका नाश
श्श् श्रीभक्ति-चिन्तामणि
कर दें) पर होता है अवश्य | समुदाई! से मत्सर-मानका भी ग्रहण है |
हारहिं-भाव यह कि मणिदीप शल्मकों जला नहीं सकता, पर स्वयं चुझता भी नहीं, शल्मसमुदाय जोर लगाकर हार जाते हैं इसी भाँति मक्तिचिन्तामणि मद-मानकों नष्ट नहीं कर सकती; क्योंकि उससें लेशाविद्या रहती है, पर मद-मानादि उसका अपकार भी नहीं कर सकते, यथा---
भत्सर भान सोह सद चोरा । इनकर हुनर न कौनिड ओरा ॥
खल कामादि निकट नहिं जाहीं । बसे भमगति जाके उरमाहीं ॥३२६॥
अर्थ-कामादिक खल भी निकट नहीं जाते । जिसके हृदय- में भक्ति बसती है।
खक कामादि-काम-कोधको खल कहा, क्योंकि थे अकारण सबका अपकार करते हैं, कल्याणपथके बटमार ( डाकू ) हैं | इन्हींके कारण आजतक कल्याण नहीं हों सका; इच्छा न करनेपर भी पुरुषसे पाप करा देते हैं, यथा--- खछ बिनु कारन पर अपकारी । अधि सूपक इव सुनु उरगारी॥
निकट नहिं जाहीं-माव यह कि विषयका ध्यान करनेसे उसका संग होता है, और संग होनेसे काम होता है। भक्त अनवस्त अपने प्रभुके ध्यानमें रहता है, उन्हींमे उसका चित्त रूगा रहता है, अन्य विषयोंकी ओर उसका ध्यान ही नहीं आकर्षित होता, और बिना ध्यान हुए संग नहीं होता, और बिना संगके कामकी उर्पात्ति ही नहीं होती है। अतः काम रुदा दूर द्वी रहता है क्रोंधकी उत्पत्ति तो कामके भी बाद होती है; अतः वह और भी दूर है, निकट नहीं जा सकते | यहाँतक
इातपशञ्च चौपाई शरण
भक्तिके करनेकी सामर्थ्य कही गयी । “बसे गरुड़ जाके उर अंतर कहकर इस प्रसज्षका प्रारम्भ किया था । चले भगति-फिर उरमें वसनेकी उक्तिसे दूसरा प्रसज्ञ अन्यथा करनेकी सामथ्यका वर्णन करते हैं | भक्तिके हृदयमें वस जानेसे जत्र छडृदय भगवद्धावसे भावित होता है, भगवदाकार हो जाता है, तब्र उसे सम्पूर्ण विश्व चराचर भगवद्गूप इृष्ट होने लगता है। इस भावनाके इढ़ होनेसे सब दिल्याएं उसके लिये लाभप्रद और सुखप्रद हो जाती हैँ, यथा- बेर न विग्नह आस न त्रासा | सुखसय तादध्दि सदा सब जासा॥| उरमाहीं-भाव यह कि भक्तिके दृदयमें वैठ जानेसे ऐसा द्ोता है; केवल भक्तका वेध बनानेसे अथवा भक्तोचित वाणीका उच्चारण करनेसे ऐसा नहीं होता; यथा-- रूखि सुवेप जग बंचक जेऊ | बेप भताप पूजिजत त्तेऊ हे उघरदि अंत न होइ निवाहू । कालनेमि जिमि रावन राहु # तथा-- कियेड कुबेप साधु सनसानू। जिसि जग जामवंत हनुमान ॥ भगवक्चक्तिके उरमें बसनेसे केवछ दारीरमान्र ही प्रभावित नहीं होता; सम्पूर्ण जगतूपर उसका प्रभाव पढ़ता है, यथा-- “जग भल भले पोच कहें पोचू ।? होई गरल सुधासम अरि हित होई । तेहि 4 कोई तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई ॥
अरथ-विष अम्ठतके समान हो जाता है, और शत्र हित हो जाता है, उस मणिके बिना कोई झुख नहीं पाता ।
गरल छुवासम-भाव यह कि न्नक्षाके प्रपश्चमें गुण-अवगुण मिला हुआ है; यहाँ विषमें अम्बत और अम्ृतर्में विष है| झुद्ध विष या शुद्ध
१४१ श्रीभक्ति-चिन्तामणि
अमृत कोई पदार्थ नहीं है । अतः सुखबुद्धिसे प्रहण किये हुए पदार्थमें भी दुःख मिलता हैं । यही जगत्का नियम है; वथा-- विधि अपंच गुन अवगुन साना । दुख सुख पाप पुन्य दिनराती । साधु जसाधु खुजाति कुजाती ॥ दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिज इलाहल माहुर मीचू॥ परन्तु जिसके छृदयमें भक्ति बसी है, वहाँ यह नियम अन्यथा हो जाता है। उसके लिये विष भी अमृतके समान हो जाता है। उसकी भावना दृढ़ होनेके कारण बस्तुविद्ेप अपने हानिकारक श्ुणकोीं ग्रकट करनेगें असमर्थ हो जाती है, यथा-- पापी है चाप बड़े परिताप ते आपनी ओर ते खोरि न लाई। भूरि दई बिप झमूरि भई प्रह्मद सुधाई सुधाकी सछाई ॥ यहाँ “गरल सुधा सम” कहकर जडका गुण परिवर्तन कहा ! अरि हिल होई-शबत्रु भी मित्र हो जाता है। भाव यह कि चाहे वह चुराई ही करे; पर उससे भक्तका उपकार ही होता है, यथा-- वालि परमहछ्ित जासु प्रसादा। मिलेड राम तुम समन बिपादा॥श। अरि हित कहकर चेतनके गु्णोर्मे भी परिवर्तन कद्दा । भक्तकी